24वां वर्ष : जनादेश ने संख्या बदली थी, दिशा नहीं

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प्रेम शंकर झा, आईआरएसएस

चार जून 2024 का दिन भारतीय राजनीति के लिए केवल चुनाव परिणाम का दिन नहीं था। उस दिन संख्या ने एक ऐसी कहानी लिखी, जिसका अर्थ अगले पांच वर्षों के शासन में खुलना था। भारतीय जनता पार्टी 240 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि 2019 में उसके पास अकेले 303 सीटें थीं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन 293 सीटों के साथ बहुमत में था और 9 जून को नरेन्द्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। 2014 और 2019 की तुलना में इस बार तस्वीर अलग थी। सरकार वही थी, नेतृत्व वही था, लेकिन संसद का गणित बदल चुका था। तेलुगु देशम पार्टी और जनता दल यूनाइटेड जैसे सहयोगी दल अब सरकार की संख्या में महत्वपूर्ण स्थान पर थे। इस बदले हुए जनादेश का पहला संदेश यही था कि तीसरे कार्यकाल में निरंतरता को सहयोग और सहमति के साथ साधना होगा। लेकिन चुनाव परिणाम की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि राजनीतिक अंकगणित बदलने के बावजूद विकास की दिशा नहीं बदली। पिछले दस वर्षों में जिस आर्थिक और प्रशासनिक ढांचे की नींव रखी गई थी, तीसरे कार्यकाल की शुरुआत उसे रोकने या पलटने से नहीं, बल्कि उसकी अगली मंजिल तलाशने से हुई।

यही वजह है कि जुलाई 2024 का पूर्ण बजट इस तीसरे कार्यकाल को समझने की पहली महत्वपूर्ण खिड़की बनता है। सरकार के सामने अब केवल अर्थव्यवस्था को तेज रखने की चुनौती नहीं थी, बल्कि उस तेज वृद्धि को रोजगार और अवसर में बदलने का सवाल अधिक स्पष्ट होकर सामने आ चुका था। पांच वर्षों में 4.1 करोड़ युवाओं को रोजगार, कौशल और अन्य अवसरों से जोड़ने के लिए दो लाख करोड़ रुपये के प्रधानमंत्री पैकेज की घोषणा हुई। शिक्षा, रोजगार और कौशल के लिए 1.48 लाख करोड़ रुपये रखे गए और एमएसएमई को रोजगार तथा उत्पादन के महत्वपूर्ण आधार के रूप में आगे किया गया। यह बदलाव केवल बजट की मदों में नहीं था। पिछले दशक में भारत ने सड़क, रेल, बंदरगाह, बिजली, डिजिटल भुगतान और बुनियादी सेवाओं का बड़ा नेटवर्क खड़ा किया था। अब स्वाभाविक अगला प्रश्न था कि इस बढ़ी हुई क्षमता का लाभ भारतीय युवाओं की आय और रोजगार में कितना दिखाई देगा। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 2023-24 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 8.2 प्रतिशत रही थी। इतनी तेज वृद्धि के बाद चुनौती वृद्धि की रफ्तार से अधिक उसकी गुणवत्ता की थी। तीसरे कार्यकाल का आर्थिक विमर्श इसी जगह अधिक रोजगार, कौशल और उत्पादकता की ओर मुड़ता दिखाई दिया। लेकिन 2024 की कहानी को केवल रोजगार के आंकड़ों से समझना भी अधूरा होगा, क्योंकि इसी वर्ष भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षा एक और स्तर पर पहुंचती दिखाई दी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब दुनिया की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक शक्ति को प्रभावित करने वाली तकनीक बन चुका था। 7 मार्च 2024 को 10,371.92 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ इंडिया एआई मिशन को मंजूरी मिली। इसका उद्देश्य केवल एआई के इस्तेमाल को बढ़ाना नहीं था, बल्कि सार्वजनिक कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा, स्वदेशी एआई मॉडल, स्टार्टअप और सुरक्षित एआई के लिए एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना था। यह उस डिजिटल यात्रा का अगला चरण था जिसकी शुरुआत सरकारी सेवाओं और डिजिटल भुगतान की पहुंच बढ़ाने से हुई थी। पहले सवाल था कि भारत डिजिटल तकनीक का उपयोग कितनी व्यापकता से कर सकता है। अब सवाल यह बन रहा था कि भारत भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों को बनाने की क्षमता कितनी विकसित कर सकता है।

इसी बदलाव को सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में और साफ देखा जा सकता है। फरवरी 2024 में तीन सेमीकंडक्टर इकाइयों को मंजूरी मिली, जिनमें गुजरात के धोलेरा में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और पीएसएमसी का फैब तथा गुजरात और असम में सेमीकंडक्टर असेंबली और टेस्टिंग से जुड़ी परियोजनाएं शामिल थीं। इन परियोजनाओं में कुल प्रस्तावित निवेश 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक था। चिप निर्माण का सवाल इसलिए बड़ा था क्योंकि आधुनिक अर्थव्यवस्था की लगभग हर महत्वपूर्ण तकनीक उसके ऊपर निर्भर है। मोबाइल फोन, कार, दूरसंचार, रक्षा उपकरण, डेटा सेंटर और एआई, सबकी रीढ़ सेमीकंडक्टर हैं। भारत लंबे समय से चिप डिजाइन की प्रतिभा के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन विनिर्माण क्षमता का अभाव उसकी बड़ी कमजोरी था। 2024 में इस अंतर को भरने की कोशिश शुरू हुई। इसका अर्थ था कि आत्मनिर्भरता की अवधारणा भी बदल रही थी। बात केवल विदेशी वस्तुओं के आयात को कम करने की नहीं थी, बल्कि उन तकनीकी श्रृंखलाओं में प्रवेश करने की थी जिनसे आने वाले दशक की आर्थिक शक्ति तय होनी थी। ऊर्जा के क्षेत्र में पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना भी इसी बदलती सोच का हिस्सा थी। फरवरी 2024 में 75,021 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ मंजूर इस योजना का लक्ष्य एक करोड़ घरों में रूफटॉप सोलर पहुंचाना था। पिछले वर्षों में बिजली की पहुंच को विकास की बुनियादी शर्त बनाया गया था। अब घर की छत को ही ऊर्जा उत्पादन की इकाई में बदलने की कोशिश थी। इससे उपभोक्ता और उत्पादक के बीच की पुरानी दूरी कुछ कम होती है। जिस घर को पहले बिजली पहुंचाने की जिम्मेदारी राज्य की थी, वही घर भविष्य में बिजली पैदा करने वाली छोटी इकाई भी बन सकता है। इस बदलाव में ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और घरेलू अर्थव्यवस्था तीनों एक साथ जुड़ते हैं।

तीसरे कार्यकाल की शुरुआत केवल अर्थव्यवस्था और तकनीक के नए सवालों से नहीं हुई। शासन के उस ढांचे को भी बदला जा रहा था जिसके माध्यम से राज्य नागरिक के साथ न्याय और कानून के स्तर पर संवाद करता है। 1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम लागू हुए और औपनिवेशिक दौर से चली आ रही भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह नई संहिताएं आईं। इनके साथ डिजिटल साक्ष्य, इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रियाओं और तकनीक के अधिक इस्तेमाल को कानूनी व्यवस्था में जगह मिली। इन कानूनों पर संसद और विशेषज्ञों के बीच बहस भी हुई और उनके विभिन्न प्रावधानों को लेकर अलग-अलग मत सामने आए, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से 2024 का महत्व इस बात में था कि न्याय व्यवस्था को भी उस डिजिटल और संस्थागत बदलाव से जोड़ा जा रहा था जो अर्थव्यवस्था और शासन के दूसरे क्षेत्रों में पहले से चल रहा था।

इसी वर्ष सामाजिक सुरक्षा की दिशा में भी विस्तार हुआ। सितंबर 2024 में आयुष्मान भारत का दायरा 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के सभी वरिष्ठ नागरिकों तक बढ़ाने का फैसला किया गया। यहां पात्रता का आधार आय से आगे बढ़कर उम्र हो गया। भारत जैसे तेजी से वृद्ध होती आबादी वाले समाज में स्वास्थ्य खर्च आने वाले वर्षों की बड़ी सामाजिक चुनौती बनने वाला है। इसलिए वरिष्ठ नागरिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा के दायरे में लाने का यह फैसला केवल एक और लाभार्थी वर्ग जोड़ने की घटना नहीं था। यह उस कल्याणकारी व्यवस्था के विस्तार का संकेत था जो पिछले वर्षों में गरीब और कमजोर परिवारों तक स्वास्थ्य सुरक्षा पहुंचाने से आगे बढ़कर व्यापक सामाजिक सुरक्षा की ओर जा रही थी। फिर इस पूरे घरेलू एजेंडे के बीच चीन का प्रश्न सामने था। 2020 के बाद पूर्वी लद्दाख में बनी सैन्य स्थिति ने भारत की सुरक्षा नीति को लंबे समय तक प्रभावित किया। 21 अक्टूबर 2024 को भारत और चीन के बीच देपसांग और डेमचोक में गश्त की व्यवस्था को लेकर समझौता हुआ और इसके बाद 2020 में बने प्रमुख friction points पर disengagement की प्रक्रिया आगे बढ़ी। 23 अक्टूबर को कजान में नरेन्द्र मोदी और शी चिनफिंग की मुलाकात हुई। इसे सीमा विवाद का अंतिम समाधान कहना सही नहीं होगा। सीमा का मूल प्रश्न अभी भी मौजूद था। लेकिन चार वर्षों की सैन्य तनातनी के बाद बातचीत और गश्त की पुरानी व्यवस्था की ओर लौटने की प्रक्रिया अपने आप में महत्वपूर्ण थी। इससे तीसरे कार्यकाल की विदेश नीति की एक विशेषता सामने आती है। भारत ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाया, रूस के साथ संबंध बनाए रखे, पश्चिम एशिया में अपने हितों को साधा और चीन के साथ भी संवाद की संभावना खुली रखी। बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की कोशिश किसी एक ध्रुव के भीतर सीमित होने की बजाय अपने लिए अधिकतम रणनीतिक विकल्प बनाए रखने की थी।

2024 का वैश्विक परिदृश्य भी इसके लिए आसान नहीं था। यूक्रेन युद्ध जारी था, पश्चिम एशिया में संघर्ष गहरा चुका था और बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही थी। ऐसे समय में भारत की विदेश नीति केवल कूटनीतिक यात्राओं की सूची नहीं रह सकती थी। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, रक्षा, प्रवासी भारतीय और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला जैसे आर्थिक हित भी उसी कूटनीति का हिस्सा बन चुके थे। भारत ने रूस के साथ अपने पुराने संबंधों को बनाए रखते हुए पश्चिम के साथ भी अपने रणनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाया। क्वाड, ब्रिक्स और जी20 जैसे मंचों पर सक्रियता इसी बहुस्तरीय कूटनीतिक दृष्टिकोण का हिस्सा रही। घरेलू राजनीति में भी 2024 का बदलाव केवल लोकसभा की संख्या तक सीमित नहीं रहा। नई संसद में सहयोगी दलों की भूमिका बढ़ी और कई महत्वपूर्ण विधेयकों को व्यापक संसदीय प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। वक्फ संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया। एक देश, एक चुनाव से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक दिसंबर में संसद में पेश हुए और उन्हें भी संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया। इससे तीसरे कार्यकाल की शासन शैली का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आया। जिस दौर में सरकार के पास अपना स्पष्ट बहुमत हो, वहां विधायी प्रक्रिया की गति और राजनीतिक बातचीत का संतुलन अलग होता है। गठबंधन आधारित बहुमत में सहयोगियों, विपक्ष और संसदीय समितियों की भूमिका स्वाभाविक रूप से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

फिर 30 दिसंबर 2024 को श्रीहरिकोटा से स्पाडेक्स मिशन रवाना हुआ। जनवरी 2025 में इसरो ने दोनों उपग्रहों की सफल डॉकिंग की पुष्टि की। अंतरिक्ष में दो उपग्रहों को जोड़ना केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है। यह भविष्य के अंतरिक्ष स्टेशन, उपग्रह सर्विसिंग और मानव अंतरिक्ष अभियानों जैसी जटिल क्षमताओं की बुनियाद से जुड़ी तकनीक है। चंद्रयान-3 के बाद भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में यह अगली तकनीकी सीढ़ी थी। इस उपलब्धि को 2024 की पूरी कहानी के संदर्भ में देखें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। देश एक साथ एआई की कंप्यूटिंग क्षमता, सेमीकंडक्टर निर्माण, स्वच्छ ऊर्जा और अंतरिक्ष तकनीक में अपनी अगली क्षमताएं तैयार कर रहा था। एक फरवरी 2025 को पेश बजट ने इस दिशा को आगे बढ़ाया। पूंजीगत व्यय के लिए 11.21 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया और कृषि, एमएसएमई, निवेश तथा निर्यात को विकास के चार प्रमुख इंजन के रूप में सामने रखा गया। पिछले वर्षों में बुनियादी ढांचे पर बढ़ा हुआ सार्वजनिक निवेश अब अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों को गति देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। यही वह बिंदु था जहां तीसरे कार्यकाल की आर्थिक कहानी को पिछले दशक से अलग पढ़ा जा सकता है। अब चुनौती केवल राज्य की बुनियादी क्षमता बढ़ाने की नहीं थी। उस क्षमता को निजी निवेश, रोजगार, निर्यात, तकनीक और घरेलू मांग में बदलना था। इस पूरे दौर को केवल चुनाव परिणाम से जोड़कर देखना इसलिए पर्याप्त नहीं है कि 2024 में बदला हुआ जनादेश अपने साथ एक बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति जरूर लाया, लेकिन उसने विकास की दिशा को पलटा नहीं। भाजपा के पास अकेले बहुमत नहीं था, मगर गठबंधन के पास बहुमत था। सरकार को सहयोगियों के साथ चलना था, लेकिन उसके सामने वही बड़े आर्थिक और सामाजिक प्रश्न थे जिनकी जमीन पिछले दस वर्षों में तैयार हो चुकी थी। फर्क यह था कि अब हर बड़े लक्ष्य की परीक्षा ज्यादा जटिल परिस्थितियों में होनी थी। 24वां वर्ष इसी संक्रमण का वर्ष था। राजनीतिक रूप से यह बहुमत से गठबंधन की ओर लौटने का वर्ष था। आर्थिक रूप से यह बुनियादी ढांचे से रोजगार और उत्पादन की ओर बढ़ने का वर्ष था। तकनीकी रूप से यह डिजिटल सार्वजनिक ढांचे से एआई, सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष जैसी उच्च क्षमता वाली अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने का वर्ष था। विदेश नीति में यह चीन के साथ तनाव के बीच संवाद, रूस के साथ संबंध और पश्चिम के साथ रणनीतिक साझेदारी को एक साथ साधने का वर्ष था। सामाजिक नीति में यह कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार को नए आयु वर्गों और नई जरूरतों तक ले जाने का वर्ष था। इसलिए 2024 को केवल 240 सीटों की कहानी मानना शायद सबसे आसान व्याख्या होगी, लेकिन सबसे गहरी नहीं। उस वर्ष की वास्तविक कहानी यह थी कि राजनीतिक संख्या बदलने के बावजूद शासन के सामने मौजूद भारत नहीं बदला था। उसकी आकांक्षाएं बड़ी थीं, उसकी अर्थव्यवस्था अधिक जटिल थी, उसकी युवा आबादी रोजगार चाहती थी, उद्योग नई तकनीक चाहता था, सीमाओं पर सुरक्षा की जरूरत बनी हुई थी और दुनिया भारत को पहले की तुलना में अधिक गंभीरता से देख रही थी।

नरेन्द्र मोदी का तीसरा कार्यकाल इसी बदले हुए समीकरण में शुरू हुआ। पहले दो कार्यकालों में जिस राज्य क्षमता और बुनियादी ढांचे का निर्माण हुआ, तीसरे कार्यकाल में उसकी उत्पादकता और गहराई की परीक्षा शुरू हुई। अब प्रश्न केवल यह नहीं था कि सरकार कितनी तेजी से निर्णय ले सकती है। प्रश्न यह था कि वह बदलती संसद, बदलती तकनीक और बदलती विश्व व्यवस्था के बीच उन निर्णयों को कितनी दूर तक परिणाम में बदल सकती है। जनादेश ने संख्या बदली थी, दिशा नहीं। लेकिन उस दिशा पर चलने की शर्तें जरूर बदल गई थीं। यही नरेन्द्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की पहली और सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कसौटी थी।

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