ईरान के खिलाफ अमेरिका की आर्थिक दबाव की नीति अब और व्यापक होती दिखाई दे रही है। वॉशिंगटन ने ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले तेल कारोबार, वित्तीय नेटवर्क, शिपिंग और विदेशी मुद्रा के स्रोतों पर दबाव बढ़ा दिया है। इसी बीच यूरोपीय संघ की ओर से भी ईरान के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कदमों को समर्थन मिलने से तेहरान के सामने मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि यूरोपीय संघ ने अमेरिका के आर्थिक दबाव अभियान का समर्थन किया है। अमेरिका इस अभियान को ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ के नाम से आगे बढ़ा रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान की उन आर्थिक और वित्तीय गतिविधियों को कमजोर करना है, जिनके जरिए उसकी सरकार को राजस्व मिलता है।
अमेरिका की नई रणनीति में केवल ईरान की सरकारी संस्थाओं को निशाना बनाना ही शामिल नहीं है, बल्कि उन विदेशी कंपनियों और वित्तीय नेटवर्क पर भी दबाव बनाया जा रहा है जिन पर ईरान के साथ कारोबार करने या प्रतिबंधों से बचने में उसकी मदद करने का आरोप है। अमेरिकी कार्रवाई में तेल और गैस क्षेत्र के अलावा शिपिंग, डिजिटल संपत्ति, सोना, विमानन और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े नेटवर्क भी शामिल हैं। अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि ईरान लंबे समय से वैकल्पिक वित्तीय चैनलों और जटिल कारोबारी नेटवर्क का इस्तेमाल करके अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करता रहा है। अब वॉशिंगटन इन रास्तों को बंद करने पर ज्यादा जोर दे रहा है।
ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए तेल सबसे महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा स्रोतों में से एक है। ऐसे में तेल निर्यात पर किसी भी तरह की गंभीर रोक देश की वित्तीय स्थिति पर सीधा असर डाल सकती है। रॉयटर्स की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के तेल निर्यात में भारी गिरावट आई है और यह स्थिति देश के लिए विदेशी मुद्रा जुटाना मुश्किल बना रही है। रिपोर्ट में ईरानी अधिकारियों और अन्य सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि तेल निर्यात लगभग 17 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर से गिरकर करीब 2.6 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया है। इसके साथ ही ईरानी मुद्रा रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने और महंगाई के लगभग 70 प्रतिशत तक पहुंचने की बात सामने आई है।
तेल निर्यात में गिरावट का सबसे बड़ा असर ईरान की विदेशी मुद्रा आय पर पड़ता है। देश को खाद्य पदार्थों, औद्योगिक कच्चे माल, दवाओं और दूसरी जरूरी वस्तुओं के आयात के लिए विदेशी मुद्रा की जरूरत होती है। यदि तेल से मिलने वाला राजस्व लगातार कम होता है तो सरकार के लिए आयात का भुगतान करना मुश्किल हो सकता है। इससे घरेलू बाजार में सामान की कीमतें बढ़ सकती हैं और आम लोगों की खरीद क्षमता पर दबाव बढ़ सकता है। कमजोर मुद्रा इस समस्या को और गंभीर बना देती है, क्योंकि विदेशी सामान खरीदने के लिए पहले की तुलना में ज्यादा स्थानीय मुद्रा खर्च करनी पड़ती है।
अमेरिकी प्रतिबंधों का एक अहम हिस्सा ईरान के कथित ‘शैडो बैंकिंग’ और वैकल्पिक वित्तीय नेटवर्क को निशाना बनाना है। इन नेटवर्क के जरिए प्रतिबंधों के बावजूद धन का अंतरराष्ट्रीय लेनदेन किए जाने का आरोप है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान ने बैंकिंग प्रतिबंधों से बचने के लिए कई स्तरों वाली कंपनियों, विदेशी वित्तीय संस्थाओं और गैर-पारंपरिक भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल किया है। वॉशिंगटन अब ऐसे नेटवर्क से जुड़े संस्थानों और व्यक्तियों को प्रतिबंधों के दायरे में लाकर ईरान की विदेशी मुद्रा तक पहुंच सीमित करना चाहता है।
शिपिंग क्षेत्र भी इस आर्थिक दबाव का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। ईरान के तेल निर्यात को बनाए रखने में समुद्री परिवहन की बड़ी भूमिका है और प्रतिबंधों से बचने के लिए कथित ‘शैडो फ्लीट’ का इस्तेमाल किए जाने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। अमेरिका ने ऐसे जहाजों और कंपनियों को निशाना बनाया है जिन पर ईरानी तेल या अन्य प्रतिबंधित सामान की ढुलाई में शामिल होने का आरोप है। यदि जहाजों को बीमा, बैंकिंग और बंदरगाह सेवाओं तक पहुंच में परेशानी होती है तो ईरान के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार तक अपना तेल पहुंचाना और महंगा तथा कठिन हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में यूरोपीय संघ का रुख भी महत्वपूर्ण है। अमेरिका और यूरोपीय देशों की नीतियों में बढ़ता तालमेल ईरान के लिए वैकल्पिक व्यापारिक रास्ते तलाशने की गुंजाइश को सीमित कर सकता है। यूरोपीय संघ पहले से ही ईरान के खिलाफ अलग-अलग मामलों में प्रतिबंध लगा चुका है और अब अमेरिकी दबाव अभियान को समर्थन मिलने से तेहरान पर पश्चिमी आर्थिक दबाव का दायरा और व्यापक हो सकता है। हालांकि यूरोपीय पक्ष के लिए भी स्थिति आसान नहीं है, क्योंकि मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने का असर ऊर्जा कीमतों, समुद्री परिवहन और यूरोप की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
ईरान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आर्थिक संकट के कई कारण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। तेल आय में कमी से विदेशी मुद्रा घटती है, विदेशी मुद्रा की कमी से आयात महंगा होता है, महंगा आयात महंगाई बढ़ाता है और बढ़ती महंगाई स्थानीय मुद्रा पर और दबाव डाल सकती है। यदि यह चक्र लंबे समय तक चलता है तो सरकार के लिए अर्थव्यवस्था को स्थिर करना मुश्किल हो सकता है। रॉयटर्स के अनुसार, ईरान में पहले ही मुद्रा कमजोरी, महंगाई, घटती तेल आय और व्यापारिक बाधाओं का दबाव दिखाई दे रहा है।
ईरान के आर्थिक संकट का असर देश की जनता पर भी पड़ सकता है। महंगाई बढ़ने के साथ घरेलू सामान, खाद्य पदार्थ और आयातित उत्पाद महंगे हो सकते हैं। वहीं कमजोर अर्थव्यवस्था रोजगार और कारोबार पर भी असर डाल सकती है। यदि सरकार के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं रहती तो जरूरी वस्तुओं और औद्योगिक सामग्री के आयात को बनाए रखना चुनौती बन सकता है। ऐसे हालात में आर्थिक असंतोष सामाजिक और राजनीतिक तनाव को भी बढ़ा सकता है।
हालांकि, ईरान के लिए तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। देश ने लंबे समय से प्रतिबंधों के बीच कारोबार करने के लिए वैकल्पिक व्यापार मार्ग और वित्तीय व्यवस्थाएं विकसित की हैं। चीन ईरानी तेल का एक महत्वपूर्ण खरीदार रहा है और इसलिए ईरान की अर्थव्यवस्था पर पूर्ण दबाव बनाने की अमेरिकी कोशिशों में चीन की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। यदि ईरान कुछ हद तक अपना तेल कारोबार और वैकल्पिक भुगतान चैनल बनाए रखने में सफल रहता है तो प्रतिबंधों का असर पूरी तरह तत्काल नहीं दिखाई देगा। लेकिन यदि समुद्री परिवहन, बैंकिंग और विदेशी मुद्रा के कई रास्ते एक साथ बाधित होते हैं तो ईरान की आर्थिक स्थिति पर दबाव तेजी से बढ़ सकता है।
ईरान संकट का दूसरा बड़ा प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। ईरान के तेल निर्यात में भारी गिरावट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर जारी तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। हालिया बाजार रिपोर्टों में ब्रेंट क्रूड की कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने और यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमतों में तेज वृद्धि का उल्लेख किया गया है। यदि क्षेत्रीय तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो ऊर्जा की कीमतों में तेजी दुनिया के दूसरे देशों में भी महंगाई का दबाव बढ़ा सकती है।
भारत समेत एशियाई देशों के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं खाड़ी क्षेत्र से आने वाले तेल पर काफी निर्भर हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां किसी भी लंबे व्यवधान से तेल की उपलब्धता, जहाजों के बीमा खर्च और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है। इसका असर आगे चलकर पेट्रोल-डीजल, विमानन ईंधन, पेट्रोकेमिकल उत्पादों और कई औद्योगिक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।
आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि अमेरिका और उसके सहयोगियों का आर्थिक दबाव ईरान को अपनी नीतियों में बदलाव या बातचीत के लिए कितना मजबूर कर पाता है। अमेरिका उम्मीद कर रहा है कि तेल आय और वित्तीय नेटवर्क पर बढ़ते प्रतिबंध तेहरान की आर्थिक क्षमता को कमजोर करेंगे। दूसरी ओर, ईरान अब तक दबाव के बावजूद अपने रुख पर कायम है। ऐसे में आर्थिक प्रतिबंध और क्षेत्रीय तनाव लंबे समय तक जारी रहते हैं तो संकट केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर बढ़ सकता है।
कुल मिलाकर, अमेरिका और यूरोपीय संघ की ओर से ईरान पर बढ़ता आर्थिक दबाव तेहरान के लिए गंभीर चुनौती बन गया है। तेल निर्यात में गिरावट, विदेशी मुद्रा की कमी, कमजोर रियाल, ऊंची महंगाई और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क तक सीमित पहुंच पहले से मौजूद आर्थिक समस्याओं को और गहरा कर सकती है। हालांकि ईरान के पास प्रतिबंधों से निपटने के पुराने अनुभव और वैकल्पिक व्यापारिक चैनल हैं, लेकिन यदि अमेरिका और यूरोप का दबाव लंबे समय तक एक साथ बना रहा तो आर्थिक संकट को नियंत्रित करना तेहरान के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो सकता है।




