Emmanuel Macron एक बार फिर अपने व्यवहार को लेकर अंतरराष्ट्रीय विवादों में घिर गए हैं। केन्या की राजधानी Nairobi में आयोजित “अफ्रीका फॉरवर्ड समिट” के दौरान उस समय असहज स्थिति बन गई, जब फ्रांसीसी राष्ट्रपति अचानक मंच पर पहुंच गए और कार्यक्रम में मौजूद लोगों को सार्वजनिक रूप से डांटने लगे। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया, जिसके बाद कई अफ्रीकी देशों में मैक्रों के रवैये की आलोचना शुरू हो गई। लोगों ने इसे अफ्रीका के प्रति फ्रांस की पुरानी औपनिवेशिक मानसिकता से जोड़कर देखा।
जानकारी के अनुसार, सम्मेलन के दौरान “क्रिएशन इन मोशन” नामक सत्र चल रहा था, जिसमें युवा उद्यमी, कलाकार और सांस्कृतिक प्रतिनिधि अपने विचार साझा कर रहे थे। इसी दौरान हॉल में काफी शोरगुल होने लगा। मंच पर मौजूद वक्ताओं को बोलने में परेशानी हो रही थी। तभी मैक्रों अपनी सीट से उठे और बिना किसी औपचारिक घोषणा के सीधे मंच पर पहुंच गए। उन्होंने माइक्रोफोन लेकर कार्यक्रम में मौजूद लोगों को शांत रहने के लिए कहा। मैक्रों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इस तरह का व्यवहार “पूरी तरह से असम्मानजनक” है और यदि किसी को बातचीत करनी है तो वह बाहर जाकर करे। उन्होंने यह भी कहा कि मंच पर बोल रहे लोगों का सम्मान किया जाना चाहिए।
हालांकि, मैक्रों का यह हस्तक्षेप कई लोगों को पसंद नहीं आया। घटना के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। जिम्बाब्वे की पूर्व सांसद फदजायी माहेरे ने कहा कि अफ्रीका में आकर लोगों को इस तरह सार्वजनिक रूप से डांटना उचित नहीं है। वहीं केन्याई-कनाडाई वकील और राजनीतिक विश्लेषक डॉ. मिगुना मिगुना ने कहा कि अफ्रीकियों को अपनी बात रखने के लिए किसी विदेशी नेता की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। कई यूजर्स ने आरोप लगाया कि फ्रांस अब भी अफ्रीकी देशों को बराबरी का साझेदार नहीं मानता।
यह सम्मेलन फ्रांस और केन्या की संयुक्त मेजबानी में आयोजित किया गया था, जिसमें 30 से अधिक अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य अफ्रीका और फ्रांस के बीच निवेश, तकनीक, ऊर्जा और सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा देना था। मैक्रों ने इस दौरान अफ्रीका के लिए अरबों यूरो के निवेश और विकास योजनाओं की घोषणा भी की। लेकिन मंच पर हुई इस घटना ने सम्मेलन की उपलब्धियों से ज्यादा विवाद को चर्चा में ला दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में माली, नाइजर और बुर्किना फासो जैसे देशों में फ्रांस विरोधी माहौल बढ़ने के बाद मैक्रों अफ्रीका में फ्रांस की छवि सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि नैरोबी की यह घटना उनके प्रयासों के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है। सोशल मीडिया पर लगातार यह बहस चल रही है कि क्या मैक्रों का व्यवहार एक जिम्मेदार वैश्विक नेता जैसा था या फिर यह अफ्रीका के प्रति पुराने यूरोपीय नजरिए की झलक है।




