केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार के विभिन्न जनसभाओं में एक तेवर भरी और लक्ष्यहीन न दिखने वाली भाषा में विपक्ष पर तीखा हमला बोला और बार-बार यह रेखांकित किया कि यह चुनाव केवल किसी एक विधायक या मंत्री को चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि बिहार किस दिशा में जाएगा—विकास और कानून-व्यवस्था की राह पर या फिर उस पुरानी असुरक्षा और हिंसा के दौर की ओर जहाँ ‘जंगलराज’ का भय आम नागरिकों की ज़िन्दगी पर हावी था; उन्होंने कहा कि मतदाता को अपने संवेदनशील और विवेकपूर्ण विचार से यह निर्णय लेना होगा ताकि राज्य को पीछे नहीं लौटने दिया जाए। शाह ने अपने उद्भोधन में महागठबंधन व खासकर आरजेडी पर व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर कटाक्ष किए, परिवारवाद व भ्रष्टाचार के आरोप दुहराए और कहा कि उन वर्षों की नीतियों ने न केवल विकास की रफ्तार रोक दी बल्कि कानून और व्यवस्था को भी जकड़ा रखा — उन्होंने स्थानीय और ऐतिहासिक तौर पर चर्चित हिंसा-प्रकरणों का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि राज्य की धरती पर उन वर्षों में कितनी भयानक घटनाएँ घटीं, जिनकी संतानों और परिवारों को सालों तक पीड़ा झेलनी पड़ी। शाह ने जनसभाओं में बथानी टोला, सोनारी और शंकरबीघा जैसे कांडों का निहितार्थ देकर यह दर्शाने की कोशिश की कि हिंसा और असुरक्षा के बीज तब बोये गए जब प्रशासनिक मज़बूती का अभाव था और राजनीतिक संरक्षण-सम्बन्धी आरोप छाए रहे; उनका उद्देश्य स्पष्ट था—मतदाताओं में भय-निरोधक भावना पैदा कर के यह संदेश देना कि विकास के लिए सुरक्षित वातावरण अनिवार्य है और इसके लिये मजबूत नेतृत्व की जरूरत है। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि एनडीए की नीतियों ने पिछले वर्षों में कई ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे महिलाओं, किसानों और गरीब तबके को सीधी मदद पहुँची और राज्य के अविकसित इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार की नींव रखी गई, इसलिए लोगों से आग्रह है कि वे विकास और सुरक्षा के नाम पर NDA को मौका दें।
शाह ने रैलियों में राज्य के उद्योग, अवसंरचना और रोजगार से जुड़े वादों का भी ज़िक्र किया—उनका कहना था कि बंद पड़ी चीनी मिलों को पुनः चालू करने, पुलों व हवाई कनेक्टिविटी जैसे बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने तथा कौशल व निवेश की योजनाओं से बिहार को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जा सकता है; इन दावों को उन्होंने केंद्र सरकार की कुछ नीतियों और परियोजनाओं के उदाहरणों से जोड़ा और कहा कि यदि यूँ ही विपक्ष के पुराने तरीके लौटे तो इन योजनाओं का क्रियान्वयन रुक सकता है और विकास की हानि होगी। इस क्रम में उन्होंने विरोधी नेताओं पर कटाक्ष भी किये—कहा कि कुछ नेता शोरगुल और हमलावर भाषणों के द्वारा ध्यान भटका रहे हैं जबकि वास्तविक मुद्दों पर बात नहीं करते, और मतदाताओं को उन झूठे वादों से सावधान रहना चाहिए जो केवल चुनावी लाभ के लिए उठाए जाते हैं।
उनके संबोधनों का स्वर सरल परन्तु चुनिंदा बयान अक्सर तीखे रहे—न केवल स्थानीय मुद्दों पर, बल्कि राष्ट्रीय और व्यक्तिगत स्तर पर भी विपक्ष के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया; राहुल गांधी, सोनिया गांधी और अन्य विपक्षी हस्तियों के बार-बार संदर्भ दिए गए और उन पर आरोप लगाए गए कि वे देश एवं राज्य के विकास को लेकर स्पष्ट नीति नहीं रख रहे। शाह की भाषा में बार-बार वह थीम उभरती रही कि ‘जो विकास और कानून-व्यवस्था के लिये ठोस परिणाम दे सकता है, वही शासन के लिए बेहतर है’, और इसे वे पुरानी हिंसा और ‘जंगलराज’ के बादल से जोड़कर बताते रहे।
इस पूरे प्रचार अभियान में शाह ने चुनावी दंगल को केवल संख्या का संघर्ष बताकर छोड़ दिया नहीं वरन इसे एक नैतिक तथा प्रशासकीय विकल्प के रूप में भी प्रस्तुत किया—उनके मुताबिक वोट सिर्फ प्रतिनिधि चुनने का कदम नहीं, बल्कि भविष्य के संवैधानिक व नागरिक मूल्यों के पक्ष में खड़े होने का संकेत है। उन्होंने सभा के माहौल और जनसमर्थन का हवाला देते हुए कहा कि लोग विकास, कानून-व्यवस्था और रोज़गार को लेकर गंभीर हैं और वोट इसी आधार पर करेंगे। वहीं विपक्ष और उसके गठबंधनों ने शाह के आरोपों का प्रत्युत्तर विभिन्न मंचों और सोशल मीडिया पर दिया, कुछ ने शाह के विकास वादों पर प्रश्न उठाए तो कुछ ने पुरानी घटनाओं के राजनीतिक उपयोग की कड़ी आलोचना की।
कुल मिलाकर अमित शाह के भाषणों ने बिहार चुनाव की तस्वीर को अधिक धारदार बनाया—एक ओर जहाँ वह पुरानी हिंसा और असुरक्षा के आरोपों को सामने रखकर भय से वोट माँगते दिखे, वहीं दूसरी ओर विकास, सामाजिक कल्याण और अवसंरचना के वादों के माध्यम से आश्वासन भी देते रहे; इन सभाओं का उद्देश्य मतदाताओं के निर्णय को काटने-छांटने वाला बनाना था ताकि वोटिंग के दिन प्रदेश का चुनाव केवल स्थानीय उम्मीदवार तक सीमित न रहे बल्कि बड़े सवाल — सुरक्षा, न्याय और विकास — पर भी जवाबदेही माँगता हुआ दिखे। इस कवायद का असर चुनावी माहौल पर कैसा पड़ेगा, यह आने वाले दिनों में मतदाताओं की प्राथमिकताओं और विपक्ष के प्रत्युत्तरों पर निर्भर करेगा, परन्तु फिलहाल अमित शाह के शब्द और उनके द्वारा उठाये गये मुद्दे बिहार की चुनावी बहस में प्रमुख केन्द्र बने हुए हैं।




