भारत जल्द ही रूस से कच्चे तेल के सीधे आयात में बड़ी कटौती करने की तैयारी कर रहा है। हाल ही में अमेरिका और यूरोप द्वारा रूस की प्रमुख ऊर्जा कंपनियों जैसे Rosneft और Lukoil पर लगाए गए नए प्रतिबंधों के चलते भारतीय रिफाइनरों के लिए सीधे सौदे करना जोखिमपूर्ण हो गया है। सूत्रों के अनुसार, भारत की सरकारी और निजी रिफाइनिंग कंपनियाँ नवंबर से दिसंबर 2025 के बीच रूस से होने वाली नई सीधी खरीद को रोकने या घटाने का निर्णय ले रही हैं। यह कदम इसलिए भी उठाया जा रहा है क्योंकि बैंकिंग और बीमा लेन-देन पर बढ़ते प्रतिबंधों के कारण भुगतान और आपूर्ति दोनों में दिक्कतें आ रही हैं।
रूस 2022 से भारत का एक बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया था, खासतौर पर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बाद। भारत ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए रियायती दामों पर रूसी कच्चा तेल बड़ी मात्रा में खरीदा था। वर्ष 2025 के शुरुआती नौ महीनों में भारत ने औसतन 1.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन के आसपास रूसी तेल का आयात किया। लेकिन अब भू-राजनीतिक दबाव, बढ़ती जटिलताओं और अमेरिकी निगरानी के कारण भारतीय कंपनियाँ अपने आयात स्रोतों को विविध बनाने पर विचार कर रही हैं।
सूत्र बताते हैं कि भारतीय तेल निगम (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसे राज्य-नियंत्रित रिफाइनर फिलहाल नई रूसी डील्स पर रोक लगा चुके हैं। वहीं कुछ निजी रिफाइनर जैसे रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी भी अपने कॉन्ट्रैक्ट्स की समीक्षा कर रहे हैं। इसके साथ ही, कंपनियाँ अब मध्यपूर्व, अमेरिका और अफ्रीका जैसे देशों से वैकल्पिक तेल खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं ताकि घरेलू आपूर्ति पर असर न पड़े।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी घटने से भारत की रिफाइनिंग लागत में इज़ाफ़ा हो सकता है। रियायती तेल की जगह महंगे स्रोतों से खरीद करने पर उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिसका असर पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, सरकार की कोशिश है कि ईंधन की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी न होने पाए। इसके लिए रिफाइनरों को विविध आपूर्ति चैनल और बेहतर लॉजिस्टिक व्यवस्थाएं बनाने के निर्देश दिए गए हैं।
भू-राजनीतिक स्तर पर यह निर्णय भारत की संतुलित विदेश नीति का हिस्सा माना जा रहा है। एक ओर भारत रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंध बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर उसे पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबावों को भी ध्यान में रखना पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले महीनों में भारत के ऊर्जा आयात स्रोत और रणनीतिक साझेदारियों में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
इस प्रकार, रूस से सीधे तेल आयात में कटौती भारत की एक सोची-समझी रणनीति है, जो न केवल अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश है बल्कि ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में भी एक आवश्यक कदम है।




