बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राज्य की राजनीति में हलचल और तेज होती जा रही है। एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के भीतर भी सीट-बंटवारे को लेकर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा है कि उनकी पार्टी एनडीए के दो उम्मीदवारों के खिलाफ अपने प्रत्याशी उतारेगी। मांझी का यह कदम गठबंधन के भीतर बढ़ते तनाव और सीट-बंटवारे को लेकर असहमति का संकेत माना जा रहा है।
मांझी ने स्पष्ट कहा है कि उनकी पार्टी को एनडीए में “सम्मानजनक हिस्सेदारी” नहीं दी गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने एनडीए नेतृत्व से करीब 15 सीटों की मांग की थी, लेकिन उन्हें बहुत कम सीटें दी गईं। इसी के विरोध में अब उन्होंने उन दो सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का निर्णय लिया है, जिन पर एलजेपी (रामविलास) के उम्मीदवार खड़े हैं। बताया जा रहा है कि इनमें बोधगया और मखदुमपुर जैसी सीटें शामिल हैं, जो मांझी के राजनीतिक प्रभाव वाले इलाकों में आती हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री मांझी ने कहा कि उनका इरादा गठबंधन को तोड़ने का नहीं है, लेकिन वे “अपमान या उपेक्षा” को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने इसे “सम्मान की लड़ाई” बताया और कहा कि हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा का भी बिहार की राजनीति में एक मजबूत जनाधार है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मांझी के इस फैसले ने एनडीए के भीतर हलचल मचा दी है, क्योंकि इससे सीधे तौर पर गठबंधन के वोट बैंक में विभाजन का खतरा बढ़ गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मांझी का यह फैसला चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। एनडीए पहले से ही सीट-बंटवारे को लेकर आंतरिक खींचतान झेल रहा है — खासकर जेडीयू, बीजेपी और एलजेपी (रामविलास) के बीच तालमेल को लेकर। ऐसे में अगर मांझी की पार्टी स्वतंत्र रूप से कुछ सीटों पर उतरती है, तो यह विपक्षी गठबंधन महागठबंधन के लिए लाभकारी साबित हो सकता है।
हालांकि एनडीए नेतृत्व की ओर से अभी तक कोई औपचारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक बीजेपी और जेडीयू नेतृत्व मांझी को मनाने की कोशिशों में जुट गया है। गठबंधन के शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत चल रही है ताकि हालात को शांत किया जा सके और चुनाव से पहले एकता की तस्वीर पेश की जा सके।
मांझी ने पहले भी कई बार कहा था कि अगर उनकी पार्टी को बराबर सम्मान और पर्याप्त सीटें नहीं दी गईं, तो वे “अपना रास्ता खुद चुनने” के लिए स्वतंत्र हैं। अब उनका यह बयान उसी चेतावनी का परिणाम माना जा रहा है। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि उनकी पार्टी के कई कार्यकर्ता भी गठबंधन के रुख से असंतुष्ट हैं और “सम्मानजनक प्रतिनिधित्व” की मांग कर रहे हैं।
बिहार में विधानसभा चुनाव नवंबर महीने में दो चरणों में होने हैं — पहला चरण 6 नवंबर और दूसरा चरण 11 नवंबर को, जबकि मतगणना 14 नवंबर को होगी। ऐसे में मांझी का यह कदम ठीक चुनाव से पहले एनडीए के लिए एक चुनौती बन सकता है। अब देखना होगा कि क्या हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा अपने फैसले पर अडिग रहती है या बातचीत के बाद कोई समझौता होता है।
निष्कर्षतः, जीतन राम मांझी का यह निर्णय बिहार की राजनीति में नई हलचल लेकर आया है। जहां एक ओर यह एनडीए के भीतर असंतोष को उजागर करता है, वहीं दूसरी ओर यह साबित करता है कि छोटे सहयोगी दल अब अपनी राजनीतिक हैसियत के लिए खुलकर लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मांझी का यह दांव गठबंधन को कमजोर करता है या उन्हें राजनीतिक रूप से और मजबूती प्रदान करता है।




