रुपये को लगा तगड़ा झटका: अमेरिकी डॉलर के सामने रिकॉर्ड निचले स्तर पर

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अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया इन दिनों भारी दबाव में दिखाई दे रहा है और हाल ही में यह गिरकर करीब 92 रुपये प्रति डॉलर के ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुंच गया। विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की यह कमजोरी केवल एक दिन या एक वजह का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारण एक साथ काम कर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर की मजबूती ने लगभग सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को प्रभावित किया है, जिसमें भारतीय रुपया भी शामिल है। अमेरिका में ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहने की उम्मीद के चलते निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी है और रुपये पर दबाव बना है।

रुपये की गिरावट का एक बड़ा कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से लगातार पूंजी निकासी भी है। जब विदेशी निवेशक अपना पैसा निकालते हैं, तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं, जिससे डॉलर की मांग और बढ़ जाती है और रुपये की कीमत और कमजोर हो जाती है। इसके अलावा एशियाई बाजारों में भी कमजोरी का माहौल रहा है, जिसका असर भारतीय मुद्रा पर देखने को मिला है। वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उतार-चढ़ाव ने निवेशकों की धारणा को कमजोर किया है।

भारत की आयात निर्भरता भी रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है। देश बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और सोना आयात करता है, जिसके लिए डॉलर की जरूरत होती है। रुपये के कमजोर होने से इन आयातों का बिल और महंगा हो जाता है, जिससे चालू खाते पर दबाव बढ़ता है। वहीं, आयातक कंपनियां भविष्य में रुपये के और कमजोर होने की आशंका को देखते हुए हेजिंग करती हैं, जिससे बाजार में डॉलर की मांग और तेज हो जाती है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए समय-समय पर बाजार में हस्तक्षेप किया है, लेकिन केंद्रीय बैंक का रुख यह रहा है कि वह रुपये को किसी एक तय स्तर पर रोकने के बजाय बाजार की परिस्थितियों के अनुसार संतुलन बनाए रखे। जानकारों का मानना है कि RBI के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है, जिससे वह जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप कर सकता है।

रुपये की इस गिरावट का असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है। आयातित वस्तुएं महंगी होने से महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है, वहीं विदेश यात्रा, विदेश में पढ़ाई और विदेशी ऑनलाइन सेवाओं का खर्च भी बढ़ सकता है। हालांकि दूसरी ओर निर्यातकों के लिए यह स्थिति कुछ हद तक फायदेमंद हो सकती है, क्योंकि कमजोर रुपया उनके निर्यात को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाता है। कुल मिलाकर, विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक हालात और विदेशी निवेश का रुख नहीं बदलता, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है।

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