ईरान इन दिनों बड़े राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है, जहां सरकार के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन लगातार तेज होते जा रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी, मुद्रा की गिरती कीमत और सख्त शासन व्यवस्था से नाराज लोग सड़कों पर उतर आए हैं। राजधानी तेहरान सहित कई बड़े शहरों में हजारों लोग सरकार विरोधी नारे लगाते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं, जिसे ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद का सबसे बड़ा जन आंदोलन माना जा रहा है।
इन प्रदर्शनों पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी खुलकर प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान आज़ादी की ओर बढ़ रहा है और अमेरिका ईरानी जनता को आज़ादी दिलाने के लिए तैयार है। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि ईरानी लोग अपने अधिकारों के लिए खड़े हुए हैं और अमेरिका उनकी आवाज़ का समर्थन करता है। ट्रंप के इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है और इसे ईरान के आंतरिक मामलों में दखल के तौर पर देखा जा रहा है।
वहीं दूसरी ओर ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्ला अली खामेनेई ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बेहद सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि सरकार के खिलाफ साजिश रचने वालों, प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने वालों और हिंसा फैलाने वालों को देश का दुश्मन माना जाएगा। ईरानी कानून के तहत ऐसे लोगों को “अल्लाह का दुश्मन” करार देकर मौत की सजा तक दी जा सकती है। सरकार का कहना है कि विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है और यह देश की सुरक्षा के लिए खतरा है।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए ईरानी प्रशासन ने कई इलाकों में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद कर दी हैं ताकि विरोध प्रदर्शनों की जानकारी फैलने से रोकी जा सके। सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच कई जगह झड़पें भी हुई हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मौत और हजारों की गिरफ्तारी की खबरें सामने आई हैं। मानवाधिकार संगठनों ने सरकार की कार्रवाई पर गंभीर चिंता जताई है और इसे नागरिक अधिकारों का दमन बताया है।
इस बीच ईरान के पूर्व शाह के बेटे रेज़ा पहलवी ने भी प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया है और उन्हें संघर्ष जारी रखने की अपील की है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी ईरानी जनता के समर्थन में आगे आने का आग्रह किया है। कुल मिलाकर ईरान में जारी विरोध प्रदर्शन अब एक बड़े राजनीतिक टकराव में बदल चुके हैं, जहां एक ओर जनता बदलाव की मांग कर रही है तो दूसरी ओर शासन सख्ती से आंदोलन को दबाने की कोशिश में जुटा है।




