दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी युद्ध और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में वैश्विक खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है। 25 अगस्त 2026 को सुरक्षा परिषद की उच्चस्तरीय खुली बहस ‘Food Under Fire’ में भारत ने कहा कि सशस्त्र संघर्षों का असर केवल युद्ध वाले इलाकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव खाद्य उत्पादन, कृषि आपूर्ति, ऊर्जा, उर्वरक, परिवहन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ता है। भारत ने स्पष्ट किया कि अगर संघर्ष लंबे समय तक जारी रहे या उनका दायरा बढ़े तो इससे पहले से कमजोर खाद्य आपूर्ति व्यवस्था पर और दबाव पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरिश पार्वथनेनी ने कहा कि खाद्य असुरक्षा और सशस्त्र संघर्ष के बीच गहरा संबंध है। युद्ध की वजह से खेती की जमीन, सिंचाई व्यवस्था, भंडारण केंद्र, सड़कें और बंदरगाह प्रभावित हो सकते हैं। इसके साथ ही ईंधन और उर्वरकों की कीमत तथा उपलब्धता पर भी असर पड़ता है। इससे किसानों की लागत बढ़ती है और कई क्षेत्रों में कृषि उत्पादन कम हो सकता है। भारत ने सुरक्षा परिषद से संघर्षों को रोकने और प्रभावित क्षेत्रों में मानवीय सहायता की सुरक्षित तथा निर्बाध पहुंच सुनिश्चित करने की अपील की।
भारत ने कहा कि आज वैश्विक खाद्य सुरक्षा केवल खेतों में होने वाले उत्पादन पर निर्भर नहीं है। खाद्यान्न को एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाने के लिए सुरक्षित परिवहन और समुद्री व्यापार मार्गों की जरूरत होती है। यदि युद्ध के कारण प्रमुख समुद्री मार्ग बाधित होते हैं तो खाद्यान्न, उर्वरक और ईंधन की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव पैदा होता है और आयात पर निर्भर विकासशील देशों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो सकती है।
भारत ने सुरक्षा परिषद के सामने खाद्य संकट को लेकर शुरुआती चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) को मजबूत करने की आवश्यकता भी बताई। भारत के अनुसार किसी क्षेत्र में खाद्य संकट आने के बाद राहत पहुंचाने के बजाय पहले ही संभावित जोखिमों की पहचान की जानी चाहिए। इसके लिए खाद्य उत्पादन, उर्वरक, ईंधन, परिवहन और मानवीय सहायता से जुड़ी सप्लाई चेन पर लगातार नजर रखने की जरूरत है। भारत ने इस काम में FAO और WFP जैसी संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों की तकनीकी विशेषज्ञता के बेहतर इस्तेमाल का समर्थन किया।
मानवीय सहायता को लेकर भारत ने कहा कि संघर्ष प्रभावित इलाकों में भोजन और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने में किसी तरह की बाधा नहीं होनी चाहिए। युद्ध के दौरान नागरिक बुनियादी ढांचे, कृषि भूमि, सिंचाई व्यवस्था, खाद्य भंडारण केंद्र और परिवहन नेटवर्क की सुरक्षा भी जरूरी है, क्योंकि इनके नष्ट होने से संघर्ष खत्म होने के बाद भी खाद्य संकट लंबे समय तक बना रह सकता है। भारत ने यह भी कहा कि प्रतिबंधों को इस तरह लागू किया जाना चाहिए कि उनका अनपेक्षित असर मानवीय सहायता, खाद्य आपूर्ति और वैध कृषि व्यापार पर न पड़े।
भारत ने समुद्री व्यापार की सुरक्षा को भी वैश्विक खाद्य सुरक्षा का अहम हिस्सा बताया। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बड़े हिस्से के लिए समुद्री मार्गों का इस्तेमाल होता है। संघर्ष के दौरान जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से खाद्य पदार्थों के साथ-साथ उर्वरक और ऊर्जा संसाधनों की कीमत बढ़ सकती है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई।
भारत का कहना है कि केवल आपातकालीन राहत देकर वैश्विक खाद्य संकट का स्थायी समाधान नहीं किया जा सकता। इसके लिए देशों को अपनी कृषि व्यवस्था को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाना होगा। घरेलू कृषि उत्पादन बढ़ाने, खाद्य भंडारण और लॉजिस्टिक्स सुधारने, सप्लाई चेन में विविधता लाने तथा जलवायु-अनुकूल खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है। विकासशील देशों के लिए सस्ती और भरोसेमंद उर्वरक, गुणवत्तापूर्ण बीज, आधुनिक कृषि तकनीक और वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण है।
UNSC में भारत ने अपने खाद्य सुरक्षा मॉडल का भी उल्लेख किया। भारत ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, किसानों के लिए सहायता और जलवायु-अनुकूल फसलों को बढ़ावा देने जैसे उपायों को खाद्य सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। भारत ने विशेष रूप से बाजरा जैसी पोषण से भरपूर और जलवायु-अनुकूल फसलों को बढ़ावा देने पर जोर दिया। भारत के अनुसार कृषि व्यवस्था में विविधता बढ़ाने से वैश्विक संकटों के दौरान खाद्य आपूर्ति को अधिक लचीला बनाया जा सकता है।
भारत ने जलवायु परिवर्तन और El Niño जैसी मौसमी घटनाओं को भी खाद्य सुरक्षा के लिए अतिरिक्त चुनौती बताया। मौसम के पैटर्न में बदलाव से मानसून, वर्षा और फसल उत्पादन प्रभावित हो सकते हैं। यदि किसी देश में पहले से युद्ध या आर्थिक संकट चल रहा हो, तो जलवायु संबंधी झटका खाद्य असुरक्षा को और गंभीर बना सकता है। विश्व खाद्य कार्यक्रम ने भी चेतावनी दी है कि El Niño की परिस्थितियां कई संवेदनशील देशों में 2026-27 के दौरान खाद्य सुरक्षा पर दबाव बढ़ा सकती हैं।
दुनिया के कई संघर्ष प्रभावित हिस्सों में खाद्य संकट पहले से गंभीर बना हुआ है। सूडान, सोमालिया, दक्षिण सूडान, यमन और फिलिस्तीनी क्षेत्रों जैसे इलाकों में संघर्ष, विस्थापन, आर्थिक संकट और जलवायु संबंधी समस्याओं ने लाखों लोगों की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित किया है। ऐसे क्षेत्रों में युद्ध के कारण कृषि गतिविधियां बाधित होने के साथ-साथ मानवीय सहायता पहुंचाना भी मुश्किल हो जाता है। इससे स्थानीय बाजारों में कीमतें बढ़ने और कमजोर वर्गों की मुश्किलें बढ़ने का खतरा रहता है।
भारत ने सुरक्षा परिषद में जोर देकर कहा कि शांति, विकास और खाद्य सुरक्षा एक-दूसरे से सीधे जुड़े हुए हैं। अगर किसी क्षेत्र में संघर्ष लगातार जारी रहता है तो वहां केवल राजनीतिक और सुरक्षा संकट ही नहीं बढ़ता, बल्कि लोगों की आजीविका और भोजन तक पहुंच भी प्रभावित होती है। इसलिए खाद्य संकट से निपटने के लिए केवल राहत सामग्री उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है; संघर्ष के मूल कारणों को संबोधित करना और स्थायी शांति स्थापित करना भी जरूरी है।
भारत का संदेश साफ है कि दुनिया में युद्ध और संघर्षों का बढ़ता दायरा वैश्विक खाद्य व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। युद्ध खेतों से लेकर बंदरगाहों और बाजारों तक पूरी सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में संघर्षों को रोकना, मानवीय सहायता की निर्बाध पहुंच सुनिश्चित करना, समुद्री और व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित रखना तथा मजबूत और जलवायु-अनुकूल कृषि व्यवस्था तैयार करना वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी होगा।




