प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
राजनीतिक जनादेश मिलने के बाद नरेंद्र मोदी ने गुजरात में शासन की ऐसी संरचना तैयार करनी शुरू की जिसका असर आने वाले वर्षों की कृषि, ऊर्जा और निवेश नीतियों में दिखाई दिया।
दिसंबर 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम ने नरेंद्र मोदी को वह राजनीतिक स्थिरता दे दी जिसकी किसी भी सरकार को बड़े प्रशासनिक बदलावों के लिए आवश्यकता होती है। भाजपा ने 182 में से 127 सीटें जीतीं। मेरे लिए इसके बाद का वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वह दौर था जब गुजरात सरकार में बड़े राजनीतिक नारों से अधिक महत्व उन संस्थागत बदलावों को मिलने लगा जो आगे चलकर राज्य के विकास मॉडल की बुनियाद बने।
इस चरण को समझने के लिए हमें तत्काल परिणामों से थोड़ा पीछे हटना होगा। 2002 की हिंसा के बाद गुजरात की सरकार को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के साथ संबंधों में भी दूरी आई। ऐसे वातावरण में राज्य के लिए निवेश आकर्षित करना केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं था, बल्कि शासन की विश्वसनीयता बहाल करने का भी एक माध्यम बन गया।
मोदी ने इस दिशा में पारंपरिक प्रशासनिक माध्यमों से आगे बढ़कर उद्योग जगत से सीधे संवाद शुरू किया। सरकार और उद्योग के बीच बातचीत में मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका बढ़ी। गुजरात को निवेश के लिए अधिक अनुकूल राज्य के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश शुरू हुई। बाद के वर्षों में यही सोच वाइब्रेंट गुजरात जैसे आयोजनों के रूप में सामने आई, लेकिन उसकी प्रशासनिक तैयारी और मानसिकता इसी शुरुआती चरण में दिखाई देने लगी थी।
इस अवधि में कृषि प्रशासन के क्षेत्र में भी एक अलग तरह का प्रयोग आकार ले रहा था। किसानों तक सरकारी योजनाओं और कृषि विशेषज्ञता को पहुंचाने के लिए कृषि महोत्सव की अवधारणा विकसित की गई। परंपरागत व्यवस्था में किसान को सहायता या तकनीकी सलाह के लिए सरकारी कार्यालयों तक जाना पड़ता था। इसके बजाय सरकार ने कृषि विभाग, वैज्ञानिकों, मिट्टी परीक्षण और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को गांवों तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित करने की कोशिश की।
मेरे विचार में इसका प्रशासनिक महत्व किसी एक कृषि मेले से कहीं अधिक था। इसमें सरकार की भूमिका को प्रतिक्रियाशील व्यवस्था से सक्रिय सेवा प्रदाता में बदलने की कोशिश दिखाई देती थी। नागरिक आवेदन लेकर सरकारी कार्यालय पहुंचे, इसके बजाय सरकार स्वयं नागरिक तक पहुंचे, यह सोच आगे चलकर मोदी की कई योजनाओं में दिखाई दी।
ऊर्जा क्षेत्र में भी इसी समय एक ऐसा विचार आकार ले रहा था जिसका प्रभाव गुजरात की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक पड़ा। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि पंपों और घरेलू उपयोग के लिए एक ही बिजली वितरण व्यवस्था होने के कारण बिजली की गुणवत्ता, आपूर्ति और वितरण पर लगातार दबाव रहता था। कृषि उपभोक्ताओं को दी जाने वाली बिजली पर भारी सब्सिडी का बोझ भी राज्य की बिजली वितरण कंपनियों के लिए चुनौती था।
ऊर्जा विभाग में कृषि और घरेलू बिजली आपूर्ति के लिए अलग फीडर बनाने की योजना पर काम शुरू हुआ। इसका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को अपेक्षाकृत नियमित बिजली देना और सिंचाई के लिए कृषि पंपों को निर्धारित समय के अनुसार बिजली उपलब्ध कराना था। तकनीकी दृष्टि से यह आसान काम नहीं था। हजारों किलोमीटर की वितरण लाइनों में बदलाव और नए ढांचे के निर्माण की आवश्यकता थी।
बाद में यही योजना ज्योतिग्राम के नाम से गुजरात के सबसे चर्चित प्रशासनिक प्रयोगों में शामिल हुई। इसकी सफलता को केवल बिजली उपलब्ध कराने के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसका संबंध ग्रामीण जीवन की पूरी अर्थव्यवस्था से था। घरों में बिजली की नियमित उपलब्धता से शिक्षा, छोटे कारोबार और घरेलू गतिविधियों को आधार मिला, जबकि कृषि क्षेत्र में बिजली की आपूर्ति को अलग ढंग से व्यवस्थित किया गया।
इसी समय प्रशासन के भीतर एक और बदलाव स्पष्ट हो रहा था। मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका बढ़ रही थी और विभागों से योजनाओं की प्रगति पर नियमित रिपोर्ट मांगी जा रही थी। निर्णय प्रक्रिया में समय और परिणाम दोनों को अधिक महत्व मिलने लगा। यह केंद्रीकरण बाद में मोदी की शासन शैली की सबसे चर्चित विशेषताओं में शामिल हुआ।
राजनीतिक स्तर पर भी 2002 के चुनाव के बाद मोदी ने पार्टी और सरकार पर अपनी पकड़ मजबूत की। गुजरात में लंबे समय तक चलने वाले प्रशासनिक प्रयोगों के लिए राजनीतिक स्थिरता आवश्यक थी और मोदी ने इस स्थिरता को अपने नेतृत्व के इर्द गिर्द संगठित किया।
इसलिए 2002 से 2003 को मैं किसी बड़े नारे या एकल योजना का वर्ष नहीं मानता। यह उस प्रशासनिक वास्तु की तैयारी का समय था जिसमें कृषि को गांव तक ले जाने की कोशिश, बिजली वितरण को नए ढंग से संगठित करने की योजना, उद्योग के साथ सीधे संवाद और मुख्यमंत्री कार्यालय के बढ़ते नियंत्रण जैसे तत्व एक साथ दिखाई देने लगे थे।
बाद के वर्षों में गुजरात की विकास कहानी जिन योजनाओं और आंकड़ों के साथ देश के सामने आई, उनमें से कई की बुनियादी सोच इसी दौर में तैयार हुई थी।
मेरे लिए इस वर्ष की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि शासन का ध्यान तत्काल संकट से निकलकर व्यवस्था को बदलने की ओर बढ़ रहा था। 2001 में सरकार को राज्य संभालना था। 2002 के बाद उसे एक ऐसी दिशा देनी थी जिसमें प्रशासन केवल समस्याओं पर प्रतिक्रिया न करे, बल्कि पहले से तैयारी करके नागरिक और अर्थव्यवस्था दोनों की जरूरतों तक पहुंचे। गुजरात में परिवर्तन का वास्तविक ढांचा इसी शांत दौर में तैयार होना शुरू हुआ।




