मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। नामांकन वापसी की अंतिम तिथि के बाद सामने आई तस्वीर ने राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी है। महायुति गठबंधन के कुल 68 प्रत्याशी बिना मतदान के ही निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए हैं। इनमें सबसे अधिक 44 उम्मीदवार अकेले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बताए जा रहे हैं, जबकि शेष सीटें गठबंधन के अन्य सहयोगी दलों के खाते में गई हैं।
चुनावी जानकारों के अनुसार, इन वार्डों में विपक्षी दलों द्वारा नामांकन न भरे जाने या अंतिम समय में नाम वापस ले लिए जाने के कारण मुकाबला एकतरफा हो गया। कई वार्डों में नामांकन प्रक्रिया के दौरान राजनीतिक सहमति, रणनीतिक समझौते और स्थानीय समीकरणों की भी चर्चा है। यही वजह है कि मतदान से पहले ही बड़ी संख्या में प्रत्याशियों का निर्विरोध चुना जाना असामान्य माना जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि कुछ वार्डों में दबाव, प्रशासनिक भूमिका और चुनावी माहौल को लेकर शिकायतें मिली हैं। इन आरोपों के बीच राज्य निर्वाचन आयोग ने भी मामले को संज्ञान में लिया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि निर्विरोध निर्वाचन की प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के तहत हुई है या नहीं, इसकी जांच की जाएगी। यदि किसी स्तर पर आचार संहिता या चुनावी नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
भाजपा और महायुति नेताओं का कहना है कि यह उनकी संगठनात्मक मजबूती और जमीनी पकड़ का परिणाम है। उनका दावा है कि विपक्ष की कमजोर तैयारी और अंदरूनी कलह के चलते कई वार्डों में उम्मीदवार ही सामने नहीं आए। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में निर्विरोध जीतें आने वाले चुनावी रुझानों और BMC की सत्ता संरचना पर गहरा असर डाल सकती हैं।
अब सबकी नजरें राज्य निर्वाचन आयोग की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि आयोग की जांच में क्या निष्कर्ष निकलते हैं और क्या इसका BMC चुनाव की आगे की प्रक्रिया पर कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं।




