भारत ने UN के नए मैप प्रोजेक्शन का किया समर्थन, क्षेत्रीय अखंडता पर कही बड़ी बात

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दुनिया के नक्शे में देशों और महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को अधिक सटीक तरीके से प्रदर्शित करने की दिशा में संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से उठाए गए कदम के बीच भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के चित्रण को लेकर अपना रुख साफ कर दिया है। भारत ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र या उसके समर्थन से तैयार होने वाले किसी भी विश्व मानचित्र में भारत के संप्रभु क्षेत्र का चित्रण उसके आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप होना चाहिए। खासतौर पर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर किसी भी तरह का गलत, भ्रामक या अस्पष्ट चित्रण भारत को स्वीकार्य नहीं है।

दरअसल, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर 2026 को दुनिया के नक्शों में क्षेत्रफल से जुड़ी पुरानी विसंगतियों को कम करने के उद्देश्य से एक प्रस्ताव को मंजूरी दी। इस पहल में ऐसी map projection तकनीकों को बढ़ावा देने की बात कही गई है, जिनमें पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों का क्षेत्रफल अपेक्षाकृत अधिक सही तरीके से प्रदर्शित किया जा सके। इस संदर्भ में Equal Earth जैसी equal-area projection चर्चा में आई है। प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने मतदान किया, जबकि अमेरिका ने इसके खिलाफ मतदान किया और छह देश मतदान से दूर रहे।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। हालांकि, नई दिल्ली ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्ताव का समर्थन करने का अर्थ भारत के आधिकारिक नक्शे या उसकी क्षेत्रीय सीमाओं में किसी तरह का बदलाव स्वीकार करना नहीं है। भारत के लिए map projection का तकनीकी सवाल और देश की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का सवाल अलग-अलग विषय हैं। इसलिए भारत ने स्पष्ट किया है कि नक्शे की तकनीक में बदलाव होने के बावजूद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत भारत के क्षेत्र का चित्रण आधिकारिक भारतीय मानचित्र के अनुरूप ही होना चाहिए।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का मुद्दा भारत के लिए विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि इन क्षेत्रों से संबंधित सीमा विवाद भारत, पाकिस्तान और चीन के साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे में किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा जारी किए जाने वाले मानचित्र में इन क्षेत्रों को किस तरह प्रदर्शित किया जाता है, उसका राजनीतिक और कूटनीतिक महत्व भी होता है। भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि उसके संप्रभु क्षेत्र को ऐसे तरीके से प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए जिससे उसकी क्षेत्रीय अखंडता पर सवाल उठे या किसी अन्य देश के दावे को वैधता मिलती हुई दिखाई दे।

संयुक्त राष्ट्र के मानचित्रों में विवादित और संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर अलग-अलग तरह के नोट और अस्वीकरण भी इस्तेमाल किए जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र की geospatial व्यवस्था में प्रकाशित मानचित्रों के साथ यह स्पष्ट किया जाता है कि उनमें दिखाई गई सीमाएं और नाम जरूरी नहीं कि संबंधित क्षेत्र की अंतिम कानूनी या राजनीतिक स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र की ओर से कोई निर्णय या समर्थन दर्शाते हों। इसका उद्देश्य मानचित्र को संदर्भ के रूप में प्रस्तुत करना है, न कि विवादित क्षेत्रों की अंतिम स्थिति तय करना।

संयुक्त राष्ट्र के नए प्रस्ताव का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के वास्तविक आकार को बेहतर तरीके से समझाना है। लंबे समय से इस्तेमाल होने वाली Mercator projection में पृथ्वी की गोल सतह को समतल कागज पर प्रदर्शित करने के कारण ध्रुवों के करीब स्थित भूभाग अपेक्षाकृत बड़ा दिखाई दे सकता है। इसी वजह से ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्र नक्शे पर अपने वास्तविक आकार की तुलना में काफी बड़े नजर आते हैं। इसके विपरीत अफ्रीका जैसे विशाल महाद्वीप का वास्तविक क्षेत्रफल नक्शे पर देखने में अपेक्षाकृत कम बड़ा महसूस हो सकता है।

Equal Earth projection इसी समस्या को कम करने के लिए विकसित की गई equal-area तकनीकों में शामिल है। इसका उद्देश्य अलग-अलग देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल के बीच वास्तविक अनुपात को अधिक बेहतर तरीके से दिखाना है। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार पृथ्वी की गोल सतह को पूरी तरह समतल नक्शे पर उतारना संभव नहीं है। किसी भी map projection में कुछ न कुछ विकृति रहती है और अलग-अलग उद्देश्यों के लिए अलग-अलग projection का इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के लिए Mercator projection का उपयोग नौवहन और दिशा संबंधी कार्यों में लंबे समय से किया जाता रहा है।

इसलिए संयुक्त राष्ट्र महासभा का नया प्रस्ताव यह नहीं कहता कि दुनिया के सभी मौजूदा नक्शों को तत्काल बदल दिया जाएगा या Mercator projection पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य ऐसे नक्शों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना है जो देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल की तुलना करते समय अधिक वास्तविक तस्वीर पेश करें। प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी प्रकृति का है और इसके बाद विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थानों तथा शैक्षणिक और मानचित्रण क्षेत्रों में equal-area projections के इस्तेमाल को लेकर चर्चा बढ़ सकती है।

भारत के लिए इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु उसकी क्षेत्रीय अखंडता है। नई दिल्ली का कहना है कि नक्शे की projection चाहे कोई भी हो, उससे भारत की संप्रभुता या आधिकारिक सीमा संबंधी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए। भारत विशेष रूप से यह सुनिश्चित करना चाहता है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों का चित्रण किसी ऐसे तरीके से न हो जिसे भारत की क्षेत्रीय स्थिति के गलत प्रतिनिधित्व के रूप में देखा जा सके।

इस पूरे घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि आधुनिक दुनिया में नक्शे केवल भौगोलिक जानकारी देने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि उनका कूटनीतिक और राजनीतिक महत्व भी है। किसी देश की सीमाओं, विवादित क्षेत्रों और प्रशासनिक इकाइयों को मानचित्र पर किस तरह दिखाया जाता है, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस देश की स्थिति और दावों से जुड़ा विषय बन सकता है। यही वजह है कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र के नए map projection संबंधी प्रयास का समर्थन करते हुए भी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के सही चित्रण को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है।

कुल मिलाकर, संयुक्त राष्ट्र की नई पहल का मुख्य उद्देश्य दुनिया के नक्शों में क्षेत्रफल संबंधी गलत धारणाओं को कम करना और पृथ्वी के विभिन्न भूभागों को उनके वास्तविक आकार के करीब दिखाना है। भारत इस उद्देश्य के समर्थन में है, लेकिन उसने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि तकनीकी रूप से नक्शे की projection बदलने का इस्तेमाल भारत के आधिकारिक क्षेत्रीय चित्रण को बदलने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। नई दिल्ली का संदेश साफ है कि नक्शे का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और भारत के अन्य संप्रभु क्षेत्रों का चित्रण उसकी आधिकारिक स्थिति और क्षेत्रीय अखंडता के अनुरूप ही होना चाहिए।

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