संसद का मानसून सत्र 2026 राजनीतिक गतिरोध और लगातार हंगामे के कारण प्रभावित रहा। सत्र की शुरुआत से ही विपक्ष ने कई अहम मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। लोकसभा और राज्यसभा में अलग-अलग मुद्दों पर विपक्षी सांसदों के विरोध, नारेबाजी और प्रदर्शन के चलते सदन की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। इसका असर प्रश्नकाल, शून्यकाल, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा और विधायी कामकाज पर देखने को मिला। विपक्ष का आरोप रहा कि सरकार जनता से जुड़े गंभीर मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा के लिए तैयार नहीं है, जबकि सरकार ने विपक्ष से सदन की कार्यवाही बाधित करने के बजाय संसदीय नियमों के तहत चर्चा में हिस्सा लेने की अपील की।
मानसून सत्र की शुरुआत 20 जुलाई 2026 से हुई। पहले ही दिन विपक्षी सांसदों ने नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, छात्रों से जुड़े मुद्दों और अयोध्या राम मंदिर से संबंधित चंदे के कथित दुरुपयोग जैसे विषय उठाए। इन मुद्दों पर चर्चा की मांग को लेकर सदन में नारेबाजी हुई, जिसके कारण कार्यवाही बार-बार बाधित हुई। लोकसभा में कई बार स्थगन के बाद दिन की कार्यवाही समाप्त करनी पड़ी। राज्यसभा में भी विरोध का असर दिखाई दिया और सामान्य संसदीय कामकाज सुचारू रूप से नहीं चल सका।
सत्र के दौरान पेपर लीक का मुद्दा विपक्ष के प्रमुख राजनीतिक हथियारों में शामिल रहा। विपक्ष ने प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, छात्रों के भविष्य और कथित अनियमितताओं पर सरकार से जवाब मांगा। विपक्षी दलों ने संबंधित मामलों पर विस्तृत चर्चा कराने और सरकार से जवाबदेही तय करने की मांग की। इसके साथ ही छात्रों के विरोध-प्रदर्शन तथा उससे जुड़े घटनाक्रम को लेकर भी विपक्ष ने सरकार को घेरा। इन मुद्दों पर सदन में चर्चा की मांग और सरकार के रुख के बीच सहमति नहीं बन पाने से कई बार कार्यवाही बाधित हुई।
अयोध्या राम मंदिर से जुड़े चंदे के कथित दुरुपयोग का मामला भी संसद में राजनीतिक विवाद का विषय बना। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगा और मामले पर चर्चा की मांग की। इसके अलावा परिसीमन, महिला आरक्षण, विदेशी अंशदान विनियमन कानून यानी एफसीआरए में संभावित बदलाव तथा अन्य विधायी विषयों को लेकर भी सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए। इन मुद्दों ने सत्र के दौरान राजनीतिक तापमान बढ़ाने का काम किया।
बार-बार होने वाले स्थगन का सबसे सीधा असर संसद के प्रश्नकाल और शून्यकाल पर पड़ा। प्रश्नकाल के दौरान सांसदों को सरकार से सीधे सवाल पूछने और विभिन्न मंत्रालयों से जवाब लेने का अवसर मिलता है, जबकि शून्यकाल में सदस्य अपने क्षेत्र और देश से जुड़े महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दे उठाते हैं। जब सदन की कार्यवाही हंगामे के कारण स्थगित होती है, तो इन दोनों महत्वपूर्ण संसदीय प्रक्रियाओं के लिए उपलब्ध समय कम हो जाता है। इसका असर सांसदों द्वारा जनता से जुड़े सवालों को सदन के सामने रखने की क्षमता पर भी पड़ता है।
हंगामे के बावजूद संसद का विधायी कामकाज पूरी तरह बंद नहीं हुआ। सरकार ने कई विधेयकों को आगे बढ़ाया और कुछ विधेयकों को सदनों से पारित भी कराया। उदाहरण के तौर पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम यानी एमएसएमई क्षेत्र में भुगतान में देरी से जुड़े संशोधन विधेयक को लोकसभा ने अगस्त के पहले सप्ताह में विपक्षी विरोध के बीच मंजूरी दी। इससे पहले राज्यसभा से भी इसे पारित किया जा चुका था। हालांकि, विपक्ष के विरोध के कारण कई मौकों पर विधेयकों पर अपेक्षित विस्तृत बहस नहीं हो सकी। इससे संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया में पर्याप्त चर्चा और संसदीय जांच को लेकर सवाल भी उठे।
संसद में व्यवधान का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने विधेयक पारित हुए। संसद का काम सिर्फ कानून पारित करना नहीं है, बल्कि सरकार से सवाल पूछना, नीतियों पर बहस करना, विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष का पक्ष सामने रखना और जनता की समस्याओं को सदन में उठाना भी इसकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसलिए यदि प्रश्नकाल, शून्यकाल और व्यापक बहस के लिए निर्धारित समय लगातार बाधित होता है, तो इसका प्रभाव संसद की उत्पादकता और कामकाज की गुणवत्ता दोनों पर पड़ता है।
संसद में बने गतिरोध को खत्म करने के लिए सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत की कोशिशें भी हुईं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी नेताओं से संपर्क कर सदन की कार्यवाही सामान्य तरीके से चलाने की अपील की। अगस्त के पहले सप्ताह में राहुल गांधी और किरेन रिजिजू के बीच मुलाकात भी हुई। इसे संसद में बने गतिरोध को कम करने के प्रयास के रूप में देखा गया। हालांकि, कई मुद्दों पर दोनों पक्षों के रुख में अंतर बना रहा और इसके चलते हंगामे की स्थिति पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी।
विपक्ष का कहना है कि सरकार की नीतियों और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सवाल पूछना तथा चर्चा की मांग करना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि विपक्ष को चर्चा के लिए संसदीय नियमों का पालन करना चाहिए और सदन की कार्यवाही बाधित नहीं करनी चाहिए। सरकार लगातार यह कहती रही कि विपक्ष को बहस और चर्चा के माध्यम से अपनी बात रखनी चाहिए, क्योंकि लगातार नारेबाजी और स्थगन से जनता के प्रतिनिधियों के काम करने का समय प्रभावित होता है।
संसद में हंगामा और कार्यवाही का स्थगन कोई नया मुद्दा नहीं है। पिछले कई सत्रों में भी राजनीतिक टकराव के कारण संसद की उत्पादकता प्रभावित होती रही है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के पूर्व संसदीय आंकड़ों के मुताबिक 17वीं लोकसभा के दौरान प्रश्नकाल का निर्धारित समय लोकसभा में लगभग 60 प्रतिशत और राज्यसभा में करीब 52 प्रतिशत ही उपयोग हो पाया था। यह स्थिति बताती है कि संसदीय व्यवधान लंबे समय से लोकतांत्रिक कामकाज के सामने एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
मानसून सत्र 2026 का निर्धारित कार्यक्रम 19 बैठकों और 25 दिनों का है तथा सत्र 13 अगस्त तक चलना प्रस्तावित है। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और विपक्ष के बीच संवाद और सहमति इस बात के लिए महत्वपूर्ण होगी कि शेष समय का इस्तेमाल कितनी प्रभावी तरीके से किया जाता है। यदि दोनों पक्ष विवादित मुद्दों पर चर्चा के लिए सहमत होते हैं, तो सदन की कार्यवाही सामान्य हो सकती है और लंबित विधायी तथा सार्वजनिक महत्व के विषयों पर पर्याप्त चर्चा का रास्ता खुल सकता है।
कुल मिलाकर, संसद के मानसून सत्र में लगातार हुए हंगामे ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि राजनीतिक मतभेदों के बीच संसद की कार्यवाही को किस तरह प्रभावी और सुचारू रखा जाए। विपक्ष जहां महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा को लोकतांत्रिक जिम्मेदारी बता रहा है, वहीं सरकार का जोर सदन को बिना व्यवधान चलाने पर है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और विरोध जरूरी हैं, लेकिन उनके साथ सार्थक बहस और संसदीय प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मानसून सत्र के बाकी दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार और विपक्ष अपने मतभेदों के बावजूद संसद के कामकाज को कितना प्रभावी बना पाते हैं।




