फर्जी पहचान से देश में घुसपैठ: पासपोर्ट से वोटर कार्ड तक बन रही ‘आतंक की छिपी पनाहगाह’

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देश की सुरक्षा एजेंसियां लगातार यह चेतावनी दे रही हैं कि फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर विदेशी नागरिक भारत में प्रवेश कर रहे हैं और यहां टिकाऊ ठिकाना बना रहे हैं। हाल ही में गुजरात एटीएस ने एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश किया, जिसमें एक बांग्लादेशी नागरिक और उसके साथियों पर आरोप है कि उन्होंने न केवल खुद के लिए, बल्कि दर्जनों अन्य लोगों के लिए भारतीय पासपोर्ट और वोटर कार्ड जैसे पहचान पत्र बनवाए। जांच में यह भी सामने आया कि इन दस्तावेजों को तैयार करने के लिए सरकारी निकायों के लेटरहेड तक की नकल की गई थी। छापेमारी में पुलिस को फर्जी दस्तावेज़, कम्प्यूटर टेम्पलेट और अन्य उपकरण मिले। अधिकारियों ने इसे सिर्फ धोखाधड़ी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया।

यह पहला मामला नहीं है। दिल्ली और अन्य महानगरों में भी समय-समय पर ऐसे गिरोह पकड़े गए हैं जो फर्जी आधार, पैन, वोटर कार्ड और पासपोर्ट बनवाने का धंधा चला रहे थे। ऐसे दस्तावेजों के सहारे विदेशी नागरिक न सिर्फ भारत में रह रहे हैं, बल्कि बैंक खाता, मोबाइल सिम और यहां तक कि वोटर सूची में भी नाम दर्ज करा ले रहे हैं। कुछ मामलों में वकील और पूर्व पुलिसकर्मी जैसे पेशेवर लोग भी इस अवैध कारोबार में शामिल पाए गए। इससे साफ है कि यह समस्या केवल सीमा पार से आने वाले घुसपैठियों तक सीमित नहीं, बल्कि भीतर से भी इसमें सहयोग मिल रहा है।

गृह मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सख्त निर्देश जारी किए हैं कि वे संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करें। मंत्रालय ने कहा है कि जिलों में नोडल अफसर नियुक्त किए जाएं और पकड़े गए लोगों का बायोमेट्रिक डेटा तुरंत UIDAI, पासपोर्ट विभाग और चुनाव आयोग के डेटाबेस से मिलान किया जाए। इसके साथ ही पुराने लाभार्थियों की दोबारा समीक्षा करने और फर्जी दस्तावेज धारियों को चिन्हित कर कानूनी कार्रवाई करने के आदेश दिए गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि फर्जी पहचान पत्र बन जाने से आतंकियों और जिहादी नेटवर्क को भारत में सुरक्षित ठिकाना, वित्तीय मदद और संचार व्यवस्था आसानी से मिल सकती है। यही वजह है कि इन गिरोहों को ‘आतंक की नर्सरी’ कहा जा रहा है। इसके अलावा, यदि कोई विदेशी वोटर सूची में शामिल हो जाता है तो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता भी खतरे में पड़ सकती है।

गुजरात के मामले में आरोप है कि मुख्य आरोपी 2012 में भारत आया और 2017 में फर्जी कागज़ों के सहारे खुद का पासपोर्ट बनवाया। इसके बाद उसने दर्जनों लोगों को भारतीय पहचान पत्र दिलवाने का काम शुरू कर दिया। एटीएस ने उसके खिलाफ पासपोर्ट अधिनियम, विदेशी अधिनियम और धोखाधड़ी से जुड़े कानूनों के तहत मामला दर्ज किया है। अधिकारियों ने साफ कहा है कि यह सिर्फ कागज़ी गड़बड़ी नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर मामला है।

सुरक्षा एजेंसियां जनता से भी अपील कर रही हैं कि वे किसी अनजान व्यक्ति को पहचान पत्र बनाने में सहयोग न करें और घर किराये या नौकरी पर रखने से पहले दस्तावेज़ों की पूरी तरह जांच करें। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस समस्या पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो यह भविष्य में आतंकी गतिविधियों के लिए बेहद खतरनाक ज़मीन तैयार कर सकती है।

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