संसद का मानसून सत्र 2026 विपक्ष के लगातार विरोध और सदन में बार-बार हुए व्यवधान के बीच सुर्खियों में रहा है। एक तरफ सरकार ने हंगामे के बावजूद अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए कई विधेयक पारित किए, वहीं दूसरी तरफ सांसदों को सरकार से सीधे सवाल पूछने का महत्वपूर्ण अवसर देने वाला प्रश्नकाल इस सत्र में हो ही नहीं सका। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सत्र के 15 दिनों में लोकसभा की कार्यवाही केवल 15 घंटे 36 मिनट चली, जबकि राज्यसभा ने 24 घंटे 21 मिनट काम किया। इसी दौरान एक समय ऐसा भी आया जब महज 36 मिनट में सात विधेयक पारित कर दिए गए।
मानसून सत्र के दौरान विपक्ष की ओर से दिल्ली में छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई और कथित परीक्षा पेपर लीक से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार विरोध किया गया। विपक्षी सांसदों के नारेबाजी और हंगामे के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार बाधित हुई। शुरुआती दौर में विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी के बीच विधायी कामकाज आगे बढ़ा, जबकि बाद में विपक्ष ने कई मौकों पर सदन से वॉकआउट की रणनीति अपनाई। राज्यसभा में पिछले कुछ दिनों के दौरान वॉकआउट विशेष रूप से दिखाई दिया।
हंगामे के बीच सरकार ने विधायी कामकाज को रोकने के बजाय कई विधेयकों को आगे बढ़ाया। रिपोर्ट के मुताबिक सत्र के दौरान अब तक 19 विधेयक पारित हो चुके थे और उस समय सत्र के दो दिन अभी बाकी थे। इनमें से सात विधेयकों को केवल 36 मिनट के भीतर पारित किए जाने ने संसदीय कामकाज की गति और विधेयकों पर चर्चा को लेकर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार औसतन हर विधेयक को पारित करने में लगभग पांच मिनट का समय लगा। हालांकि कुछ विधेयकों पर सांसदों द्वारा संशोधन प्रस्ताव दिए जाने के कारण अपेक्षाकृत अधिक समय लगा।
संसदीय कामकाज के आंकड़ों से सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का असर भी साफ दिखाई देता है। यदि छह घंटे की दैनिक कार्यवाही को सामान्य पूर्ण कार्यदिवस माना जाए तो 15 दिनों में लगभग 90 घंटे का कामकाज अपेक्षित था। इसके मुकाबले लोकसभा की कार्यवाही सिर्फ 15 घंटे 36 मिनट तक चली। राज्यसभा में भी स्थिति सामान्य नहीं रही और सदन ने कुल 24 घंटे 21 मिनट काम किया। इसका अर्थ है कि निर्धारित कार्य समय का बड़ा हिस्सा हंगामे, स्थगन और राजनीतिक गतिरोध की भेंट चढ़ गया।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा प्रश्नकाल का रहा। प्रश्नकाल वह संसदीय व्यवस्था है जिसके तहत सांसद मंत्रियों से सरकार की नीतियों, योजनाओं, फैसलों और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर सवाल पूछ सकते हैं। राज्यसभा की आधिकारिक जानकारी के अनुसार प्रत्येक बैठक में प्रश्न पूछने और उनके जवाब लेने के लिए एक घंटे का समय निर्धारित होता है। यह व्यवस्था सांसदों को सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण अवसर देती है।
लेकिन मानसून सत्र 2026 में लगातार व्यवधान के कारण प्रश्नकाल आयोजित नहीं हो सका। इसका सीधा असर सांसदों की उस भूमिका पर पड़ा जिसमें वे संबंधित मंत्रालयों से सीधे जवाब मांग सकते थे। विपक्ष के लिए प्रश्नकाल सरकार की नीतियों और कामकाज पर सवाल उठाने का एक प्रमुख संसदीय माध्यम है, जबकि सत्ता पक्ष के लिए यह अपनी योजनाओं और उपलब्धियों को सदन के सामने रखने का अवसर होता है। इसलिए प्रश्नकाल का लगातार बाधित होना संसदीय निगरानी की प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दरअसल, प्रश्नकाल का बाधित होना कोई बिल्कुल नई स्थिति नहीं है। उपलब्ध संसदीय आंकड़ों के अनुसार 2024 के मानसून सत्र में प्रश्नकाल के समय का करीब तीन प्रतिशत हिस्सा व्यवधान की वजह से प्रभावित हुआ था। इसके बाद 2024 के शीतकालीन सत्र में यह आंकड़ा 56 प्रतिशत, 2025 के बजट सत्र में 22 प्रतिशत और 2025 के मानसून सत्र में 77 प्रतिशत तक पहुंच गया। 2025 के शीतकालीन सत्र में भी करीब एक-तिहाई प्रश्नकाल का समय प्रभावित हुआ। 2026 के बजट सत्र में 12 दिनों के दौरान प्रश्नकाल कुल मिलाकर 15 मिनट से भी कम चल पाया था। इस पृष्ठभूमि में मानसून सत्र में प्रश्नकाल का पूरी तरह न हो पाना संसदीय कार्यप्रणाली को लेकर चिंता बढ़ाता है।
हालांकि सभी विधेयक बिना चर्चा के पारित हुए हों, ऐसा कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। इस सत्र में सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम से संबंधित संशोधन विधेयक को अपेक्षाकृत लंबी चर्चा मिली। रिपोर्ट के अनुसार इस विधेयक पर लोकसभा में करीब 11 घंटे और राज्यसभा में लगभग 7 घंटे 14 मिनट चर्चा हुई। यह विधेयक परीक्षा में नकल, पेपर लीक और अन्य अनुचित साधनों पर रोक लगाने से जुड़े कानूनी प्रावधानों को मजबूत करने के उद्देश्य से लाया गया था। संसद से पारित होने के बाद इसे छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता से जुड़े महत्वपूर्ण कानून के रूप में देखा गया।
मानसून सत्र में कई अन्य विधेयक भी पेश किए गए और कुछ महत्वपूर्ण प्रस्ताव अभी सरकार के विधायी एजेंडे में बने हुए हैं। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान विवादित FCRA संशोधन और परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर उस समय तक आगे की कार्रवाई नहीं हुई थी। इसका मतलब यह है कि सत्र में सरकार ने कई विधायी काम पूरे किए, लेकिन कुछ बड़े राजनीतिक और संवैधानिक महत्व वाले प्रस्ताव अभी चर्चा और निर्णय की प्रतीक्षा में रहे।
सरकार के नजरिए से देखें तो भारी राजनीतिक गतिरोध के बावजूद विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है। सरकार के पास सदन में पर्याप्त संख्याबल होने के कारण विपक्ष के विरोध के बीच भी कई विधेयकों को पारित कराया गया। दूसरी ओर विपक्ष का तर्क रहा कि विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा और सांसदों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना संसदीय लोकतंत्र के लिए जरूरी है। ऐसे में कम समय में विधेयकों का पारित होना केवल कामकाज की गति का विषय नहीं है, बल्कि यह इस सवाल को भी जन्म देता है कि विधायी प्रक्रिया में चर्चा और विचार-विमर्श के लिए कितना समय मिल रहा है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी अलग-अलग मौकों पर प्रश्नकाल और संसदीय कार्यवाही में व्यवधान को लेकर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। प्रश्नकाल के माध्यम से सांसद सरकार से नीतिगत फैसलों, प्रशासनिक कार्यों और जनता से जुड़े मुद्दों पर जवाब मांग सकते हैं। यदि लगातार हंगामे के कारण यह प्रक्रिया प्रभावित होती है तो सांसदों के साथ-साथ आम जनता को भी सरकार से सीधे जवाब हासिल करने का एक महत्वपूर्ण संसदीय माध्यम कम हो जाता है। यही वजह है कि प्रश्नकाल का नियमित संचालन संसदीय जवाबदेही की व्यवस्था का अहम हिस्सा माना जाता है।
कुल मिलाकर, मानसून सत्र 2026 की तस्वीर दो अलग-अलग पहलुओं को सामने रखती है। एक तरफ संसद में भारी विरोध और सीमित कार्य समय के बावजूद सरकार ने कई विधेयकों को पारित कराया और अपना विधायी एजेंडा आगे बढ़ाया, वहीं दूसरी तरफ प्रश्नकाल के पूरी तरह बाधित रहने और कई विधेयकों के सीमित चर्चा के साथ पारित होने ने संसदीय बहस की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए हैं। 36 मिनट में सात विधेयकों का पारित होना इस सत्र की सबसे उल्लेखनीय घटनाओं में से एक बन गया है। हालांकि सत्र के अंतिम दिनों की कार्यवाही और अंतिम आधिकारिक आंकड़े आने के बाद ही यह स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी कि 2026 का मानसून सत्र विधायी कामकाज, चर्चा और उत्पादकता के लिहाज से किस स्तर पर रहा।




