राजस्थान में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और टोंक विधायक सचिन पायलट ने अवैध प्रवासियों और मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर केंद्र सरकार और भाजपा पर सीधे सवाल दागे हैं। अपने हालिया दौरे के दौरान उन्होंने पूछा कि पिछले 11 साल में देश से कितने अवैध प्रवासियों को निष्कासित किया गया, जबकि भाजपा इस मुद्दे को लगातार चुनावी मंचों पर उठाती रही है। पायलट ने कहा कि अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाज़ी करने के बजाय केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वास्तविक कार्रवाई के स्तर पर क्या कदम उठाए गए और कितने लोगों को कानूनी प्रक्रिया के तहत देश से बाहर भेजा गया। उनके अनुसार, यदि सरकार और संबंधित एजेंसियों ने सख्त कार्रवाई की है तो उसके ठोस आंकड़े जनता के सामने आने चाहिए, ताकि भ्रम और प्रचार के बजाय वास्तविकता पर बात हो सके।
उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर भी गंभीर आपत्ति जताई और कहा कि मतदाता सूची से जुड़े ऐसे संवेदनशील अभियानों में पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है। पायलट का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता महत्वपूर्ण है, पर प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे किसी समुदाय या समूह को निशाना बनाए जाने की आशंका न पैदा हो। उन्होंने आग्रह किया कि यदि मतदाता सूची में गड़बड़ियों से जुड़े दस्तावेज़ या रिपोर्ट हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाए और किसी भी कार्रवाई को निष्पक्ष तरीके से अंजाम दिया जाए। पायलट का मानना है कि पारदर्शिता के बिना ऐसे अभियान लोगों में शंका और अविश्वास बढ़ाते हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए उचित नहीं है।
सचिन पायलट ने अपने जनसम्पर्क अभियानों के दौरान यह भी कहा कि कई क्षेत्रों में स्थानीय समस्याएँ—विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा, अपराध और प्रशासनिक लापरवाही—अब भी गंभीर रूप ले रही हैं, लेकिन भाजपा सरकार इन मुद्दों से अधिक ध्यान राजनीतिक बयानबाज़ी पर दे रही है। उन्होंने कहा कि यदि भाजपा सरकार असम या अन्य राज्यों में अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई का दावा करती है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि पिछले वर्षों में उन कार्रवाइयों का वास्तविक परिणाम क्या रहा। पायलट का आरोप है कि बिना आंकड़ों और तथ्यों के दिए गए बयानों का मकसद केवल राजनीतिक लाभ उठाना होता है, जबकि जनता वास्तविकताओं और जवाबदेही की अपेक्षा करती है।
उनके अनुसार अवैध प्रवासी, मतदाता सूची, और SIR जैसे संवेदनशील मुद्दों को चुनावी टूल के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय इन्हें कानून और संविधान के दायरे में गंभीरता से संभाला जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार या चुनाव आयोग के पास पर्याप्त सबूत हैं, तो कार्रवाई दिखाई देनी चाहिए और उसके परिणाम भी पारदर्शी रूप से जनता तक पहुंचने चाहिए। अन्यथा, इस तरह के मुद्दे सिर्फ भय और भ्रम पैदा करने वाले साबित होते हैं—जबकि राष्ट्रहित में इनका समाधान तथ्यों और निष्पक्ष नीतियों के आधार पर होना चाहिए।




