प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
19 नवंबर 2021 को गुरु पर्व के दिन नरेन्द्र मोदी ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। पिछले एक वर्ष से अधिक समय से दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का आंदोलन चल रहा था। सरकार ने जिन कानूनों को कृषि बाजार में बड़े बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना था, उन्हीं कानूनों को वापस लेने का फैसला सामने था। संसद ने 29 नवंबर को निरसन विधेयक पारित किया और 30 नवंबर को इसे कानून का रूप दे दिया। यह नरेन्द्र मोदी सरकार के शासन की यात्रा में एक असाधारण क्षण था। सितंबर 2020 में संसद से पारित तीनों कानूनों का उद्देश्य किसानों को कृषि उपज बेचने के अधिक विकल्प देना, मंडी के बाहर व्यापार की अनुमति बढ़ाना और कृषि क्षेत्र में निजी निवेश को प्रोत्साहित करना था। सरकार इन्हें कृषि व्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने का प्रयास मानती थी। किसान संगठनों के एक बड़े हिस्से ने इसके उलट मंडी व्यवस्था, न्यूनतम समर्थन मूल्य और बड़े निजी खरीदारों की भूमिका को लेकर आशंकाएं जताईं। विरोध पहले पंजाब और हरियाणा में मजबूत हुआ और फिर दिल्ली की सीमाओं पर लंबे आंदोलन में बदल गया। 2021 में इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम केवल कानूनों की वापसी नहीं था। इसने भारतीय लोकतंत्र में नीति और सहमति के बीच के रिश्ते को एक बार फिर सामने रखा। सरकार के पास संसद में बहुमत था और उसके पास कृषि सुधार का अपना स्पष्ट तर्क भी था, लेकिन सड़क पर मौजूद व्यापक और लगातार विरोध ने उस नीति की राजनीतिक तथा सामाजिक स्वीकार्यता को चुनौती दी। प्रधानमंत्री ने कानून वापस लेने की घोषणा करते हुए कहा कि सरकार किसानों के एक वर्ग को अपने प्रयासों के बावजूद इन कानूनों के लाभ समझाने में सफल नहीं हो सकी।
यह निर्णय किसी एक राजनीतिक व्याख्या में समेटना कठिन है। सरकार ने इसे किसानों के हित में लिया गया कदम बताया। आलोचकों ने इसे सुधारों से पीछे हटना कहा। चुनावी राजनीति में इसके प्रभाव को लेकर भी अलग अलग आकलन सामने आए। लेकिन दस्तावेजी तथ्य इतना स्पष्ट है कि संसद द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानून एक साल से कुछ अधिक समय के भीतर वापस ले लिए गए। यही घटना 21वें वर्ष को नरेन्द्र मोदी की शासन यात्रा में एक अलग अर्थ देती है। पिछला वर्ष कोरोना के असाधारण संकट में बीता था। 2021 22 तक देश धीरे धीरे उस संकट से बाहर आने की कोशिश कर रहा था। टीकाकरण का विस्तार हो चुका था, बाजार खुल चुके थे और उद्योगों की गतिविधियां वापस लौट रही थीं। अर्थव्यवस्था अब उस गहरे गड्ढे से बाहर निकल रही थी जिसमें वह 2020 के लॉकडाउन के दौरान चली गई थी।
वित्त वर्ष 2020 21 में वास्तविक जीडीपी में 7.3 प्रतिशत की गिरावट आई थी। इसके बाद 2021 22 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 8.7 प्रतिशत दर्ज हुई। इस वापसी में पिछले वर्ष का कमजोर आधार भी महत्वपूर्ण था, इसलिए इसे पूरी तरह नई आर्थिक क्षमता का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। फिर भी यह स्पष्ट था कि बंद अर्थव्यवस्था अब फिर चल रही थी। सरकार की चुनौती अब केवल अर्थव्यवस्था को खोलने की नहीं थी। महामारी ने जिस दुनिया को बदल दिया था, उसमें भारत को अपनी आर्थिक स्थिति भी नए सिरे से मजबूत करनी थी। आत्मनिर्भर भारत और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन की दिशा में शुरू किए गए प्रयास इसी दौर में आगे बढ़े। इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा, दूरसंचार, ऑटोमोबाइल और अन्य क्षेत्रों में भारत को उत्पादन का बड़ा केंद्र बनाने की कोशिश जारी रही। इस आर्थिक पुनर्गठन के साथ बुनियादी ढांचे को भी एक नए तरीके से देखने की शुरुआत हुई। 13 अक्टूबर 2021 को प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान शुरू किया गया। इसका मूल विचार केवल सड़क या रेल बनाना नहीं था, बल्कि अलग अलग मंत्रालयों की परियोजनाओं को एक साझा डिजिटल मंच पर लाकर उनका समन्वित विकास करना था। रेल, सड़क, बंदरगाह, जलमार्ग, हवाई अड्डे और औद्योगिक क्षेत्रों की कनेक्टिविटी को एक साथ देखने का प्रयास किया गया। यह बदलाव नरेन्द्र मोदी के प्रशासनिक दृष्टिकोण के एक पुराने सूत्र को नई तकनीक के साथ जोड़ता था। समस्या केवल संसाधनों की कमी की नहीं थी। कई बार सड़क अलग बनती थी, रेल अलग योजना से और औद्योगिक क्षेत्र अलग विभाग के नक्शे पर। गति शक्ति ने इस बिखराव को एकीकृत योजना में बदलने का प्रयास किया। शासन में डिजिटल तकनीक अब केवल नागरिक सेवाओं तक सीमित नहीं थी। वह सरकार के भीतर निर्णय और परियोजना नियोजन का भी माध्यम बन रही थी और इसी समय देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था ने ऐसा आंकड़ा छुआ जिसने दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा। 2016 में शुरू हुआ यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस 2021-22 तक रोजमर्रा की भारतीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुका था। अप्रैल 2021 से मार्च 2022 के बीच यूपीआई पर करीब 4597 करोड़ लेनदेन हुए यानी एक साल में लगभग 46 अरब डिजिटल भुगतान। यह आंकड़ा केवल तकनीकी सफलता का आंकड़ा नहीं था। भारत में डिजिटल भुगतान की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसने भुगतान को बड़े शहरों और बड़े कारोबारों की सुविधा भर नहीं रहने दिया। किराने की दुकान, चाय की दुकान, सब्जी विक्रेता, छोटे व्यापारी और स्थानीय सेवा प्रदाता भी क्यूआर कोड के माध्यम से डिजिटल भुगतान स्वीकार करने लगे। मोबाइल फोन और बैंक खाते के बीच बना यह पुल धीरे धीरे रोजमर्रा के आर्थिक व्यवहार का हिस्सा बन गया।
यूपीआई की संरचना में सरकार की भूमिका और निजी नवाचार दोनों दिखाई देते हैं। सार्वजनिक डिजिटल अवसंरचना के ऊपर निजी बैंक और भुगतान अनुप्रयोग अपनी सेवाएं लेकर आए। ग्राहक को अलग अलग बैंक खातों के बीच धन भेजने के लिए एक सरल माध्यम मिला और छोटे भुगतान भी डिजिटल रिकॉर्ड का हिस्सा बनने लगे। 2021-22 तक यही वह बिंदु था जहां डिजिटल भारत किसी सरकारी अभियान की तरह नहीं, बल्कि नागरिक के रोजमर्रा के व्यवहार की तरह दिखाई देने लगा था। कृषि आंदोलन और यूपीआई की दो तस्वीरें एक ही वर्ष में मौजूद थीं। एक तरफ किसान दिल्ली की सीमाओं पर अपने अधिकार और आशंकाओं के साथ डटे थे। दूसरी तरफ देश के करोड़ों लोग बिना किसी सरकारी आदेश के डिजिटल भुगतान अपना रहे थे। पहली प्रक्रिया में सामाजिक सहमति का प्रश्न सामने था। दूसरी में उपयोगिता ने तकनीक को तेजी से स्वीकार्य बना दिया था। यही अंतर 21वें वर्ष की कहानी का एक महत्वपूर्ण सूत्र बनता है। सरकार की हर नीति का जीवन केवल उसके घोषित उद्देश्य से तय नहीं होता। कुछ नीतियां नागरिक की स्वीकृति और उपयोग से फैलती हैं, कुछ सामाजिक विरोध से रुकती या बदलती हैं और कुछ को लंबे समय तक राजनीतिक तथा प्रशासनिक संवाद की जरूरत पड़ती है। इसी बीच भारत की विदेश नीति के सामने भी दुनिया तेजी से बदल रही थी। अगस्त 2021 में तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लिया। काबुल की राजनीतिक व्यवस्था अचानक बदल गई। भारत के लिए वहां केवल रणनीतिक हित नहीं थे, बल्कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, अफगानिस्तान में लंबे समय से चल रहे विकास कार्य और आतंकवाद से जुड़ी सुरक्षा चिंताएं भी थीं। भारत ने ऑपरेशन देवी शक्ति के तहत अपने नागरिकों और कुछ अफगान नागरिकों को निकालने की प्रक्रिया शुरू की। विदेश मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2021 में इस अभियान के तहत भारतीयों, अफगान नागरिकों और तीसरे देशों के नागरिकों सहित सैकड़ों लोगों को निकाला गया। भारत ने बाद में अफगानिस्तान के लिए मानवीय सहायता भी जारी रखी। काबुल की बदलती स्थिति ने भारत को अपनी क्षेत्रीय रणनीति पर तेजी से पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। अगस्त के अंत में भारत ने दोहा में तालिबान के प्रतिनिधि से बातचीत भी की, जिसमें भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकवाद के लिए न होने की चिंता उठाई गई। यह उस विदेश नीति का एक अलग रूप था जिसमें पुराने संबंध और नई वास्तविकता दोनों को एक साथ संभालना था। इसी अवधि में भारत की हिंद प्रशांत रणनीति भी मजबूत होती दिखाई दी। मार्च 2021 में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के नेताओं की पहली क्वाड बैठक हुई और सितंबर में वाशिंगटन में पहला आमने सामने क्वाड शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। बैठक में वैक्सीन, तकनीक, जलवायु, साइबर क्षेत्र और बुनियादी ढांचे सहित कई क्षेत्रों में सहयोग पर जोर दिया गया। भारत के लिए इसका अर्थ केवल सामरिक साझेदारी बढ़ाना नहीं था। कोरोना के बाद दुनिया में आपूर्ति श्रृंखला, तकनीक और आर्थिक सुरक्षा भी विदेश नीति का हिस्सा बन चुके थे। सेमीकंडक्टर, दवा, दूरसंचार और ऊर्जा जैसी आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता अब केवल बाजार का विषय नहीं रही थी। राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा एक दूसरे से जुड़ रही थीं।
2021 के अंत में कोरोना फिर एक नए रूप में सामने आया। ओमिक्रॉन ने दुनिया भर में चिंता बढ़ाई और भारत में भी संक्रमण को लेकर नई सावधानी शुरू हुई। लेकिन इस बार देश 2020 जैसा नहीं था। टीकाकरण अभियान व्यापक हो चुका था। जनवरी 2022 के पहले सप्ताह में भारत ने 150 करोड़ से अधिक कोरोना टीके की खुराक देने का आंकड़ा पार किया। यह आंकड़ा उस एक वर्ष की प्रशासनिक यात्रा का भी प्रतीक था जो लॉकडाउन और अस्पतालों की कमी से शुरू हुई थी। अब वही देश इतनी बड़ी संख्या में टीके लगाने की क्षमता विकसित कर चुका था। लेकिन 21वें वर्ष का अंतिम बड़ा संकट कोरोना नहीं, युद्ध था। 24 फरवरी 2022 को रूस ने यूक्रेन पर हमला शुरू किया। यूक्रेन में हजारों भारतीय छात्र और नागरिक फंसे हुए थे। भारत के सामने मानवीय संकट के साथ विदेश नीति का कठिन प्रश्न भी था। युद्धरत पक्षों के बीच अपने रणनीतिक संबंधों को संभालते हुए भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालना तत्काल प्राथमिकता बन गया। ऑपरेशन गंगा शुरू किया गया। भारत ने यूक्रेन के पड़ोसी देशों से विशेष उड़ानों के माध्यम से भारतीय नागरिकों को निकालना शुरू किया। 11 मार्च तक लगभग 22,500 भारतीय भारत लौट चुके थे और कुल 90 निकासी उड़ानें संचालित की गई थीं। इस अभियान में एक और बदलाव दिखाई दिया। संकट अब भारत की सीमाओं के भीतर नहीं था। फिर भी शासन को उसी तरह प्रतिक्रिया देनी थी जैसे कोई बड़ी आपदा देश के भीतर आई हो। विदेश मंत्रालय, नागरिक उड्डयन, वायुसेना, निजी विमानन कंपनियां और पड़ोसी देशों में भारतीय मिशन एक साथ काम कर रहे थे। 2021-22 इस तरह कोरोना के बाद सामान्य होती अर्थव्यवस्था से निकलकर बदलती वैश्विक व्यवस्था के बीच पहुंच गया था। इस वर्ष की शुरुआत महामारी से उबरते भारत ने की थी। बीच में किसान आंदोलन और कृषि कानूनों की वापसी ने लोकतांत्रिक सहमति का सवाल खड़ा किया। अर्थव्यवस्था ने तेज वापसी की। गति शक्ति ने बुनियादी ढांचे को एकीकृत तरीके से देखने का नया प्रयास किया। यूपीआई ने डिजिटल भुगतान को जनजीवन का हिस्सा बना दिया। अफगानिस्तान के घटनाक्रम ने विदेश नीति को नई चुनौती दी। क्वाड ने हिंद प्रशांत में भारत की रणनीतिक साझेदारी को नई संरचना दी। और वर्ष के अंतिम महीनों में यूक्रेन युद्ध ने भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को विदेश नीति के केंद्र में ला दिया। इन घटनाओं को अलग अलग रखने पर यह वर्ष अनेक खबरों का संग्रह लगता है। लेकिन इन्हें एक साथ रखने पर इसकी दिशा साफ दिखाई देती है। 2021-22 वह वर्ष था जिसमें संकट से निकल रहा भारत अपनी नई सामान्य व्यवस्था बनाने लगा था। 2020 में राज्य की प्राथमिकता जीवन बचाना थी। 2021 में प्राथमिकता जीवन को सामान्य बनाना और अर्थव्यवस्था को गति देना हो गई। लेकिन सामान्य स्थिति का अर्थ पुराने ढर्रे पर लौटना नहीं था। महामारी ने अर्थव्यवस्था, तकनीक और वैश्विक राजनीति के बारे में कई धारणाएं बदल दी थीं। इसलिए भारत भी अपनी आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था को नए सिरे से व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहा था। यूपीआई इस बदलाव का सबसे शांत उदाहरण था। कोई बड़ी घोषणा नहीं, कोई विशाल सरकारी समारोह नहीं। बस मोबाइल पर कुछ सेकंड में भुगतान। लेकिन उन्हीं छोटे छोटे भुगतानों ने एक ऐसी डिजिटल अर्थव्यवस्था तैयार कर दी जिसमें अप्रैल 2021 से मार्च 2022 के बीच करीब 46 अरब लेनदेन हुए। कृषि कानूनों की वापसी इसका बिल्कुल उलटा उदाहरण थी। वहां सरकार ने कानून बनाया, आंदोलन हुआ, संवाद चलता रहा और अंततः सरकार ने अपना फैसला वापस लिया। यह घटना बताती है कि लोकतांत्रिक शासन में राज्य की शक्ति केवल निर्णय लेने में नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने में भी दिखाई देती है। इसलिए 21वें वर्ष को केवल कृषि कानूनों की वापसी या केवल डिजिटल क्रांति के वर्ष के रूप में देखना उसके पूरे अर्थ को छोटा कर देगा। यह वर्ष उस भारत की तस्वीर था जो महामारी के बाद अपने लिए नई गति तलाश रहा था। सड़क और रेल की परियोजनाओं को एक साथ जोड़ने के लिए गति शक्ति थी। छोटे से छोटे भुगतान को डिजिटल बनाने के लिए यूपीआई था। उत्पादन बढ़ाने के लिए आत्मनिर्भर भारत और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन था। दुनिया के बदलते शक्ति संतुलन में अपनी जगह बनाने के लिए क्वाड था। अफगानिस्तान और यूक्रेन जैसे संकटों में अपने नागरिकों तक पहुंचने के लिए नई कूटनीतिक सक्रियता थी और इनके बीच किसान आंदोलन की वह तस्वीर थी जिसने यह याद दिलाया कि विकास का कोई भी मॉडल नागरिक की सहमति से अलग नहीं चल सकता। नरेन्द्र मोदी के शासन के 21वें वर्ष का सबसे बड़ा अर्थ शायद इसी संतुलन में है। निर्णय लेने वाली सरकार के सामने पहली बार इतने स्पष्ट रूप में यह प्रश्न था कि निर्णय के बाद सहमति कैसे बनाई जाए और असहमति के बीच रास्ता कैसे निकाला जाए। एक ओर कानून वापस लेने का फैसला था, दूसरी ओर डिजिटल भुगतान की ऐसी व्यवस्था थी जिसे नागरिकों ने स्वयं अपने व्यवहार में अपना लिया था। एक ओर किसान आंदोलन ने नीति को पीछे हटने पर मजबूर किया, दूसरी ओर यूपीआई ने बिना किसी बाध्यता के नई आर्थिक आदत पैदा कर दी। दोनों घटनाएं मिलकर लोकतांत्रिक शासन की एक मूल सच्चाई सामने रखती हैं। सरकार बदलाव की दिशा तय कर सकती है, संस्थागत ढांचा बना सकती है और संसाधन उपलब्ध करा सकती है। लेकिन किसी बदलाव की वास्तविक स्थिरता अंततः नागरिकों की स्वीकार्यता और उपयोग से तय होती है। 2021- 22 इसी स्वीकार्यता की खोज का वर्ष था। महामारी के बाद भारत केवल पुरानी अर्थव्यवस्था में वापस नहीं लौट रहा था। वह डिजिटल भुगतान, एकीकृत बुनियादी ढांचे, नए विनिर्माण आधार और बदलती विदेश नीति के साथ एक नई आर्थिक तथा रणनीतिक भूमिका की ओर बढ़ रहा था। इस यात्रा में कुछ फैसले आगे बढ़े, कुछ फैसलों पर समाज ने सवाल उठाए और कुछ फैसलों को वापस भी लेना पड़ा। 21वां वर्ष इसलिए नरेन्द्र मोदी की शासन यात्रा में केवल उपलब्धियों का वर्ष नहीं, बल्कि नीति, समाज और तकनीक के बीच नए संतुलन के उभरने का वर्ष था। फैसले लेने की शक्ति बनी रही, लेकिन 2021 ने यह भी दिखाया कि लोकतंत्र में अंतिम कसौटी केवल फैसला नहीं, उसकी स्वीकार्यता है। और उसी वर्ष यूपीआई की करोड़ों छोटी छोटी घंटियों ने यह संकेत दे दिया था कि भारत की अगली बड़ी प्रशासनिक और आर्थिक कहानी शायद सत्ता के गलियारों से कम और नागरिक के हाथ में पकड़े मोबाइल से ज्यादा लिखी जाने वाली है।




