11वां वर्ष: कौशल और ऊर्जा दक्षता से तैयार होती नई औद्योगिक जमीन

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प्रेम शंकर झा, आईआरएसएस

किसी अर्थव्यवस्था के सामने एक समय ऐसा आता है, जब केवल नए उद्योग लगाना पर्याप्त नहीं रहता। उद्योगों को प्रशिक्षित कर्मचारी चाहिए, बिजली की भरोसेमंद आपूर्ति चाहिए और ऐसा प्रशासन चाहिए जो निवेश के बाद पैदा होने वाली रोजमर्रा की जरूरतों को उतनी ही तेजी से संभाल सके। गुजरात में 2011-12 तक औद्योगिक विस्तार की चर्चा इसी अगले चरण तक पहुंच चुकी थी। सवाल अब यह नहीं था कि राज्य में निवेश आएगा या नहीं, बल्कि यह था कि उसके लिए जरूरी मानव संसाधन और आधारभूत व्यवस्था कितनी तैयार है। सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद माननीय नरेन्द्र मोदी जी का ग्यारहवां वर्ष 2011 से 2012 के बीच आया। इस समय तक राज्य में उद्योग, ऊर्जा, सड़क, बंदरगाह और कृषि के क्षेत्र में एक बड़ा आधार तैयार हो चुका था। इसके साथ एक नई आवश्यकता उभर रही थी। बदलती औद्योगिक अर्थव्यवस्था के लिए ऐसे युवाओं की जरूरत थी जिनके पास केवल सामान्य शिक्षा नहीं, बल्कि मशीनों, उत्पादन प्रक्रियाओं, ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग और आधुनिक तकनीक से जुड़ा व्यावहारिक कौशल हो।

इसी जरूरत ने गुजरात की कौशल नीति को नई दिशा दी। औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों यानी आइटीआइ को केवल पारंपरिक ट्रेड सिखाने वाले संस्थानों के रूप में देखने के बजाय उन्हें उद्योग की जरूरतों से जोड़ने पर जोर दिया गया। निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी के माध्यम से प्रशिक्षण की गुणवत्ता और पाठ्यक्रम को रोजगार की वास्तविक मांग के अनुरूप बनाने का प्रयास हुआ। कुछ संस्थानों में आधुनिक मशीनरी, उद्योग विशेषज्ञों की भागीदारी और नए ट्रेडों को शामिल किया गया। इस व्यवस्था की सोच सीधी थी। किसी कंपनी को प्रशिक्षित कर्मचारी बाहर से लाने पड़ें, उससे बेहतर है कि जिस क्षेत्र में उद्योग स्थापित हो रहे हैं, वहीं की युवा आबादी को उस उद्योग की जरूरत के अनुरूप तैयार किया जाए। इससे उद्योग को मानव संसाधन मिलता है और स्थानीय युवाओं को रोजगार की नई संभावना। कौशल विकास इसलिए शिक्षा विभाग की सीमित गतिविधि नहीं रह जाता; वह औद्योगिक नीति का हिस्सा बन जाता है।

गुजरात में इस दिशा में राज्य स्तरीय कौशल विकास ढांचे को मजबूत करने और आइटीआइ के आधुनिकीकरण के प्रयास आगे बढ़े। उद्योगों के साथ साझेदारी का प्रयोग बाद में देश की राष्ट्रीय कौशल नीति में दिखाई देने वाली उस सोच से मेल खाता था जिसमें प्रशिक्षण को बाजार की मांग से जोड़ने पर जोर दिया गया। इसे बाद की राष्ट्रीय योजनाओं का सीधा प्रारूप कहना इतिहास को पीछे से देखने जैसा होगा, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि गुजरात में उद्योग आधारित कौशल प्रशिक्षण की एक व्यावहारिक प्रयोगशाला तैयार हो रही थी। इसी समय ऊर्जा क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण काम चल रहा था। औद्योगिक निवेश का कोई अर्थ नहीं यदि बिजली की आपूर्ति अनिश्चित हो। गुजरात ने बिजली उत्पादन बढ़ाने के साथ संचरण और वितरण व्यवस्था को भी प्रशासनिक प्राथमिकता दी। राज्य विद्युत क्षेत्र में तकनीकी और वाणिज्यिक नुकसान कम करने, फीडर प्रबंधन, मीटरिंग और वितरण व्यवस्था में सुधार पर लगातार काम किया गया।

2011-12 के आसपास गुजरात की विद्युत वितरण कंपनियों के प्रदर्शन को राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर माना जा रहा था। खासकर पश्चिमी और उत्तरी गुजरात के वितरण नेटवर्क में लाइन लॉस और बिजली चोरी को नियंत्रित करने की कोशिशों ने वितरण व्यवस्था की दक्षता बढ़ाई। ज्योतिग्राम योजना के तहत कृषि और गैर-कृषि फीडरों के पृथक्करण ने भी इस पूरी व्यवस्था को अधिक प्रबंधनीय बनाया। इससे बिजली केवल उत्पादन का विषय नहीं रही; उसकी प्रत्येक यूनिट को सही जगह और सही उपयोग तक पहुंचाना भी प्रशासनिक लक्ष्य बना।

यही वह बिंदु था जहां कौशल और बिजली की दो अलग नीतियां एक ही औद्योगिक कहानी का हिस्सा बनती थीं। उद्योग को प्रशिक्षित कर्मचारी चाहिए और उत्पादन के लिए स्थिर ऊर्जा। एक व्यवस्था मानव संसाधन तैयार करती है, दूसरी उत्पादन की ऊर्जा जरूरत को पूरा करती है। इनके बीच सड़क, बंदरगाह और औद्योगिक क्षेत्र आर्थिक गतिविधि को बाजार तक पहुंचाते हैं। 2011 में गुजरात का यह प्रशासनिक अनुभव राष्ट्रीय बहस में भी अधिक दिखाई देने लगा। मुख्यमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी के शासन मॉडल पर उद्योग जगत, निवेशकों और नीति विशेषज्ञों की चर्चा बढ़ी। इसका एक कारण यह था कि गुजरात में प्रशासन को निवेश आकर्षित करने की गतिविधि तक सीमित रखने के बजाय बिजली, भूमि, सड़क, कौशल और उद्योग के बीच समन्वय बनाने का प्रयास किया गया था। राज्य की आर्थिक नीतियां धीरे-धीरे एक ऐसी प्रशासनिक शैली की पहचान बनाने लगीं जिसमें निर्णय लेने की गति और उसके क्रियान्वयन की निगरानी को महत्व दिया गया।

इसी वर्ष सितंबर 2011 में शुरू हुआ सद्भावना मिशन भी उनके सार्वजनिक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना। गुजरात के एक दशक से अधिक लंबे प्रशासन के बाद विकास के साथ सामाजिक एकता और साझा नागरिक पहचान को लेकर भी संदेश दिया गया। इससे मुख्यमंत्री की सार्वजनिक भूमिका का दायरा केवल आर्थिक प्रशासन तक सीमित नहीं रहा।

2011-12 का गुजरात इसलिए केवल अधिक निवेश या अधिक उद्योग का गुजरात नहीं था। यह उस व्यवस्था को तैयार करने का समय था जिसमें उद्योग आने के बाद उसके लिए कर्मचारी मिलें, बिजली की उपलब्धता बनी रहे और प्रशासनिक तंत्र रोजमर्रा की अड़चनों को संभाल सके। कौशल विकास और ऊर्जा दक्षता जैसे विषय पहली नजर में तकनीकी लगते हैं, लेकिन किसी औद्योगिक अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक क्षमता इन्हीं अपेक्षाकृत शांत क्षेत्रों में तैयार होती है।

एक दशक से अधिक समय में गुजरात में तैयार हुई प्रशासनिक संरचना अब नए प्रश्नों का सामना कर रही थी। सड़क और बिजली पहुंचाने के बाद अगला सवाल था कि क्या राज्य अपने युवाओं को उसी बदलती अर्थव्यवस्था के लिए तैयार कर सकता है। 2011-12 में कौशल प्रशिक्षण को उद्योग से जोड़ने और ऊर्जा व्यवस्था को अधिक दक्ष बनाने की कोशिश इसी प्रश्न का उत्तर थी। यही कारण है कि इस वर्ष को गुजरात की औद्योगिक यात्रा में विस्तार से अधिक क्षमता निर्माण के वर्ष के रूप में पढ़ना अधिक उचित होगा।

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