अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर पूर्व राष्ट्रपति बाराक ओबामा को लेकर तीखा हमला बोला है। ट्रम्प ने हाल ही में दिए एक बयान में कहा कि “ओबामा ने कुछ नहीं किया, फिर भी उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार दे दिया गया”। उन्होंने खुद के कार्यकाल की उपलब्धियों का हवाला देते हुए दावा किया कि उन्होंने कई ऐसे कदम उठाए जो वास्तव में शांति स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण थे, लेकिन उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।
ट्रम्प ने इस बयान के दौरान कहा कि उनके कार्यकाल में मध्य-पूर्व और अन्य क्षेत्रों में शांति समझौते करवाए गए, जिनमें इज़राइल-अब्राहम समझौता, गाजा में सीज़फायर और कई अंतरराष्ट्रीय वार्ताएं शामिल थीं। उन्होंने कहा कि इन प्रयासों के बावजूद “नोबेल कमेटी ने मुझे नजरअंदाज कर दिया”। ट्रम्प ने यह भी आरोप लगाया कि ओबामा को केवल लोकप्रियता और राजनीतिक प्रतीक के रूप में यह सम्मान दिया गया था, न कि किसी वास्तविक उपलब्धि के कारण।
वहीं, रिपोर्टों के अनुसार ट्रम्प के समर्थक और कुछ विदेशी नेता इस वर्ष नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनके नाम की सिफारिश कर चुके हैं। माना जा रहा है कि माल्टा और नॉर्वे के कुछ राजनयिकों ने भी ट्रम्प के नाम का समर्थन किया है। यह कदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रम्प के प्रति बढ़ते राजनीतिक समर्थन के रूप में देखा जा रहा है।
दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि नोबेल पुरस्कार एक स्वतंत्र संस्था द्वारा तय किया जाता है और इसका मूल्यांकन केवल राजनीतिक लोकप्रियता या आत्म-प्रचार पर आधारित नहीं होता। विशेषज्ञों का मानना है कि नोबेल कमेटी उम्मीदवारों के दीर्घकालिक योगदान, विश्व शांति पर वास्तविक प्रभाव और कूटनीतिक स्थिरता को ध्यान में रखकर निर्णय लेती है। ऐसे में ट्रम्प के दावे अधिकतर राजनीतिक स्वरूप लेते नजर आ रहे हैं।
ट्रम्प की टिप्पणी के बाद अमेरिकी मीडिया में यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उनके समर्थकों ने जहां इस बयान का समर्थन किया, वहीं ओबामा के प्रशंसकों ने इसे एक “राजनीतिक जलन” करार दिया। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने कहा कि नोबेल शांति पुरस्कार का राजनीतिकरण चिंताजनक है और इसे अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयासों से जोड़कर देखना ही उचित होगा।




