हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की सैंज घाटी के दुर्गम पहाड़ी इलाके में स्थित धारा-पोरिए गांव ने रविवार को अपने जीवन का ऐतिहासिक पल देखा। गांव में पहली बार बिजली का बल्ब जला तो पूरा इलाका खुशी से झूम उठा। लंबे समय से मोमबत्ती और लालटेन की रोशनी में जी रहे ग्रामीणों के लिए यह क्षण किसी त्योहार से कम नहीं था। बच्चों ने उत्साह से तालियां बजाईं, जबकि बुजुर्गों की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। यह सिर्फ रोशनी आने का दिन नहीं था, बल्कि दशकों से इंतजार कर रही उम्मीदों का पूरा होने का भी पल था।
धारा-पोरिए गांव बेहद छोटा है और यहां मात्र चार परिवार रहते हैं। अब तक इस गांव तक बिजली पहुंचाना तकनीकी और भौगोलिक दृष्टि से एक बड़ी चुनौती रहा है। यहां तक पहुंचने के लिए चार किलोमीटर लंबी पगडंडी पर खड़ी चढ़ाई पार करनी पड़ती है। बिजली विभाग के कर्मचारियों और तकनीकी टीम ने शैंशर से लेकर गांव तक करीब दस बिजली के खंभे अपने कंधों पर ढोकर लगाए। कठिन मौसम और दुर्गम पहाड़ी रास्तों के बावजूद उन्होंने लगातार मेहनत की और आखिरकार गांव को रोशन कर दिया।
बिजली के साथ ही यहां पहली बार मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट कनेक्टिविटी भी पहुंची है। इससे ग्रामीणों में नई उम्मीदें जगी हैं। बच्चों का कहना है कि अब वे रात में भी पढ़ाई कर सकेंगे, जबकि महिलाओं ने बताया कि अब उन्हें शाम के कामों में आसानी होगी। गांव के बुजुर्गों ने कहा कि अगर यह सुविधा पहले आ जाती, तो कई दिक्कतों से राहत मिल जाती।
कुल्लू जिले के प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, जिले के चार उपमंडलों — कुल्लू, मनाली, बंजार और आनी — में अभी भी करीब 20 से अधिक ऐसे छोटे गांव या उपगांव हैं, जहां अब तक बिजली नहीं पहुंच सकी है। सैंज घाटी के कुछ और दुर्गम इलाकों जैसे शाक्टी, मरौड़ और शुगाड़ अभी भी अंधेरे में हैं। ऐसे में धारा-पोरिए में बिजली पहुंचना एक प्रतीकात्मक उपलब्धि है जो बताती है कि हिमालयी गांवों में विकास की किरण धीरे-धीरे पहुंच रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बिजली सिर्फ रोशनी नहीं लाती, बल्कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और जीवन-स्तर में बदलाव की शुरुआत है। जिस दिन धारा-पोरिए गांव में पहला बल्ब जला, उस दिन सिर्फ घर नहीं, बल्कि उम्मीदों की पूरी घाटी जगमगा उठी।




