इजरायल और हमास के बीच हालिया संघर्षविराम को लेकर सामने आए नए खुलासों से पता चलता है कि यह समझौता सहज नहीं था, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की दबाव-युक्त रणनीति और मध्य पूर्वी देशों की सक्रिय कूटनीति का परिणाम था। अमेरिकी नेतृत्व में की गई इस कोशिश के तहत ट्रम्प प्रशासन ने गाज़ा में हिंसा को रोकने के लिए एक चरणबद्ध योजना तैयार की, जिसमें बंधकों की रिहाई और युद्धविराम के अलग-अलग चरण शामिल थे। रिपोर्टों के अनुसार, ट्रम्प ने कतर, मिस्र और तुर्की जैसे क्षेत्रीय साझेदारों के साथ लगातार संवाद बनाए रखा और दोनों पक्षों पर सख्त दबाव डालते हुए एक ऐसा वातावरण बनाया, जिसमें हमास को समझौते के लिए तैयार होना पड़ा।
हालांकि इस प्रक्रिया से इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। इजरायली मीडिया और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों ने संकेत दिया कि नेतन्याहू संघर्षविराम की कुछ शर्तों को लेकर नाखुश थे, विशेष रूप से गाज़ा में इजरायली सेना की मौजूदगी और हमास के पूर्ण निःशस्त्रीकरण को लेकर। नेतन्याहू का मानना था कि बिना हमास की सैन्य क्षमता खत्म किए संघर्षविराम से सुरक्षा को खतरा बना रहेगा। दूसरी ओर, ट्रम्प प्रशासन का उद्देश्य तत्काल मानवीय संकट को रोकना और बंधकों की सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित करना था। यही विरोधाभास दोनों नेताओं के बीच मतभेद का कारण बना। बताया जाता है कि ट्रम्प ने नेतन्याहू को सार्वजनिक रूप से चेताया था कि यदि इजरायल सहयोग नहीं करेगा, तो अमेरिका अपने कूटनीतिक कदमों की समीक्षा करेगा।
इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प पहलू ट्रम्प की तथाकथित ‘डेड कैट कूटनीति’ रही, जिसके तहत उन्होंने जानबूझकर कुछ ऐसे बयान दिए, जिनसे मीडिया और जनता का ध्यान भटकाया गया और विपक्ष को दबाव में लाया गया। ‘डेड कैट’ रणनीति दरअसल राजनीतिक संचार का एक तरीका है, जिसमें कोई नेता विवादास्पद या अप्रत्याशित बयान देकर माहौल को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश करता है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प ने इजरायल और हमास दोनों को खुलकर फटकार लगाकर ऐसा माहौल बनाया, जिससे दोनों को अपनी-अपनी राजनीतिक छवि बचाने के लिए बातचीत की मेज पर लौटना पड़ा।
हाल के घटनाक्रमों में दोहा में हमास नेताओं पर इजरायली हमले और उस पर ट्रम्प की कड़ी प्रतिक्रिया ने भी वार्ता की दिशा बदली। ट्रम्प ने कहा था कि “यदि दोनों पक्ष नहीं झुकेंगे, तो यह युद्ध हमेशा के लिए चल सकता है,” — इस तरह के बयान से अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा और कतर-मिस्र जैसे मध्यस्थ देशों को शांति वार्ता आगे बढ़ाने का मौका मिला। इसके परिणामस्वरूप हमास ने बंधकों की पहली खेप रिहा करने पर सहमति दी और इजरायल ने कुछ दिनों के युद्धविराम की घोषणा की।
विश्लेषकों का कहना है कि ट्रम्प की सख्त और अप्रत्याशित रणनीति ने तत्काल युद्धविराम तो दिला दिया, लेकिन यह दीर्घकालिक समाधान नहीं है। गाज़ा के पुनर्निर्माण, हमास के शस्त्रीकरण और इजरायल की सुरक्षा जैसी मूल समस्याएँ अभी भी जस की तस हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह “राजनीतिक जीत” भले ही दिखे, पर स्थायी शांति का रास्ता अभी लंबा है। वहीं, नेतन्याहू की असहमति और उनके घरेलू राजनीतिक दबावों से भी इस समझौते की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
वर्तमान स्थिति में संघर्षविराम का पहला चरण लागू हो चुका है, जिसमें बंधकों की रिहाई और सीमित मानवीय सहायता शामिल है। आगामी चरणों में स्थायी शांति के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से अमेरिका, मिस्र और कतर की भूमिका अहम रहेगी। यदि नेतन्याहू सरकार के भीतर मतभेद बढ़ते हैं या हमास किसी नई शर्त को लेकर पीछे हटता है, तो यह शांति समझौता फिर खतरे में पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, ट्रम्प की ‘डेड कैट कूटनीति’ ने अल्पकालिक शांति की राह तो खोली है, लेकिन इसके टिके रहने की गारंटी अभी नहीं है। गाज़ा और इजरायल के बीच बने इस अस्थायी संतुलन को बनाए रखने के लिए न केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की, बल्कि ईमानदार अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भी आवश्यकता होगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में यह संघर्षविराम स्थायी शांति में बदल पाता है या फिर इतिहास खुद को दोहराता है।




