विपक्ष के प्रदर्शन से ठप पड़ी संसद, स्पीकर ने दिलाई नियमों की याद

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नई दिल्ली: संसद के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में उस समय तीखा हंगामा देखने को मिला, जब विपक्षी सांसदों ने तख्तियों के साथ नारेबाजी शुरू कर दी और वेल में आकर विरोध प्रदर्शन करने लगे। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही शोरगुल बढ़ गया, जिससे प्रश्नकाल सहित अन्य महत्वपूर्ण संसदीय कार्य बाधित हो गए। विपक्ष का आरोप था कि सरकार उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है और कई अहम राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा से बच रही है। वहीं सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर जानबूझकर सदन का समय बर्बाद करने और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने का आरोप लगाया।

हंगामे के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कड़ा रुख अपनाते हुए विपक्षी सांसदों को सख्त फटकार लगाई। स्पीकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है और यहां व्यवहार भी उसी स्तर का होना चाहिए। उन्होंने कहा कि तख्तियां दिखाना, नारेबाजी करना और वेल में आकर प्रदर्शन करना संसदीय नियमों और परंपराओं के खिलाफ है। ओम बिरला ने विपक्ष को मर्यादा का पाठ पढ़ाते हुए कहा कि असहमति व्यक्त करने के लिए नियमों के भीतर कई लोकतांत्रिक तरीके उपलब्ध हैं, लेकिन हंगामे के जरिए सदन का कामकाज रोकना स्वीकार्य नहीं है।

स्पीकर ने यह भी कहा कि संसद की कार्यवाही देश के करोड़ों नागरिक देखते हैं और सांसदों का आचरण जनता के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करता है। ऐसे में सदन में अनुशासनहीनता न केवल लोकतंत्र की छवि को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि जनता का विश्वास भी कमजोर करती है। उन्होंने सभी दलों से अपील की कि वे राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सदन की गरिमा बनाए रखें और सार्थक चर्चा के माध्यम से जनहित के मुद्दों को उठाएं।

लगातार शोरगुल और व्यवधान के चलते लोकसभा की कार्यवाही को पहले कुछ समय के लिए और बाद में दिन भर के लिए स्थगित करना पड़ा। इससे कई महत्वपूर्ण विधायी और नीतिगत मुद्दों पर चर्चा नहीं हो सकी। विपक्षी दलों का कहना था कि वे अपनी मांगों और सवालों को लेकर मजबूरन विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया जा रहा। वहीं सरकार ने कहा कि विपक्ष जानबूझकर हंगामा कर संसद की कार्यवाही को पटरी से उतार रहा है।

कुल मिलाकर, लोकसभा में हुआ यह घटनाक्रम सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ते राजनीतिक टकराव को दर्शाता है। बजट सत्र जैसे महत्वपूर्ण समय में सदन का बार-बार स्थगित होना न केवल संसदीय कार्यवाही के लिए नुकसानदेह है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर भी सवाल खड़े करता है। अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि आने वाले दिनों में संसद का कामकाज किस तरह से सामान्य हो पाता है।

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