सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला पर सुनवाई, महिलाओं के अधिकार बनाम आस्था की बहस तेज

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केरल स्थित Sabarimala Temple से जुड़े बहुचर्चित प्रवेश विवाद पर Supreme Court of India में चल रही सुनवाई के तीसरे दिन केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण दलीलें पेश कीं। सरकार की ओर से कहा गया कि वर्ष 2018 के फैसले में यह मान लिया गया था कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक “पुरुषों की श्रेष्ठता” की धारणा पर आधारित है, जबकि यह निष्कर्ष भारतीय धार्मिक परंपराओं और आस्था की वास्तविक प्रकृति को पूरी तरह नहीं दर्शाता। केंद्र ने अदालत से इस पहलू पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता जताते हुए कहा कि इस मुद्दे को केवल लैंगिक भेदभाव के नजरिये से देखना उचित नहीं है।

सुनवाई के दौरान सरकार ने यह भी तर्क दिया कि भारतीय संस्कृति में महिलाओं को सदैव सम्मानजनक स्थान दिया गया है और कुछ धार्मिक परंपराएं विशेष मान्यताओं पर आधारित होती हैं, जिन्हें सीधे तौर पर असमानता से नहीं जोड़ा जा सकता। साथ ही यह भी कहा गया कि न्यायपालिका को धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं में सीमित हस्तक्षेप करना चाहिए, क्योंकि अदालतें कानून की व्याख्या करने में विशेषज्ञ होती हैं, धर्म की नहीं।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि किसी भी धार्मिक प्रथा को संविधान के दायरे में परखना न्यायपालिका का अधिकार है। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि कोई परंपरा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसकी वैधता की जांच की जा सकती है। इस दौरान न्यायमूर्ति B. V. Nagarathna की टिप्पणी भी चर्चा में रही, जिसमें उन्होंने कहा कि महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान “अछूत” की तरह देखना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2018 को अपने ऐतिहासिक फैसले में सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी को असंवैधानिक करार दिया था, जिसके बाद देशभर में व्यापक बहस और विरोध-समर्थन देखने को मिला था। अब एक बार फिर यह मामला आस्था, परंपरा और संवैधानिक समानता के बीच संतुलन की बहस का केंद्र बन गया है, और इस पर आने वाला फैसला सामाजिक व कानूनी दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है।

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