भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में स्वदेशी तकनीक और घरेलू निर्माण क्षमता को लगातार बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसी कड़ी में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के विभिन्न केंद्रों ने रॉकेट और सैटेलाइट से जुड़े महत्वपूर्ण उपकरणों के निर्माण, विकास और परीक्षण के लिए कई टेंडर जारी किए हैं। इन निविदाओं में फ्लाइट सोलर पैनल की फैब्रिकेशन और टेस्टिंग से लेकर रॉकेट में इस्तेमाल होने वाले मैकेनिकल कंपोनेंट, वाइब्रेशन टेस्टिंग उपकरण और थ्रस्ट मापने वाली प्रणाली तक के काम शामिल हैं। इन गतिविधियों का उद्देश्य अंतरिक्ष अभियानों के लिए जरूरी उपकरणों और उनकी सप्लाई चेन में घरेलू भागीदारी को बढ़ाना है।
बेंगलुरु स्थित यूआर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) की ओर से फ्लाइट सोलर पैनलों की फैब्रिकेशन और टेस्टिंग से जुड़ा एक महत्वपूर्ण वर्क पैकेज जारी किया गया है। टेंडर दस्तावेज के अनुसार यह 24 महीने की अवधि वाला रेट कॉन्ट्रैक्ट है। इसमें न्यूनतम एक और अधिकतम 12,480 यूनिट तक के ऑर्डर का प्रावधान दर्ज है। इस टेंडर के लिए बोली जमा करने की अंतिम तारीख 5 अक्टूबर 2026 बताई गई है। सैटेलाइट के लिए सौर पैनल बेहद अहम होते हैं, क्योंकि वे अंतरिक्ष यान के विभिन्न इलेक्ट्रिकल सिस्टम को बिजली उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इनके निर्माण और परीक्षण की घरेलू क्षमता मजबूत होने से सैटेलाइट निर्माण की प्रक्रिया में भारतीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ सकती है।
ISRO के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) ने रॉकेट से संबंधित मैकेनिकल कंपोनेंट के स्वदेशी विकास के लिए भी टेंडर जारी किया है। इसमें रॉड एंड बेयरिंग के विकास से जुड़ा काम शामिल है। ISRO के ई-प्रोक्योरमेंट रिकॉर्ड में दर्ज इस निविदा के लिए बोली जमा करने की अंतिम तारीख 15 अक्टूबर 2026 निर्धारित की गई है। रॉड और बेयरिंग जैसे घटक विभिन्न यांत्रिक प्रणालियों में इस्तेमाल किए जाते हैं और इनके घरेलू विकास से संबंधित तकनीकी क्षमता तथा निर्माण विशेषज्ञता को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
सैटेलाइट और अंतरिक्ष यान को लॉन्च के दौरान अत्यधिक कंपन और यांत्रिक दबाव का सामना करना पड़ता है। इसी वजह से लॉन्च से पहले उनके विभिन्न हिस्सों की वाइब्रेशन टेस्टिंग की जाती है। URSC ने वाइब्रेशन टेस्ट फिक्स्चर की खरीद के लिए भी टेंडर जारी किया है। सरकारी ई-प्रोक्योरमेंट रिकॉर्ड के मुताबिक इस टेंडर की अनुमानित कीमत करीब 1.04 करोड़ रुपये है और इसे पूरा करने की अवधि 120 दिन रखी गई है। टेंडर में क्लास-I या क्लास-II स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को पात्रता दी गई है। इस तरह की परीक्षण सुविधाओं और उपकरणों का घरेलू स्तर पर उपलब्ध होना अंतरिक्ष प्रणालियों के परीक्षण और क्वालिफिकेशन प्रक्रिया के लिए उपयोगी हो सकता है।
रॉकेट प्रणोदन से जुड़ी परीक्षण क्षमता बढ़ाने के लिए सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC-SHAR), श्रीहरिकोटा की ओर से HPS3 Axial Thrust Measurement System की फैब्रिकेशन और सप्लाई के लिए भी निविदा जारी की गई है। टेंडर रिकॉर्ड के अनुसार यह निविदा 8 सितंबर 2026 को जारी हुई थी और इसके लिए बोली जमा करने की अंतिम तारीख 29 सितंबर 2026 निर्धारित की गई है। थ्रस्ट मापन प्रणाली रॉकेट इंजन और प्रणोदन प्रणालियों के परीक्षण के दौरान उत्पन्न बल को मापने में इस्तेमाल की जाती है। इस तरह के उपकरण रॉकेट परीक्षण की सटीकता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ISRO की स्वदेशीकरण की कोशिश केवल बड़े मैकेनिकल उपकरणों तक सीमित नहीं है। संगठन की ई-प्रोक्योरमेंट गतिविधियों में स्पेस-ग्रेड इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट और विभिन्न ऑन-बोर्ड प्रणालियों से जुड़े कई काम भी शामिल हैं। इनमें रेजिस्टर, कैपेसिटर, चिप रेजिस्टर, MOSFET, RF उपकरण, ऑन-बोर्ड इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल, डेटा एक्विजिशन बोर्ड और संचार से संबंधित उपकरणों की खरीद या विकास जैसी गतिविधियां शामिल हैं। URSC की कुछ निविदाओं में ऑन-बोर्ड मॉड्यूल के डिजाइन, फैब्रिकेशन, असेंबली, टेस्टिंग और डिलीवरी से संबंधित कार्य भी शामिल हैं।
इन टेंडरों का व्यापक महत्व भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र की घरेलू सप्लाई चेन के विस्तार से जुड़ा है। रॉकेट और सैटेलाइट के लिए जरूरी उपकरणों का निर्माण केवल ISRO की प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसमें निजी कंपनियों, विशेषज्ञ निर्माताओं और तकनीकी संस्थानों की भी भूमिका हो सकती है। ऐसे कामों के बढ़ने से भारतीय कंपनियों को स्पेस सेक्टर में निर्माण और परीक्षण क्षमता विकसित करने के अवसर मिल सकते हैं। इसके साथ ही महत्वपूर्ण उपकरणों और घटकों के लिए बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि, किसी टेंडर के जारी होने को किसी उपकरण या पूरी अंतरिक्ष प्रणाली के पूरी तरह स्वदेशी हो जाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। किसी कंपोनेंट की वास्तविक आत्मनिर्भरता उसके डिजाइन, कच्चे माल, निर्माण प्रक्रिया, गुणवत्ता नियंत्रण, परीक्षण और स्पेस-क्वालिफिकेशन जैसे कई चरणों पर निर्भर करती है। इसलिए मौजूदा टेंडरों को भारत में घरेलू तकनीकी और विनिर्माण क्षमता बढ़ाने की प्रक्रिया के हिस्से के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
ISRO की सितंबर 2026 की ई-प्रोक्योरमेंट गतिविधियों में जिस तरह रॉकेट के मैकेनिकल कंपोनेंट से लेकर सैटेलाइट के सौर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और परीक्षण प्रणालियों से जुड़े काम सामने आए हैं, उससे अंतरिक्ष क्षेत्र में घरेलू निर्माण क्षमता विकसित करने पर लगातार जोर दिखाई देता है। यदि इन क्षेत्रों में भारतीय उद्योग की भागीदारी आगे भी बढ़ती है, तो इससे देश में स्पेस-मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को विस्तार देने और अंतरिक्ष अभियानों के लिए जरूरी उपकरणों की घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।




