जापान से निवेश ही नहीं, निर्यात भी बढ़ाना चाहता भारत; पीयूष गोयल का बड़ा फोकस

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भारत और जापान के बीच आर्थिक रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं, लेकिन अब दोनों देशों के संबंधों की अगली बड़ी परीक्षा केवल निवेश के आंकड़ों से नहीं, बल्कि व्यापार संतुलन से भी होगी। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जापान दौरे के दौरान इस बात पर जोर दिया कि भारत-जापान आर्थिक साझेदारी का लाभ भारतीय निर्यात और घरेलू विनिर्माण को भी मिलना चाहिए। दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ भारत का व्यापार घाटा भी बढ़ा है। ऐसे में भारत की प्राथमिकता अब व्यापार को संतुलित करने और जापानी बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ाने की है।

पीयूष गोयल 24 से 27 अगस्त 2026 तक जापान के दौरे पर हैं। उनके साथ 200 से अधिक कारोबारियों और उद्योग प्रतिनिधियों का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी जापान गया है। प्रतिनिधिमंडल की टोक्यो, नागोया और ओसाका में जापानी कंपनियों तथा कारोबारी संगठनों के साथ बैठकें हो रही हैं। इन बैठकों में सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल, स्टील, स्वच्छ ऊर्जा, वित्तीय सेवाओं, स्वास्थ्य क्षेत्र और स्टार्टअप जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की जा रही है। भारत सरकार का उद्देश्य जापानी निवेश को आकर्षित करने के साथ-साथ दोनों देशों के बीच व्यापार और औद्योगिक साझेदारी को नई दिशा देना है।

भारत और जापान के बीच द्विपक्षीय व्यापार में पिछले कुछ वर्षों में वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार करीब 27.47 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह लगभग 25.16 अरब डॉलर था। हालांकि व्यापार बढ़ने के साथ भारत का जापान के साथ व्यापार घाटा भी बढ़ गया। 2025-26 में यह घाटा करीब 15.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि एक साल पहले यह लगभग 12.66 अरब डॉलर था। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत जापान से जितना आयात करता है, उसके मुकाबले जापान को होने वाला भारतीय निर्यात काफी कम है।

विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने जापान को लगभग 6.25 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि जापान से भारत का आयात करीब 18.90 अरब डॉलर रहा। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार में बड़ा अंतर दिखाई देता है। भारत अब इस अंतर को कम करने के लिए जापानी बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ाने और भारतीय कंपनियों के लिए कारोबारी बाधाओं को कम करने पर जोर दे रहा है।

भारत और जापान के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी के लिए Comprehensive Economic Partnership Agreement यानी CEPA महत्वपूर्ण आधार है। यह समझौता 2011 में लागू हुआ था। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार को बढ़ाना, निवेश को प्रोत्साहित करना और बाजार तक पहुंच आसान बनाना था। हालांकि वैश्विक अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन में पिछले डेढ़ दशक में काफी बदलाव आया है। इसलिए भारत चाहता है कि इस व्यापार समझौते की समीक्षा की जाए और इसे मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाया जाए।

भारतीय निर्यातकों की एक बड़ी चिंता जापानी बाजार में मौजूद गैर-टैरिफ बाधाएं हैं। जापान में उत्पादों के लिए कड़े गुणवत्ता मानक, प्रमाणन प्रक्रिया और अन्य तकनीकी आवश्यकताएं लागू हैं। भारतीय कंपनियों का कहना है कि इन प्रक्रियाओं के कारण जापानी बाजार में प्रवेश की लागत और समय बढ़ जाता है। CEPA की समीक्षा के दौरान भारत इन मुद्दों को उठाकर भारतीय उत्पादों के लिए बाजार पहुंच आसान बनाने की कोशिश कर रहा है। अगर इन बाधाओं को कम किया जाता है, तो भारतीय निर्यातकों को जापान में अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

जापान भारत के प्रमुख निवेश साझेदारों में भी शामिल है। भारत में जापानी कंपनियों की मौजूदगी ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, वित्त, रसायन और फार्मास्युटिकल जैसे कई क्षेत्रों में है। भारत सरकार जापानी कंपनियों से देश में नए निवेश के साथ-साथ उत्पादन बढ़ाने और स्थानीय सप्लाई चेन को मजबूत करने की अपील कर रही है। भारत की कोशिश है कि जापान से आने वाला निवेश केवल भारतीय बाजार तक सीमित न रहे, बल्कि भारत को वैश्विक उत्पादन और निर्यात केंद्र बनाने में भी मदद करे।

पीयूष गोयल ने जापानी कंपनियों से भारत में बने स्टील और दूसरे औद्योगिक उत्पादों की खरीद बढ़ाने का आग्रह भी किया है। सरकार का मानना है कि अगर जापानी कंपनियां भारत में स्थानीय कंपनियों से अधिक सामान खरीदती हैं और भारतीय उत्पादों को अपनी वैश्विक सप्लाई चेन में शामिल करती हैं, तो इससे भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को बड़ा फायदा हो सकता है। इससे भारत के निर्यात को बढ़ावा देने के साथ जापान के साथ व्यापार घाटे को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

भारत-जापान सहयोग का दायरा अब पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वच्छ ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों तक पहुंच रहा है। भारत जापानी कंपनियों को सेमीकंडक्टर क्षेत्र में निवेश के बड़े अवसर दिखा रहा है। सरकार का मानना है कि जापान की तकनीकी विशेषज्ञता और पूंजी को भारत के बड़े बाजार, कुशल कार्यबल और उत्पादन क्षमता के साथ जोड़ा जाए तो दोनों देशों को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।

निवेश के क्षेत्र में भी दोनों देश महत्वाकांक्षी लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं। भारत जापान से बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित करना चाहता है और इस निवेश को सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, स्वच्छ ऊर्जा, डेटा सेंटर और आधुनिक विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में लगाने पर जोर है। इसका उद्देश्य भारत की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ रोजगार और निर्यात के अवसर पैदा करना है।

उद्योग जगत को उम्मीद है कि भारत और जापान के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2030 तक करीब 50 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। हालांकि इस लक्ष्य की सफलता केवल कुल व्यापार के बढ़ने से तय नहीं होगी। भारत के लिए यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि व्यापार बढ़ने के साथ भारतीय निर्यात में कितनी वृद्धि होती है और दोनों देशों के बीच मौजूदा व्यापार घाटे में कितना बदलाव आता है।

भारत-जापान संबंध अब केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश आर्थिक सुरक्षा, रक्षा, तकनीक, सप्लाई चेन, स्वच्छ ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्रों में भी लगातार करीब आ रहे हैं। जापान भारत के लिए तकनीक और निवेश का महत्वपूर्ण स्रोत है, जबकि जापानी कंपनियों के लिए भारत एक बड़ा उपभोक्ता बाजार और वैश्विक विनिर्माण एवं सप्लाई चेन का संभावित केंद्र है।

ऐसे में आने वाले वर्षों में भारत-जापान आर्थिक साझेदारी की असली परीक्षा इस बात से होगी कि दोनों देशों के बीच बढ़ता निवेश भारतीय निर्यात और विनिर्माण को कितना बढ़ावा देता है। यदि जापानी कंपनियां भारत में उत्पादन बढ़ाती हैं, भारतीय कंपनियों से ज्यादा खरीद करती हैं और भारतीय उत्पादों को जापानी बाजार में बेहतर पहुंच मिलती है, तो व्यापार घाटे को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव संभव है। यही कारण है कि भारत के लिए अब केवल निवेश के बड़े आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। व्यापार संतुलन, निर्यात वृद्धि और दोनों देशों की कंपनियों के बीच मजबूत सप्लाई चेन आने वाले समय में भारत-जापान आर्थिक संबंधों की सफलता के प्रमुख पैमाने होंगे।

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