नेपाल में अचानक आई बाढ़ ने मचाई तबाही, 133 भारतीयों समेत सैकड़ों लापता

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नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई भीषण फ्लैश फ्लड ने देश के मध्य और सीमावर्ती इलाकों में भारी तबाही मचा दी। नेपाल-चीन सीमा के पास भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में अचानक आई बाढ़ के कारण कई बस्तियां, सड़कें और पुल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक नेपाल और चीन को मिलाकर मृतकों की संख्या करीब 160 तक पहुंच गई है। वहीं बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। अलग-अलग एजेंसियों की ओर से जारी आंकड़ों में अंतर है, लेकिन एक रिपोर्ट में 844 लोगों के लापता होने की बात कही गई है, जबकि अन्य आधिकारिक आंकड़ों में करीब 400 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई है। इनमें कम से कम 133 भारतीय नागरिक शामिल बताए गए हैं।

इस प्राकृतिक आपदा का सबसे ज्यादा असर नेपाल के रसुवा जिले और नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास के इलाकों में दिखाई दिया। भोटेकोशी नदी में अचानक पानी और मलबे का तेज बहाव आया, जिसने रास्ते में आने वाले घरों, वाहनों और अन्य संरचनाओं को अपनी चपेट में ले लिया। इसके बाद बाढ़ का पानी त्रिशूली नदी तंत्र में पहुंचा और कई जिलों में तबाही फैल गई। रसुवा के तिमुरे और रसुवागढ़ी क्षेत्र में हालात विशेष रूप से गंभीर रहे। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में तेज रफ्तार से बहता मलबा, बहते वाहन और क्षतिग्रस्त इमारतें दिखाई दीं।

इस आपदा के कारण बड़ी संख्या में लोग लापता हुए हैं। नेपाल पर्यटन बोर्ड के अनुसार रसुवा जिले में सैकड़ों यात्रियों और पर्यटकों के बारे में जानकारी नहीं मिल पा रही है। इनमें विदेशी नागरिकों की संख्या भी काफी है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार लापता लोगों में कम से कम 133 भारतीय नागरिक शामिल हैं। इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या भी बताई गई है। इसके अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा समेत कई देशों के नागरिक भी लापता बताए गए हैं। राहत और बचाव अभियान आगे बढ़ने के साथ इन आंकड़ों में बदलाव की संभावना बनी हुई है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता नेपाल में फंसे और लापता भारतीय नागरिकों को लेकर है। काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने प्रभावित भारतीयों के लिए आपातकालीन हेल्पलाइन जारी की है और नेपाली अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने की जानकारी दी है। भारत सरकार की ओर से नेपाल को राहत सामग्री की पहली खेप भी भेजी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से बातचीत कर भारत की ओर से हरसंभव मानवीय सहायता उपलब्ध कराने का भरोसा दिया है।

बाढ़ से नेपाल के बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान हुआ है। कई मोटरेबल पुल बह गए हैं और सड़क संपर्क बुरी तरह प्रभावित हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार नुवाकोट से रसुवागढ़ी सीमा चौकी को जोड़ने वाली करीब 42 किलोमीटर लंबी सड़क के कई हिस्से बाढ़ में बह गए। कई अस्थायी और स्थायी पुल भी क्षतिग्रस्त हुए हैं। इससे राहत एवं बचाव दलों के लिए प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचना मुश्किल हो गया है।

बाढ़ का असर नेपाल के जलविद्युत क्षेत्र पर भी पड़ा है। कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं को नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने आई है। स्वतंत्र बिजली उत्पादकों के संगठन के अनुसार नुवाकोट और रसुवा में चल रही आठ जलविद्युत परियोजनाएं, जिनकी संयुक्त क्षमता करीब 354 मेगावाट है, प्रभावित हुई हैं। इसके अलावा निर्माणाधीन परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचा है। बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण से जुड़ी सुविधाओं को नुकसान के कारण कई इलाकों में बिजली आपूर्ति प्रभावित हुई है।

बाढ़ की वजह को लेकर शुरुआती जांच में कई संभावनाएं सामने आई हैं। नेपाल के अधिकारियों ने बताया कि तिब्बत क्षेत्र में आए भूकंप और उसके बाद हुए भूस्खलन या बर्फ-पत्थर के बड़े हिस्से के खिसकने से नदी में अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा पहुंचा हो सकता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट में भी ग्लेशियर के निचले हिस्से के टूटने के बाद बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने को संभावित कारण बताया गया है। इस घटनाक्रम ने ल्हेंदे खोला नदी में अचानक तेज प्रवाह पैदा किया, जिसने आगे चलकर भयंकर बाढ़ का रूप ले लिया।

हालांकि इस आपदा को केवल सामान्य मानसूनी बारिश से जोड़ना उचित नहीं माना जा रहा है। नेपाल के जल एवं मौसम विभाग से जुड़ी जानकारी में बताया गया कि रसुवा में बाढ़ का मुख्य कारण बारिश नहीं थी। अधिकारियों ने नदी के पास रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने और अगले निर्देश तक नदियों से दूर रहने की चेतावनी दी है। खासकर भोटेकोशी और त्रिशूली नदी क्षेत्रों में खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

नेपाल की सेना, सशस्त्र पुलिस और नेपाल पुलिस ने बड़े स्तर पर राहत और बचाव अभियान शुरू किया है। नेपाली सेना ने खोज एवं बचाव के लिए हेलीकॉप्टर तैनात किए हैं। कई लोगों को प्रभावित क्षेत्रों से सुरक्षित निकाला गया है, जबकि घायलों को अस्पतालों में पहुंचाया जा रहा है। सेना की ओर से प्रभावित क्षेत्रों में चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के लिए विशेष व्यवस्था भी की गई है। हालांकि खराब मौसम, पहाड़ी भूगोल, मलबे और क्षतिग्रस्त सड़क-पुलों के कारण बचाव अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

नेपाल में आई इस आपदा का असर भारत के सीमावर्ती राज्यों पर भी चिंता बढ़ाने वाला है। नेपाल से निकलने वाली नदियां बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रवेश करती हैं, इसलिए अचानक बढ़े जलस्तर को देखते हुए भारतीय प्रशासन को सतर्क किया गया है। केंद्र सरकार ने भी स्थिति पर नजर रखने के लिए संबंधित एजेंसियों को सक्रिय किया है। रिपोर्टों के मुताबिक बिहार और उत्तर प्रदेश में संभावित बाढ़ के खतरे को देखते हुए निगरानी और तैयारी बढ़ाई गई है।

इस आपदा ने हिमालयी क्षेत्र में बदलते प्राकृतिक जोखिमों पर भी सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियरों, बर्फ और चट्टानों से जुड़ी घटनाओं तथा अचानक आने वाली बाढ़ के कारण हिमालयी क्षेत्रों में आपदा का खतरा बढ़ रहा है। नेपाल-तिब्बत सीमा जैसे संवेदनशील और दुर्गम क्षेत्रों में समय रहते चेतावनी मिलने से जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है। इसलिए बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली, नदी निगरानी और सीमा क्षेत्र में आपदा प्रबंधन को मजबूत करना बेहद जरूरी माना जा रहा है।

फिलहाल नेपाल में राहत और खोज अभियान जारी है। मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका के बीच सबसे बड़ी प्राथमिकता लापता लोगों को ढूंढना और प्रभावित नागरिकों तक राहत पहुंचाना है। अलग-अलग एजेंसियों द्वारा जारी आंकड़ों में अंतर को देखते हुए मृतकों और लापता लोगों की अंतिम संख्या अभी स्पष्ट नहीं मानी जा सकती। बचाव अभियान पूरा होने और प्रभावित इलाकों तक पहुंच बहाल होने के बाद ही इस भीषण आपदा से हुए वास्तविक नुकसान का पूरा आकलन सामने आएगा।

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