विश्व आर्थिक मंच (WEF) की हालिया रिपोर्ट ने तकनीकी विकास और प्रकृति पर उसके बढ़ते प्रभाव को लेकर गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में हर साल करीब 60 अरब किलोग्राम से अधिक इलेक्ट्रॉनिक कचरा (ई-कचरा) पैदा हो रहा है, जो पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इस ई-कचरे का केवल लगभग 20 से 22 प्रतिशत ही औपचारिक रूप से रिसाइक्लिंग के जरिए निपटाया जाता है, जबकि बाकी हिस्सा लैंडफिल या खुले में फेंक दिया जाता है, जिससे मिट्टी, पानी और हवा तीनों ही प्रदूषित हो रहे हैं।
WEF की रिपोर्ट बताती है कि स्मार्टफोन, लैपटॉप, डेटा सेंटर, क्लाउड सर्विस और सेमीकंडक्टर जैसे तकनीकी उत्पादों की बढ़ती मांग प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव डाल रही है। सेमीकंडक्टर निर्माण में हर साल अरबों लीटर ताजे पानी का इस्तेमाल होता है, वहीं तकनीकी उपकरणों के लिए जरूरी खनिजों और ऊर्जा की खपत भी तेजी से बढ़ रही है। ई-कचरे में मौजूद पारा, लेड और अन्य जहरीले रसायन मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता दोनों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि सरकारें और तकनीकी कंपनियां समय रहते टिकाऊ उत्पादन, बेहतर रिसाइक्लिंग और सर्कुलर इकोनॉमी को नहीं अपनाती हैं, तो तकनीकी प्रगति धीरे-धीरे प्रकृति पर भारी पड़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा रफ्तार से ई-कचरे में वृद्धि जारी रही तो वर्ष 2030 तक यह आंकड़ा 80 मिलियन टन से भी अधिक हो सकता है। ऐसे में तकनीक को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में ठोस और सामूहिक कदम उठाना अब समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।




