कनाडा की राजधानी ऑटावा में आयोजित एक अनौपचारिक “खालिस्तान रिफरेन्डम” कार्यक्रम ने एक बार फिर भारत और कनाडा के बीच तनाव को हवा दे दी है। कार्यक्रम के दौरान कुछ खालिस्तानी समर्थकों ने भारतीय तिरंगे का अपमान करते हुए उसे सड़क पर फेंक दिया और पैरों से रौंदा। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में स्पष्ट देखा गया कि भीड़ में मौजूद कुछ लोग भारत विरोधी नारेबाज़ी कर रहे थे और उकसाने वाली गतिविधियों में शामिल थे। इस घटना ने भारतीय समुदाय के बीच गहरा आक्रोश पैदा किया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं।
इस आयोजन को ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) जैसे समूहों ने संचालित किया, जो लंबे समय से खालिस्तान समर्थक गतिविधियों को बढ़ावा देते रहे हैं। आयोजकों का दावा था कि विभिन्न प्रांतों—ऑन्टारियो, ब्रिटिश कोलंबिया, क्यूबेक और अल्बर्टा—से लोग बड़ी संख्या में पहुंचे, हालांकि कई वीडियो क्लिपों में भीड़ का एक हिस्सा ही नज़र आता है। कार्यक्रम के दौरान कुछ अति-उत्साही तत्वों ने ऐसे नारे लगाए, जिनसे स्पष्ट होता है कि इस आयोजन का उद्देश्य शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति कम और राजनीतिक उकसावे अधिक था। यह पहली बार नहीं है जब ऐसे कार्यक्रमों में भारत-विरोधी हरकतें की गई हों; पिछले कुछ वर्षों में कनाडा के कई शहरों में इसी तरह की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं।
भारत और कनाडा के बीच पिछले समय से रिश्तों में तनाव बना हुआ है, खासकर तब से जब कनाडाई नेतृत्व की कुछ टिप्पणियों और जांच मामलों ने द्विपक्षीय विश्वास को प्रभावित किया था। इस पृष्ठभूमि में ऑटावा में हुई ताज़ा घटना कूटनीतिक स्तर पर नई चुनौतियाँ पैदा कर सकती है। भारत पहले भी ऐसी गतिविधियों पर आपत्ति जता चुका है और कनाडाई सरकार से भारतीय मिशनों और समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग करता रहा है। भारतीय मूल के कई लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस घटना का विरोध किया और तिरंगे के सम्मान में शांतिपूर्ण रैलियों का भी आयोजन किया।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन घटनाओं का प्रभाव सिर्फ़ प्रवासी समुदाय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह दोनों देशों की विदेश नीति और पारस्परिक सहयोग पर भी असर डालता है। कनाडा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा व्यापक है, लेकिन अनेक बार इसका लाभ लेकर कुछ चरमपंथी समूह उग्र विचारधाराओं को मंच दे देते हैं। इस स्थिति में स्थानीय प्रशासन के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना और समुदायों के बीच तनाव को नियंत्रित करना भी चुनौती बन जाता है।
ऑटावा की घटना ने यह फिर साबित कर दिया कि खालिस्तान समर्थक गतिविधियों को लेकर कनाडा की धरती पर अभी भी पर्याप्त खतरा बना हुआ है। भारत ने कड़ा संदेश देते हुए इन मामलों पर गंभीरता से कार्रवाई की आवश्यकता दोहराई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएँ, यदि समय रहते नियंत्रित न की गईं, तो द्विपक्षीय संबंधों में और खाई पैदा कर सकती हैं। फिलहाल दोनों देशों के बीच संवाद जारी है, लेकिन घटनाओं की यह श्रृंखला बताती है कि समाधान सिर्फ़ कूटनीतिक बयानबाज़ी से नहीं, बल्कि ठोस कदमों से ही संभव होगा।




