देश में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की जुलाई 2026 की जांच रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। सरकारी ड्रग क्वालिटी अलर्ट के मुताबिक राज्य औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं में जांचे गए 199 दवा, कॉस्मेटिक और मेडिकल डिवाइस नमूनों को निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया। इन्हें ‘नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी’ यानी NSQ श्रेणी में रखा गया है। इसके अलावा एक उत्पाद को स्प्यूरियस यानी नकली भी घोषित किया गया। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि 199 NSQ नमूनों का मतलब यह नहीं है कि बाजार में मौजूद 199 अलग-अलग ब्रांड की सभी दवाएं पूरी तरह असरहीन हैं। CDSCO की जांच आमतौर पर किसी विशेष नमूने और उसके संबंधित बैच पर आधारित होती है।
CDSCO की विस्तृत सूची के अनुसार जुलाई में राज्य प्रयोगशालाओं से 199 नमूने NSQ पाए गए, जबकि केंद्रीय प्रयोगशालाओं में जांचे गए 40 अन्य नमूने भी गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इस तरह विस्तृत सूची में कुल 239 NSQ नमूने दर्ज होते हैं। अलग-अलग सरकारी रिपोर्टों में आंकड़ों में अंतर भी दिखाई देता है, इसलिए रिपोर्ट पढ़ते समय यह देखना जरूरी है कि आंकड़ा राज्य प्रयोगशालाओं, केंद्रीय प्रयोगशालाओं या दोनों के संयुक्त आंकड़ों को दर्शा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जांच में फेल हुई सभी दवाएं असरहीन थीं। इसका जवाब सीधे तौर पर ‘हां’ नहीं है। NSQ का अर्थ यह है कि किसी विशेष नमूने ने दवा के लिए निर्धारित एक या अधिक गुणवत्ता मानकों को पूरा नहीं किया। इसमें सक्रिय औषधीय घटक यानी Active Pharmaceutical Ingredient की मात्रा कम या अधिक होना, दवा का निर्धारित तरीके से न घुलना, पहचान परीक्षण में कमी, माइक्रोबियल समस्या, pH, वजन या अन्य गुणवत्ता मानकों में गड़बड़ी शामिल हो सकती है। इसलिए NSQ को सीधे ‘असरहीन दवा’ कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। हालांकि, जिन नमूनों में सक्रिय दवा की मात्रा बहुत कम या शून्य पाई गई, उनमें चिकित्सीय प्रभाव को लेकर गंभीर चिंता जरूर पैदा होती है।
जुलाई की जांच में कुछ ऐसे नमूने भी सामने आए जिनमें सक्रिय तत्व की मात्रा काफी कम पाई गई। रिपोर्ट के मुताबिक क्लोपिडोग्रेल और एस्पिरिन की संयुक्त गोली के एक नमूने में क्लोपिडोग्रेल केवल 38.20 प्रतिशत और एस्पिरिन 21.8 प्रतिशत पाया गया। ये दोनों दवाएं हृदय और रक्त के थक्के से जुड़ी चिकित्सीय स्थितियों में इस्तेमाल की जाती हैं। लेबल पर घोषित मात्रा की तुलना में इतनी कम सक्रिय सामग्री मिलना संबंधित नमूने की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
पेट से जुड़ी समस्याओं में इस्तेमाल होने वाली आर-जारा डीएसआर कैप्सूल का एक नमूना भी जांच में गंभीर रूप से विफल पाया गया। इस उत्पाद में 20 मिलीग्राम रैबेप्राजोल और 30 मिलीग्राम डोमपेरीडोन होने का दावा किया गया था, लेकिन परीक्षण में दोनों सक्रिय घटकों की मात्रा 0.0 मिलीग्राम बताई गई। यदि परीक्षण रिपोर्ट में दर्ज यह परिणाम संबंधित बैच पर लागू होता है, तो उस नमूने में घोषित सक्रिय दवा की अनुपस्थिति बेहद गंभीर गुणवत्ता संबंधी समस्या मानी जाएगी।
इसी तरह 300 मिलीग्राम प्रेगाबालिन कैप्सूल के एक नमूने में 211.16 मिलीग्राम सक्रिय पदार्थ पाया गया। 100 मिलीग्राम इट्राकोनाजोल के एक नमूने में सक्रिय तत्व की मात्रा 63.54 मिलीग्राम और 5 मिलीग्राम रामिप्रिल के एक नमूने में करीब 64.20 प्रतिशत बताई गई। इन मामलों से स्पष्ट होता है कि कुछ नमूनों में समस्या सीधे दवा के सक्रिय घटक की मात्रा से संबंधित थी। दूसरी ओर कई नमूने ऐसे भी रहे जिनमें सक्रिय तत्व की मात्रा के बजाय dissolution, identification या अन्य गुणवत्ता परीक्षणों में कमी पाई गई।
CDSCO की सूची में रोजमर्रा के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई महत्वपूर्ण दवाओं के नमूने भी शामिल रहे। इनमें पैरासिटामोल, पैंटोप्राजोल, सेफिक्सिम, अमोक्सिसिलिन-क्लैवुलैनिक एसिड, लेवोफ्लॉक्सासिन, ग्लिमेपिराइड, निफेडिपिन, डेक्सामेथासोन, प्रेगाबालिन और इट्राकोनाजोल जैसी दवाएं शामिल हैं। कुछ पैरासिटामोल नमूनों में दवा के dissolution से संबंधित समस्या सामने आई, जबकि बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाले एक पैरासिटामोल सिरप के नमूने में माइक्रोबियल जांच से संबंधित कमी दर्ज की गई।
एंटीबायोटिक दवाओं के भी कई नमूने गुणवत्ता परीक्षण में विफल रहे। इनमें सेफिक्सिम, अमोक्सिसिलिन-क्लैवुलैनिक एसिड और लेवोफ्लॉक्सासिन जैसे उत्पाद शामिल हैं। कुछ नमूनों में assay, dissolution या identification से जुड़ी समस्याएं सामने आईं। ऐसे मामलों में संबंधित बैच की गुणवत्ता की जांच और नियामक कार्रवाई महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि एंटीबायोटिक की गुणवत्ता में कमी उपचार की प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकती है।
जांच केवल टैबलेट और कैप्सूल तक सीमित नहीं रही। ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन का एक नमूना भी पहचान परीक्षण में निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया। ऑक्सीटोसिन का इस्तेमाल प्रसव के दौरान गर्भाशय के संकुचन सहित चिकित्सा परिस्थितियों में किया जाता है, इसलिए इसके गुणवत्ता मानकों का पालन बेहद महत्वपूर्ण है।
इस अलर्ट में कुछ बड़ी दवा कंपनियों के उत्पादों के नमूने भी शामिल बताए गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार लुपिन, सनोफी इंडिया, जायडस हेल्थकेयर, आईपीका लेबोरेटरीज, अल्केम, कैडिला फार्मास्यूटिकल्स और ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन जैसी कंपनियों के कुछ उत्पाद भी अलग-अलग परीक्षणों में मानकों पर खरे नहीं उतरे। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि इन कंपनियों की सभी दवाएं खराब या असरहीन हैं। नियामकीय अलर्ट संबंधित परीक्षण किए गए नमूने और उसके बैच से जुड़ा होता है।
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू एक स्प्यूरियस यानी नकली उत्पाद का सामने आना है। CDSCO के जुलाई अलर्ट में ‘Diabetes-All Powder’ नाम के उत्पाद को नकली घोषित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार इसमें पियोग्लिटाजोन की मौजूदगी पाई गई, जो उत्पाद के घोषित स्वरूप से मेल नहीं खाती थी। नकली दवाओं के मामले में समस्या केवल गुणवत्ता की नहीं होती, बल्कि मरीज को गलत या अनपेक्षित सक्रिय दवा मिलने का खतरा भी रहता है। ऐसे मामलों में संबंधित उत्पाद की सप्लाई और स्रोत की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 51 नमूने NSQ पाए गए। इसके बाद तमिलनाडु में 26 और कर्नाटक में 16 नमूने गुणवत्ता मानकों पर विफल रहे। इन तीन राज्यों में ही राज्य प्रयोगशालाओं से सामने आए 199 NSQ नमूनों में से 93 मामले दर्ज हुए। यह आंकड़ा देश के अलग-अलग हिस्सों में दवा गुणवत्ता की निगरानी और नियामकीय व्यवस्था के महत्व को रेखांकित करता है।
किसी दवा के NSQ पाए जाने का मतलब यह नहीं है कि उसके निर्माता की हर दवा या पूरा ब्रांड खराब है। जांच किसी विशेष नमूने पर होती है और उसके परिणाम के आधार पर संबंधित बैच के बारे में नियामकीय कार्रवाई की जा सकती है। दवा की गुणवत्ता पर तापमान, परिवहन, भंडारण की स्थिति, उत्पादन प्रक्रिया और अन्य कारकों का भी प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए किसी एक नमूने की रिपोर्ट को पूरे ब्रांड की सभी दवाओं पर लागू करना उचित नहीं है।
CDSCO और राज्य औषधि नियंत्रण विभाग बाजार तथा सप्लाई चेन से दवाओं के नमूने लेकर सरकारी प्रयोगशालाओं में उनकी जांच कराते हैं। जिन नमूनों में गुणवत्ता संबंधी खामी, नकलीपन या अन्य गंभीर समस्या सामने आती है, उनकी जानकारी ड्रग अलर्ट के माध्यम से सार्वजनिक की जाती है। संबंधित राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण Drugs and Cosmetics Act, 1940 और Drugs Rules, 1945 के तहत आवश्यक कार्रवाई कर सकते हैं।
इस रिपोर्ट के बाद मरीजों को अनावश्यक रूप से घबराने की जरूरत नहीं है और डॉक्टर की सलाह के बिना कोई जरूरी दवा बंद नहीं करनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को संदेह है कि उसके पास मौजूद दवा CDSCO के अलर्ट में शामिल किसी प्रभावित बैच से संबंधित है, तो वह दवा का नाम, बैच नंबर, निर्माता और एक्सपायरी डेट की जांच कर सकता है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या फार्मासिस्ट से सलाह लेना उचित होगा।
कुल मिलाकर, CDSCO की जुलाई 2026 की जांच ने दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी को लेकर एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखी है। राज्य प्रयोगशालाओं में 199 नमूने NSQ पाए गए और केंद्रीय प्रयोगशालाओं के 40 नमूने भी गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। कुछ नमूनों में सक्रिय औषधीय घटक की मात्रा बेहद कम या शून्य पाई गई, जबकि अन्य में dissolution, identification, assay या माइक्रोबियल गुणवत्ता से जुड़ी कमियां सामने आईं। इसलिए इसे सीधे ‘199 दवाएं असरहीन’ कहना सही नहीं होगा। वास्तविक चिंता उन विशिष्ट दवा नमूनों और संबंधित बैचों की गुणवत्ता को लेकर है, जिनमें नियामकीय जांच के दौरान निर्धारित मानकों का उल्लंघन पाया गया।




