सातवां वर्ष: स्थायित्व ने शासन को दी लंबी दृष्टि

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प्रेम शंकर झा, आईआरएसएस

सरकार के पास पांच साल होते हैं, लेकिन अच्छे शासन के पास समय की समझ उससे कहीं लंबी होनी चाहिए। एक चुनावी कार्यकाल में सड़क बनाई जा सकती है, लेकिन किसी बंदरगाह को आर्थिक केंद्र बनने में वर्षों लगते हैं। बिजली की एक परियोजना पूरी की जा सकती है, लेकिन उसके भरोसे उद्योग खड़े होने में समय लगता है। विश्वविद्यालय एक वर्ष में खुल सकता है, लेकिन उससे निकलने वाली विशेषज्ञ पीढ़ी तैयार होने में दशक लगते हैं। इसलिए किसी सरकार की निरंतरता का वास्तविक मूल्य इस बात में होता है कि क्या वह तत्काल राजनीतिक लाभ से आगे जाकर ऐसे फैसले ले सकती है जिनका पूरा फल बाद में मिलने वाला हो। गुजरात में 2007-08 का वर्ष इसी दीर्घ दृष्टि का महत्वपूर्ण चरण था।

सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद नरेन्द्र मोदी का सातवां वर्ष उस समय आया जब राज्य की प्रशासनिक दिशा काफी हद तक स्पष्ट हो चुकी थी। दिसंबर 2007 में भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात विधानसभा की 182 में से 117 सीटें जीतकर लगातार तीसरी सरकार बनाने का जनादेश हासिल किया। इस निरंतरता का महत्व केवल इतना नहीं था कि वही राजनीतिक नेतृत्व सत्ता में बना रहा। इसका बड़ा अर्थ यह था कि जिन परियोजनाओं को पहले पांच-छह वर्षों में शुरू किया गया था, उन्हें अब उसी नीति-दृष्टि के साथ अगले चरण तक ले जाने का समय उपलब्ध था।

प्रशासन में इसे अक्सर निरंतरता कहा जाता है, लेकिन इसका अर्थ केवल अधिकारियों या मंत्रियों का अपने पद पर बने रहना नहीं है। वास्तविक निरंतरता तब बनती है जब किसी राज्य में नीति की स्मृति बनी रहती है। एक परियोजना शुरू करने वाला अधिकारी उसके अगले चरण को भी समझता है, विभाग जानता है कि पिछली मंजूरी के पीछे क्या उद्देश्य था और सरकार को हर बार अपनी प्राथमिकताओं को शून्य से समझाने की जरूरत नहीं पड़ती। बड़े बुनियादी ढांचे में यही निरंतरता समय और लागत दोनों बचा सकती है। गुजरात में इस तरह की प्रशासनिक निरंतरता ने लंबी अवधि की परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए अनुकूल वातावरण बनाया।

इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण राज्य का समुद्री आधारभूत ढांचा था। गुजरात के पास देश की सबसे लंबी समुद्री तटरेखाओं में से एक थी, लेकिन तटरेखा अपने आप आर्थिक शक्ति नहीं बनती। उसे बंदरगाह, सड़क, रेल, बिजली, औद्योगिक क्षेत्र और बाजार से जोड़ना पड़ता है। पिछले वर्षों में शुरू की गई इसी प्रक्रिया का परिणाम 2007-08 तक अधिक स्पष्ट हुआ। राज्य के बंदरगाहों की कुल क्षमता 2001 के लगभग 135 मिलियन टन से बढ़कर 2007-08 में करीब 198 मिलियन टन हो गई। गैर-प्रमुख बंदरगाहों से इसी वर्ष लगभग 147 मिलियन टन माल का आवागमन हुआ।यह केवल माल ढुलाई के आंकड़ों की कहानी नहीं थी। इसके पीछे एक बदलती आर्थिक सोच थी। बंदरगाह को अलग परियोजना मानने के बजाय उसे उद्योग के साथ जोड़ना, उद्योग को बिजली से जोड़ना और बिजली को ऊर्जा तथा परिवहन नेटवर्क से जोड़ना एक ऐसी श्रृंखला बना रहा था जिसमें राज्य की भौगोलिक स्थिति आर्थिक लाभ में बदल सकती थी। मुंद्रा, दहेज, हजीरा और पिपावाव जैसे तटीय केंद्र इसी व्यापक बदलाव के अलग-अलग उदाहरण बने।

जनवरी 2007 का वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट इस दृष्टि का दूसरा पहलू था। निवेश आकर्षित करना अपने आप में कोई नई बात नहीं थी। महत्वपूर्ण यह था कि ऊर्जा, पेट्रोलियम, बंदरगाह, विनिर्माण, कृषि, वस्त्र और विशेष आर्थिक क्षेत्रों को एक दूसरे से जुड़े आर्थिक ढांचे के रूप में प्रस्तुत किया गया। 2007 के सम्मेलन में 343 समझौता ज्ञापनों के जरिए लगभग 3.57 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव दर्ज हुए और लगभग 12.93 लाख रोजगार की संभावना बताई गई। इन प्रस्तावों को वास्तविक निवेश के बराबर नहीं माना जा सकता, लेकिन वे उस समय राज्य द्वारा तैयार किए जा रहे औद्योगिक विस्तार की महत्वाकांक्षा और पैमाने को अवश्य दर्शाते हैं।पर किसी भी औद्योगिक रणनीति की सीमा अंततः पूंजी नहीं, मनुष्य तय करता है। उद्योग को इंजीनियर चाहिए, ऊर्जा क्षेत्र को विशेषज्ञ चाहिए, नई तकनीक को प्रशिक्षित युवा चाहिए। इसी समझ ने उच्च शिक्षा को भी राज्य की आर्थिक रणनीति से जोड़ना शुरू किया। 2007 में पंडित दीनदयाल पेट्रोलियम विश्वविद्यालय की स्थापना इसी दिशा का उदाहरण थी। पेट्रोलियम और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों के लिए विशिष्ट मानव संसाधन तैयार करने की जरूरत को उच्च शिक्षा की संस्था से जोड़ा गया। आगे फोरेंसिक विज्ञान और पुलिस प्रशासन जैसे विशिष्ट क्षेत्रों के लिए भी संस्थागत ढांचे का विस्तार हुआ।

यहां गुजरात के उस दौर की प्रशासनिक सोच का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। सड़क, बिजली और बंदरगाह को विकास की भौतिक परिसंपत्तियां माना जा सकता है, लेकिन विश्वविद्यालय भी उतनी ही महत्वपूर्ण दीर्घकालिक परिसंपत्ति है। पहली श्रेणी अर्थव्यवस्था को चलाने की क्षमता बनाती है, दूसरी उसे लंबे समय तक चलाने के लिए मनुष्य तैयार करती है। इन दोनों को एक ही नीति-श्रृंखला में देखना उस समय की शासन शैली की व्यापकता को दिखाता है।

ऊर्जा क्षेत्र में भी सातवें वर्ष तक पिछले फैसलों का संचयी प्रभाव सामने आने लगा था। ज्योतिग्राम के तहत कृषि और घरेलू बिजली के फीडरों को अलग करने से ग्रामीण बिजली वितरण को अधिक व्यवस्थित आधार मिला। नियमित बिजली का अर्थ केवल रोशनी नहीं था। इससे खेती का समय निर्धारित हुआ, ग्रामीण कारोबार को भरोसेमंद ऊर्जा मिली और उद्योग के लिए भी बिजली की उपलब्धता को अधिक व्यवस्थित ढंग से देखा जा सका। किसी एक योजना का महत्व अक्सर उसके तत्काल आंकड़े से नहीं, बल्कि उसके बाद पैदा होने वाली प्रशासनिक क्षमता से समझ में आता है।

यही सातवें वर्ष की असली कहानी है। पहले वर्षों में बनाए गए संस्थागत और भौतिक ढांचे अब एक दूसरे से जुड़ने लगे थे। बिजली उद्योग से जुड़ी, उद्योग बंदरगाह से, बंदरगाह सड़क और रेल से और आर्थिक विस्तार शिक्षा तथा कौशल की नई जरूरतों से। शासन अलग-अलग विभागों की योजनाओं का जोड़ भर नहीं रह गया था; उसमें एक व्यापक आर्थिक तर्क दिखाई देने लगा था।

नरेन्द्र मोदी के गुजरात कार्यकाल का 2007-08 इसलिए महत्वपूर्ण है कि तीसरे जनादेश ने सरकार को केवल एक और पांच वर्ष नहीं दिए। उसने उसे समय की निरंतरता को नीति की निरंतरता में बदलने का अवसर दिया। यही वह अंतर है जो अल्पकालिक प्रशासन और दीर्घकालिक शासन के बीच होता है। कोई भी सरकार हर समस्या का समाधान अपने कार्यकाल में नहीं कर सकती, लेकिन वह ऐसी दिशा और संस्थाएं जरूर बना सकती है जिनका लाभ उसके कार्यकाल से आगे जाता रहे।

गुजरात में सातवें वर्ष तक इसी सोच के संकेत स्पष्ट हो चुके थे। बंदरगाहों की बढ़ती क्षमता, औद्योगिक आधार का विस्तार, ऊर्जा व्यवस्था की मजबूती और विशेषीकृत उच्च शिक्षा संस्थानों का निर्माण अलग-अलग उपलब्धियां नहीं थे। वे एक ऐसे राज्य की कल्पना के हिस्से थे जिसकी आर्थिक और प्रशासनिक क्षमता को तत्काल परिणामों के साथ-साथ आने वाले वर्षों के लिए भी तैयार किया जा रहा था।

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