भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता और हथियारों के निर्यात में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदलाव देखने को मिला है। स्वदेशी रक्षा प्रणालियों की बढ़ती मांग के बीच ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भारत के लिए एक प्रमुख रक्षा निर्यात उत्पाद के रूप में उभरी है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के अनुसार, ब्रह्मोस से जुड़े निर्यात और समझौतों का कुल मूल्य 600 मिलियन डॉलर से अधिक होने की दिशा में है। भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग 56 से 58 अरब रुपये के आसपास बैठती है। हालांकि इस आंकड़े को पूरी तरह से हो चुके और प्राप्त हो चुके निर्यात के रूप में देखना उचित नहीं होगा, क्योंकि इसमें अलग-अलग देशों के मौजूदा सौदे और समझौते शामिल हैं तथा प्रत्येक अनुबंध की भुगतान और आपूर्ति की शर्तें अलग-अलग हैं।
ब्रह्मोस की अंतरराष्ट्रीय यात्रा में फिलीपींस को पहला बड़ा ग्राहक माना जाता है। जनवरी 2022 में भारत और फिलीपींस के बीच ब्रह्मोस शोर-बेस्ड एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम की आपूर्ति के लिए लगभग 330 मिलियन डॉलर का समझौता हुआ था। यह सौदा भारत के रक्षा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि पहली बार भारत की इस उन्नत मिसाइल प्रणाली को किसी विदेशी देश को निर्यात किया गया। इसके बाद ब्रह्मोस सिस्टम की डिलीवरी फिलीपींस को शुरू हुई और वहां इसकी तैनाती से दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को भी नई दिशा मिली।
फिलीपींस के बाद दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों में भी ब्रह्मोस को लेकर रुचि बढ़ी है। भारत और वियतनाम के बीच ब्रह्मोस मिसाइल की संभावित आपूर्ति को लेकर समझौते की जानकारी सामने आ चुकी है। हालांकि इस सौदे की विस्तृत वित्तीय शर्तें सार्वजनिक रूप से पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। इसके बावजूद वियतनाम के साथ ब्रह्मोस सहयोग को भारत के बढ़ते रक्षा निर्यात और दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ती रणनीतिक भागीदारी के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इंडोनेशिया भी ब्रह्मोस के संभावित खरीदारों में महत्वपूर्ण नाम बनकर सामने आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने से जुड़े समझौतों पर चर्चा हुई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इंडोनेशिया को दो ब्रह्मोस मिसाइल बैटरियों की आपूर्ति का सौदा लगभग 200 मिलियन डॉलर का बताया गया है। अगर यह समझौता पूरी तरह लागू होता है तो दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की मिसाइल प्रणालियों की मौजूदगी और मजबूत होगी।
ब्रह्मोस को लेकर भारत की बातचीत केवल इन देशों तक सीमित नहीं है। कई अन्य देश भी भारतीय रक्षा प्रणालियों में रुचि दिखा रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक संयुक्त अरब अमीरात के साथ ब्रह्मोस सहित कुछ भारतीय रक्षा प्रणालियों की संभावित बिक्री को लेकर बातचीत हुई है। इसके अलावा थाईलैंड, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और चिली जैसे देशों की ओर से भी भारतीय रक्षा उपकरणों में रुचि की जानकारी सामने आई है। हालांकि इन देशों के साथ चल रही बातचीत को अंतिम बिक्री समझौता मानना जल्दबाजी होगी और किसी भी संभावित सौदे की पुष्टि आधिकारिक अनुबंध होने के बाद ही मानी जाएगी।
ब्रह्मोस की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग के पीछे इसकी तकनीकी क्षमता भी एक महत्वपूर्ण कारण है। यह भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से विकसित सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली है। इसे अलग-अलग प्लेटफॉर्म से इस्तेमाल करने के लिए विकसित किया गया है और इसका उपयोग जमीन आधारित प्रणालियों तथा युद्धपोतों के अलावा विमान से भी किया जा सकता है। भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से इसके एयर-लॉन्च संस्करण का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी बहु-प्लेटफॉर्म क्षमता इसे उन देशों के लिए उपयोगी बनाती है जो अपनी समुद्री और तटीय सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करना चाहते हैं।
भारत के लिए ब्रह्मोस का महत्व केवल विदेशों में मिसाइल बेचने तक सीमित नहीं है। इसके निर्यात से भारतीय रक्षा उद्योग की तकनीकी क्षमता और उत्पादन क्षमता को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान मिल रही है। किसी उन्नत मिसाइल प्रणाली का निर्यात केवल मिसाइल की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके साथ प्रशिक्षण, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, लॉजिस्टिक्स और तकनीकी सहयोग जैसी जरूरतें भी जुड़ी होती हैं। इससे संबंधित देशों के साथ लंबे समय तक रक्षा सहयोग विकसित होने की संभावना रहती है।
ब्रह्मोस की सफलता को भारत के तेजी से बढ़ते रक्षा निर्यात के व्यापक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 23,622 करोड़ रुपये था। इस तरह रक्षा निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। सरकार स्वदेशी रक्षा उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ भारतीय हथियारों और सैन्य उपकरणों के लिए नए अंतरराष्ट्रीय बाजार तलाशने पर भी जोर दे रही है।
दक्षिण-पूर्व एशिया भारत की रक्षा निर्यात रणनीति में विशेष महत्व रखता है। फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ने के अलावा वियतनाम सहित कई देशों के साथ बातचीत ने इस क्षेत्र में भारत की मौजूदगी को बढ़ाया है। भारत के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां कई देश अपनी समुद्री सुरक्षा और सैन्य क्षमताओं को आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रहे हैं। ब्रह्मोस जैसी प्रणाली इस क्षेत्र में भारत के रक्षा उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण निर्यात अवसर बन सकती है।
कुल मिलाकर, ब्रह्मोस मिसाइल भारत की रक्षा निर्यात क्षमता का एक प्रमुख उदाहरण बनकर उभरी है। फिलीपींस के साथ हुए शुरुआती बड़े सौदे से लेकर वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ बढ़ते सहयोग तथा अन्य देशों के साथ चल रही बातचीत तक, ब्रह्मोस ने भारतीय रक्षा उद्योग के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई संभावनाएं खोली हैं। 600 मिलियन डॉलर से अधिक के निर्यात और संबंधित समझौतों का आंकड़ा इस क्षेत्र में भारत की बढ़ती पहुंच को दर्शाता है, हालांकि इसमें मौजूदा तथा संभावित सौदों के बीच अंतर करना जरूरी है। आने वाले समय में ब्रह्मोस के साथ-साथ दूसरे स्वदेशी रक्षा उत्पादों का निर्यात बढ़ता है तो भारत की रक्षा उद्योग में निर्माता और निर्यातक के रूप में भूमिका और व्यापक हो सकती है।




