प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2025 में मणिपुर का दौरा किया। यह उनका पहला दौरा था जब से राज्य ने मई 2023 में भीषण जातीय हिंसा देखी थी। इस हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों परिवार विस्थापित हो गए थे। करीब दो साल बाद पीएम की इस यात्रा को न सिर्फ विकास की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, बल्कि इसे प्रभावित परिवारों के लिए “हीलिंग टच” यानी सांत्वना का प्रतीक भी कहा जा रहा है।
इस तीन दिवसीय पूर्वोत्तर यात्रा के हिस्से के रूप में प्रधानमंत्री इम्फाल और चुराचंदपुर पहुँचे। उन्होंने यहाँ विभिन्न विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया जिनकी कुल लागत लगभग ₹8,500 करोड़ है। सरकार के अनुसार मणिपुर में कुल 31 परियोजनाएँ शुरू की गई हैं, जिनका उद्देश्य राज्य की बुनियादी ढांचा व्यवस्था को दुरुस्त करना और रोजगार के नए अवसर पैदा करना है।
इन परियोजनाओं में शहरी ड्रेनेज और एसेट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट (लगभग ₹3,647 करोड़), मणिपुर इन्फोटेक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (करीब ₹550 करोड़), पाँच राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएँ (₹2,500 करोड़ से अधिक) और अन्य कई योजनाएँ शामिल हैं। इसके अलावा महिलाओं के लिए हॉस्टल, स्कूलों का उन्नयन, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार और सोलर पावर इंस्टॉलेशन्स भी इस पैकेज का हिस्सा हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान उन परिवारों से भी मुलाकात की, जो 2023 की हिंसा के बाद से अब तक विस्थापन की पीड़ा झेल रहे हैं। उन्होंने उन्हें भरोसा दिलाया कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर उनके पुनर्वास और सुरक्षा की दिशा में काम कर रही हैं।
दौरे के दौरान सुरक्षा-व्यवस्था बेहद सख़्त रही। इम्फाल के कांगला फोर्ट और चुराचंदपुर के पीस ग्राउंड समेत सभी कार्यक्रम स्थलों के आसपास केंद्रीय सुरक्षा बल और राज्य पुलिस की भारी तैनाती की गई। यातायात व्यवस्था को भी सख्ती से नियंत्रित किया गया ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।
हालाँकि इस यात्रा को लेकर स्थानीय प्रतिक्रिया मिश्रित रही। जहाँ कई नागरिकों और प्रभावित परिवारों ने इसे “आशा की किरण” बताया और कहा कि लंबे समय बाद केंद्र सरकार का शीर्ष नेतृत्व उनके बीच आया है, वहीं कुछ समूहों और विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाए कि प्रधानमंत्री को इतनी देर से मणिपुर आना पड़ा। उनका मानना है कि सिर्फ योजनाएँ और फंड ही काफी नहीं होंगे, बल्कि तत्काल मानवीय राहत और हिंसा पर जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह पैकेज अगर पारदर्शिता और समयबद्ध तरीके से लागू किया गया तो राज्य में विकास और स्थिरता लौट सकती है। लेकिन वास्तविक परिणाम तभी दिखेंगे जब स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी और विस्थापित परिवारों को ठोस पुनर्वास और सुरक्षा की गारंटी मिलेगी।




