संसद के मानसून सत्र में जारी राजनीतिक गतिरोध के बीच केंद्र सरकार का ध्यान अब परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने पर है। सरकार के सामने चुनौती केवल विपक्ष के विरोध को दूर करने की नहीं है, बल्कि संविधान संशोधन के लिए जरूरी विशेष बहुमत जुटाने की भी है। इसी वजह से सत्ता पक्ष ऐसे क्षेत्रीय और गैर-एनडीए दलों से संवाद बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जिनके समर्थन से सदन में जरूरी संख्या हासिल की जा सकती है। मौजूदा लोकसभा के प्रभावी आंकड़ों के आधार पर यदि सभी सदस्य मतदान करते हैं तो संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई समर्थन का आंकड़ा करीब 360 बैठता है। यही वजह है कि परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा के बीच ‘360’ का नंबर सत्ता पक्ष की रणनीति में बेहद अहम माना जा रहा है।
संविधान संशोधन विधेयक को सामान्य विधेयक की तरह केवल साधारण बहुमत से पारित नहीं कराया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत ऐसे विधेयक के लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है। यही प्रावधान परिसीमन से जुड़े संवैधानिक बदलावों को राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण बनाता है। सरकार के पास लोकसभा में अपने गठबंधन के आधार पर पर्याप्त संख्या जरूर है, लेकिन यदि मतदान के समय सभी सदस्य उपस्थित रहते हैं तो दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए उसे अतिरिक्त सांसदों का समर्थन जुटाना होगा। इसलिए सरकार का ध्यान अब उन दलों पर है जो उसके गठबंधन में नहीं हैं, लेकिन प्रस्ताव पर समर्थन देने या मतदान से दूरी बनाए रखने की स्थिति में आ सकते हैं।
सरकार के लिए यह चुनौती नई नहीं है। इससे पहले संविधान संशोधन से जुड़े प्रस्ताव पर हुए मतदान में सत्ता पक्ष को अपेक्षित दो-तिहाई समर्थन नहीं मिल पाया था। अप्रैल 2026 में संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में 298 मत मिले, जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। इस परिणाम ने स्पष्ट कर दिया कि केवल एनडीए की संख्या के आधार पर ऐसे संवैधानिक बदलावों को पारित कराना आसान नहीं होगा। इसके बाद परिसीमन से जुड़े विधेयक और केंद्रशासित प्रदेशों से संबंधित प्रस्ताव भी राजनीतिक सहमति के अभाव में आगे नहीं बढ़ सके।
अब सरकार की रणनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। खासकर दक्षिण भारत के राजनीतिक दल परिसीमन के मुद्दे पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। इसका कारण यह है कि दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि यदि भविष्य में लोकसभा की सीटों का पुनर्वितरण मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर हुआ तो जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उनकी संसद में राजनीतिक हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम हो सकती है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में यह मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को अपनाने वाले राज्यों को परिसीमन के बाद राजनीतिक रूप से नुकसान नहीं होना चाहिए।
सरकार की ओर से इन आशंकाओं को दूर करने के संकेत भी दिए गए हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पहले कहा था कि प्रस्तावित व्यवस्था में दक्षिणी राज्यों के हितों को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। सरकार की ओर से सामने रखे गए संभावित मॉडल में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर करीब 816 करने की चर्चा हुई है। इस गणना के अनुसार दक्षिणी राज्यों की सीटें भी बढ़ सकती हैं और उनकी कुल हिस्सेदारी लगभग मौजूदा स्तर के आसपास बनाए रखने का प्रयास किया जा सकता है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ऐसी संख्याएं प्रस्तावित या राजनीतिक चर्चा में सामने आए मॉडल से जुड़ी हैं। वास्तविक राज्यवार सीटों का निर्धारण परिसीमन की आधिकारिक प्रक्रिया और संबंधित कानून के आधार पर ही होगा।
परिसीमन की प्रक्रिया का संबंध संविधान के अनुच्छेद 82 से है। जनगणना के आंकड़ों के आधार पर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्समायोजन का प्रावधान संविधान में मौजूद है। मौजूदा व्यवस्था के तहत 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने के बाद सीटों के पुनर्गठन का रास्ता खुल सकता है। इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए परिसीमन आयोग का गठन और उसके अधिकारों को निर्धारित करने वाला कानून महत्वपूर्ण होगा। प्रस्तावित परिसीमन व्यवस्था का असर केवल लोकसभा सीटों पर नहीं बल्कि राज्यों के निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन पर भी पड़ सकता है।
परिसीमन का मुद्दा महिला आरक्षण से भी सीधे जुड़ा हुआ है। संसद ने महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का संवैधानिक प्रावधान किया है, लेकिन इसके क्रियान्वयन को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ा गया है। सरकार की कोशिश है कि आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद महिला आरक्षण को आगामी लोकसभा चुनावों के संदर्भ में लागू करने का रास्ता तैयार किया जाए। इस कारण परिसीमन और महिला आरक्षण दोनों मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इनके लिए व्यापक राजनीतिक सहमति हासिल करना सरकार के लिए महत्वपूर्ण हो गया है।
विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार से विस्तृत आश्वासन की मांग कर रहा है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का कहना है कि परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन का मामला नहीं है, बल्कि इससे राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संघीय ढांचे पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। विपक्ष विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों की आशंकाओं को सामने रख रहा है और मांग कर रहा है कि किसी भी संवैधानिक बदलाव से पहले सभी राजनीतिक दलों के साथ व्यापक चर्चा की जाए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे मुद्दों पर सर्वदलीय चर्चा की मांग कर चुके हैं।
इस पूरे राजनीतिक गणित में क्षेत्रीय दलों की भूमिका इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संख्या का अंतर संवैधानिक संशोधन के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। यदि कुछ क्षेत्रीय दल सरकार के पक्ष में मतदान करते हैं तो 360 के आसपास का आंकड़ा हासिल करना संभव हो सकता है। इसके विपरीत यदि विपक्षी दल पूरी तरह एकजुट रहते हैं और सरकार को अतिरिक्त समर्थन नहीं मिलता, तो विधेयक को पारित कराने में मुश्किल आ सकती है। मतदान के दौरान सांसदों की अनुपस्थिति भी गणित को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि दो-तिहाई की गणना उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के आधार पर होती है। इसलिए केवल कुल सीटों की संख्या ही अंतिम तस्वीर तय नहीं करेगी।
संसद में जारी गतिरोध ने इस राजनीतिक चुनौती को और जटिल बना दिया है। विपक्ष लगातार विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेर रहा है, जबकि सत्ता पक्ष सदन की कार्यवाही चलाने और महत्वपूर्ण विधायी कामकाज को आगे बढ़ाने की मांग कर रहा है। ऐसे माहौल में सरकार के लिए परिसीमन जैसे संवेदनशील संवैधानिक मुद्दे पर विपक्ष और क्षेत्रीय दलों को साथ लाना आसान नहीं होगा। यही कारण है कि सरकार के लिए राजनीतिक संवाद और संख्या जुटाने की रणनीति दोनों एक साथ महत्वपूर्ण हो गए हैं।
आने वाले समय में परिसीमन बिल पर सबसे ज्यादा नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार किन दलों को अपने साथ लाने में सफल होती है और दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए किस तरह का फार्मूला सामने रखती है। यदि सरकार अतिरिक्त समर्थन जुटाने में सफल रहती है तो परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संवैधानिक बदलावों को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल सकता है। लेकिन यदि विपक्षी एकजुटता कायम रहती है और क्षेत्रीय दल सरकार के प्रस्ताव से सहमत नहीं होते हैं, तो संसद में गतिरोध जारी रहने की संभावना बनी रहेगी। इस तरह परिसीमन का मुद्दा अब सिर्फ लोकसभा सीटों के पुनर्गठन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, महिला आरक्षण और केंद्र-राज्य संबंधों से जुड़ा बड़ा संवैधानिक मुद्दा बन चुका है।




