पश्चिम एशिया में बढ़ता युद्ध संकट: ईरान ने 2029 तक संघर्ष की क्षमता का किया दावा

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पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के बीच ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के वरिष्ठ सलाहकार मोहम्मद रजा नकदी के बयान ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। नकदी ने कहा है कि ईरान अमेरिका के साथ जारी युद्ध को जरूरत पड़ने पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मौजूदा कार्यकाल के अंत तक खींच सकता है। ट्रंप का मौजूदा कार्यकाल 20 जनवरी 2029 को समाप्त होना है। हालांकि, उनके बयान का अर्थ यह नहीं है कि युद्ध निश्चित रूप से 2029 तक चलेगा। इसे ईरान की लंबे समय तक संघर्ष करने की क्षमता और अमेरिका पर दबाव बनाए रखने की रणनीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

मोहम्मद रजा नकदी ने अमेरिकी मीडिया से बातचीत में संकेत दिया कि ईरान ने मौजूदा संघर्ष के दौरान अमेरिका के खिलाफ लड़ने का काफी अनुभव हासिल किया है। उनके मुताबिक, संघर्ष को लंबा खींचना ईरान के लिए रणनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है, क्योंकि इससे वह अमेरिका और उसके सहयोगियों पर लगातार दबाव बनाए रख सकता है तथा भविष्य में होने वाले हमलों को रोकने के लिए अपनी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत कर सकता है। नकदी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच युद्धविराम और समझौते की कोशिशें लगातार गतिरोध का सामना कर रही हैं।

मौजूदा संकट की सबसे बड़ी वजहों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है। फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच स्थित यह जलमार्ग दुनिया के प्रमुख तेल और गैस परिवहन मार्गों में शामिल है। ईरान ने इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने का दावा किया है, जबकि अमेरिका का कहना है कि वह अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए समुद्री मार्ग को सुरक्षित और खुला रखने की कोशिश कर रहा है। 13 अगस्त को ईरानी अधिकारियों ने दावा किया कि होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण है, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसके विपरीत अमेरिका के नियंत्रण का दावा किया। इस विरोधाभासी स्थिति ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है।

होर्मुज को लेकर विवाद का असर केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इस मार्ग से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा जुड़ा हुआ है, इसलिए लंबे समय तक यातायात बाधित रहने से तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर दबाव बढ़ सकता है। हाल के संघर्ष के दौरान होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है। क्षेत्रीय बाजारों में भी निवेशकों की चिंता दिखाई दे रही है, क्योंकि लंबे समय तक चलने वाला संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

अमेरिका ने भी ईरान पर दबाव कम करने के संकेत नहीं दिए हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने 13 अगस्त को कहा कि अमेरिकी सेना ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी को अनिश्चित अवधि तक बनाए रखने में सक्षम है। अमेरिकी रणनीति का उद्देश्य ईरान के तेल निर्यात और आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाना तथा तेहरान को अपनी मांगों पर बातचीत के लिए मजबूर करना है। अमेरिकी नौसेना अपनी तैनाती में बदलाव करके लंबे समय तक इस अभियान को जारी रख सकती है, ऐसा अमेरिकी रक्षा नेतृत्व का दावा है।

दूसरी ओर, ईरान भी दबाव के सामने पीछे हटने के बजाय अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, तेहरान ऐसी रणनीति पर काम कर रहा है जिसमें संघर्ष को नियंत्रित स्तर पर बढ़ाकर अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए संकट की लागत बढ़ाई जाए। इसका उद्देश्य सीधे तौर पर निर्णायक सैन्य जीत हासिल करने के बजाय अमेरिका को यह महसूस कराना है कि ईरान पर दबाव बनाए रखना उसके लिए भी महंगा पड़ सकता है।

अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, लेकिन दोनों पक्षों की मांगों में बड़ा अंतर बना हुआ है। 12 अगस्त को ईरान ने कहा कि अंतरिम शांति समझौते को दोबारा लागू करने की कोशिशों में कोई महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई है। इससे यह संकेत मिला कि कूटनीतिक प्रयास अभी भी कठिन दौर से गुजर रहे हैं।

होर्मुज को दोबारा सामान्य रूप से खोलना बातचीत में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बना हुआ है। ईरान चाहता है कि अमेरिका अपनी कुछ पाबंदियां और दबाव कम करे तथा ईरान की आर्थिक मांगों पर विचार करे। वहीं अमेरिका पहले समुद्री मार्ग में सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने और ईरान पर दबाव बनाए रखने पर जोर दे रहा है। दोनों पक्षों की प्राथमिकताओं में यह अंतर समझौते की राह में बड़ी बाधा बन रहा है।

इस संघर्ष का एक और गंभीर पहलू इसका क्षेत्रीय विस्तार है। ईरान से जुड़े हूती जैसे समूहों की गतिविधियों ने लाल सागर और आसपास के समुद्री मार्गों में भी जोखिम बढ़ाया है। यदि ईरान-अमेरिका टकराव लंबे समय तक चलता है और दूसरे क्षेत्रीय समूह इसमें अधिक सक्रिय होते हैं, तो संघर्ष का दायरा बढ़ने की आशंका बनी रहेगी। इससे ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

फिलहाल IRGC जनरल का 2029 तक युद्ध चलने का बयान एक सैन्य और राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि युद्ध की निश्चित समयसीमा के रूप में। ईरान यह संकेत देना चाहता है कि वह अमेरिकी दबाव के सामने जल्दी समझौता करने के लिए तैयार नहीं है और जरूरत पड़ने पर लंबे संघर्ष का सामना कर सकता है। वहीं अमेरिका आर्थिक तथा सैन्य दबाव जारी रखकर ईरान को रियायत देने के लिए मजबूर करने की कोशिश कर रहा है।

आने वाले दिनों में सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि अमेरिका और ईरान बातचीत के जरिए कोई नया समझौता कर पाते हैं या फिर होर्मुज, तेल आपूर्ति और सैन्य दबाव को लेकर टकराव और लंबा खिंचता है। यदि कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता है, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और आर्थिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है। इसलिए 2029 तक युद्ध चलने की बात फिलहाल एक संभावना और रणनीतिक चेतावनी है, लेकिन मौजूदा हालात यह जरूर दिखाते हैं कि अमेरिका-ईरान संघर्ष का तत्काल समाधान अभी आसान नजर नहीं आ रहा है।

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