पंजाब में नशे की समस्या पिछले करीब दो दशकों से राजनीतिक बहस के केंद्र में बनी हुई है। राज्य में इस दौरान कई बार सरकारें बदलीं, राजनीतिक दलों को सत्ता मिली और नशे के खिलाफ अलग-अलग अभियान चलाए गए, लेकिन ड्रग्स की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी। यही कारण है कि 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच नशे का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। इस बार बहस केवल नशीले पदार्थों की तस्करी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ युवाओं का भविष्य, रोजगार, स्वास्थ्य व्यवस्था, सीमा पार से तस्करी, संगठित अपराध और सरकारों की जवाबदेही जैसे सवाल भी जुड़े हैं।
पंजाब में नशे का मुद्दा खास तौर पर 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले बड़े राजनीतिक विषय के रूप में उभरा था। उस समय विपक्ष ने तत्कालीन सरकार पर राज्य में बढ़ती ड्रग्स की समस्या को नियंत्रित करने में विफल रहने का आरोप लगाया था। नशे से जुड़े आरोपों और राजनीतिक विवादों ने चुनावी माहौल को प्रभावित किया और ड्रग्स का मुद्दा सत्ता परिवर्तन की बहस का अहम हिस्सा बन गया। इसके बाद कांग्रेस सरकार सत्ता में आई और उसने भी नशे के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा किया। पुलिस कार्रवाई, जांच और नशा मुक्ति सेवाओं को मजबूत करने की कोशिशों के बावजूद समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई। 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने भी नशे के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और पंजाब को नशामुक्त बनाने को अपने प्रमुख वादों में शामिल किया।
विशेषज्ञों के अनुसार पंजाब की ड्रग्स समस्या को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे नशीले पदार्थों की उपलब्धता के साथ बेरोजगारी, सामाजिक परिस्थितियां, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, युवाओं में भविष्य को लेकर निराशा और नशे की मांग जैसे कई कारक काम करते हैं। ग्रामीण पंजाब में पदार्थों के इस्तेमाल को लेकर हुए अध्ययनों में भी शराब और तंबाकू के साथ ओपिओइड जैसे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल की गंभीरता सामने आई है। 2015 से 2024 के बीच के आंकड़ों के विश्लेषण में भी पंजाब में हजारों NDPS मामले दर्ज होने और बड़ी मात्रा में हेरोइन जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि समस्या का एक बड़ा हिस्सा संगठित तस्करी और स्थानीय नेटवर्क से जुड़ा हुआ है।
पंजाब की भौगोलिक स्थिति भी ड्रग्स की चुनौती को जटिल बनाती है। राज्य की पाकिस्तान के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जिसके कारण सीमा पार से नशीले पदार्थों की तस्करी सुरक्षा एजेंसियों के लिए लंबे समय से चिंता का विषय रही है। समय के साथ तस्करों ने पारंपरिक रास्तों के अलावा ड्रोन जैसी तकनीक का इस्तेमाल भी शुरू किया है। सीमा पार से आने वाले नशीले पदार्थ स्थानीय नेटवर्क तक पहुंचने के बाद अलग-अलग माध्यमों से राज्य के भीतर फैलते हैं। ड्रग तस्करी का संबंध गैंगस्टर नेटवर्क, अवैध हथियारों और संगठित अपराध से जुड़ने की आशंका ने इस समस्या को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण बना दिया है।
आम आदमी पार्टी की सरकार ने 2022 में सत्ता संभालने के बाद नशे के खिलाफ कार्रवाई को प्राथमिकता देने का दावा किया। सरकार ने 1 मार्च 2025 से ‘युद्ध नशों के विरुद्ध’ अभियान शुरू किया। इस अभियान का उद्देश्य केवल ड्रग तस्करों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई करना नहीं था, बल्कि नशे की लत से जूझ रहे लोगों को इलाज, पुनर्वास और सामाजिक मुख्यधारा में वापस लाने पर भी जोर देना था। सरकार के अनुसार अभियान शुरू होने के बाद बड़ी संख्या में संदिग्ध तस्करों के खिलाफ कार्रवाई की गई और हजारों नशा प्रभावित लोगों को उपचार व्यवस्था से जोड़ा गया।
राज्य सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2025 से मई 2026 के बीच 90 हजार से अधिक नशा प्रभावित लोगों को डि-एडिक्शन और ओपिओइड असिस्टेड ट्रीटमेंट यानी OOAT सेवाओं के माध्यम से उपचार दिया गया। पंजाब में नशा मुक्ति केंद्रों और OOAT क्लीनिकों का नेटवर्क भी बढ़ाया गया है। सरकार का कहना है कि उपचार व्यवस्था को मजबूत करने का उद्देश्य नशे की समस्या को केवल अपराध के रूप में देखने के बजाय इसे स्वास्थ्य और पुनर्वास के नजरिए से भी संबोधित करना है।
हालांकि, उपचार और पुलिस कार्रवाई के आंकड़ों के बावजूद ड्रग ओवरडोज से होने वाली मौतें चिंता का विषय बनी हुई हैं। NCRB के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2024 में पंजाब में ड्रग ओवरडोज से 106 मौतें दर्ज की गईं। इससे पहले 2022 और 2023 में भी पंजाब इस श्रेणी में देश के सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में रहा था। हालांकि, अलग-अलग सरकारी रिपोर्टों में ‘ड्रग ओवरडोज’ और ‘ड्रग से संबंधित मौत’ की परिभाषा अलग हो सकती है, इसलिए आंकड़ों की तुलना करते समय सावधानी जरूरी है। फिर भी ये आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि नशे की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है।
पंजाब की जेलों से सामने आने वाली स्थिति भी चुनौती की गंभीरता को दर्शाती है। अदालत के सामने पेश किए गए सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य की जेलों में बड़ी संख्या में कैदियों में नशे पर निर्भरता पाई गई है। इससे यह सवाल उठता है कि नशे से जुड़े मामलों में केवल गिरफ्तारी और सजा पर जोर देना पर्याप्त है या नशे की लत से जूझ रहे लोगों के लिए उपचार और पुनर्वास को भी न्याय व्यवस्था के साथ जोड़ना जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि नशे की मांग को कम किए बिना केवल सप्लाई रोकने की कोशिश लंबे समय तक पर्याप्त परिणाम नहीं दे सकती।
2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने भी पंजाब में नशे के मुद्दे को प्रमुख राजनीतिक विषय बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी की रणनीति में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में एंटी-ड्रग अभियान और जनसंपर्क गतिविधियों के जरिए ‘ड्रग-फ्री पंजाब’ का संदेश पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है। भाजपा का प्रयास है कि नशे के मुद्दे को कानून-व्यवस्था, युवाओं के भविष्य और विकास से जोड़कर मतदाताओं के बीच उठाया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के अन्य नेता भी पंजाब के संदर्भ में नशे की समस्या को लेकर कई बार चिंता व्यक्त कर चुके हैं।
दूसरी ओर कांग्रेस भी आम आदमी पार्टी सरकार को नशे के मुद्दे पर घेर रही है। कांग्रेस का तर्क है कि सरकार द्वारा गिरफ्तारियों और जब्ती के आंकड़े जारी किए जाने के बावजूद जमीन पर नशे की उपलब्धता और इसके इस्तेमाल को लेकर सवाल बने हुए हैं। विपक्ष की ओर से यह मांग भी उठाई जाती रही है कि नशे के आदी लोगों और बड़े तस्करों के बीच अंतर किया जाए तथा उपचार और पुनर्वास पर ज्यादा ध्यान दिया जाए। इस राजनीतिक बहस के बीच आम आदमी पार्टी सरकार के सामने 2027 में अपने कार्यकाल के दौरान नशे के खिलाफ उठाए गए कदमों के ठोस परिणाम जनता के सामने रखने की चुनौती होगी।
दरअसल, पंजाब में नशे की समस्या अब केवल चुनावी नारे का विषय नहीं रह गई है। यह युवाओं के रोजगार, परिवारों की सामाजिक स्थिति, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पुलिस व्यवस्था और सीमा सुरक्षा से जुड़ी बहुआयामी चुनौती बन चुकी है। इसलिए 2027 के चुनाव में मतदाता राजनीतिक दलों से केवल ‘नशामुक्त पंजाब’ का नारा सुनने के बजाय यह भी पूछ सकते हैं कि नशे की मांग कैसे कम होगी, तस्करी नेटवर्क को स्थायी रूप से कैसे तोड़ा जाएगा, युवाओं को रोजगार और बेहतर अवसर कैसे मिलेंगे और इलाज के बाद नशे से बाहर आए लोगों को सामान्य जीवन में लौटने के लिए किस तरह का सहयोग दिया जाएगा।
पिछले करीब दो दशकों का अनुभव बताता है कि पंजाब में सरकारें और राजनीतिक समीकरण बदलते रहे हैं, लेकिन नशे का सवाल लगातार बना रहा। 2027 का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण होगा क्योंकि इस बार राजनीतिक दलों के दावों की तुलना केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि पिछले वर्षों में हुए वास्तविक बदलावों से की जा सकती है। पंजाब के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या अगली सरकार नशे के खिलाफ सिर्फ अभियान चलाएगी या तस्करी रोकने, इलाज उपलब्ध कराने, पुनर्वास बढ़ाने और युवाओं के लिए बेहतर अवसर पैदा करने वाली ऐसी दीर्घकालिक व्यवस्था तैयार करेगी, जिससे नशे की समस्या को वास्तव में निर्णायक रूप से कम किया जा सके।




