प्रेम शंकर झा, आईआरएसएस
सात जनवरी 2022 की सुबह भारत ने कोविड टीकाकरण की 150 करोड़ खुराक पूरी कर ली थीं। उसी समय देश कोरोना की तीसरी लहर से गुजर रहा था। संक्रमण फिर बढ़ रहा था, लेकिन इस बार भय का स्वरूप पहले जैसा नहीं था। अस्पतालों के बाहर वैसी लंबी कतारें नहीं थीं, अर्थव्यवस्था को फिर से बंद करने की मजबूरी नहीं थी और देश के पास महामारी से लड़ने का अनुभव भी था। दो वर्ष पहले जिस संकट ने शासन की बुनियादी क्षमताओं को अचानक कठघरे में खड़ा कर दिया था, 2022 में भारत उसी संकट से निकली सीख के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा था। इसलिए 2022 को केवल कोरोना के बाद सामान्य स्थिति लौटने का वर्ष मानना उसके महत्व को छोटा करना होगा। असली बात यह थी कि संकट के दो वर्षों ने सरकार के सामने विकास का सवाल बदल दिया था। अब केवल यह पर्याप्त नहीं था कि अर्थव्यवस्था फिर चल पड़े। सवाल यह था कि अगली गति किस आधार पर आएगी और दुनिया जिस तेजी से बदल रही है, उसमें भारत अपनी जगह किस तरह बनाएगा। फरवरी के बजट ने इस बदलाव की पहली स्पष्ट झलक दी। सरकार ने तत्काल खपत बढ़ाने की जगह पूंजीगत व्यय को विकास की धुरी बनाया। केंद्र का पूंजीगत व्यय 7.5 लाख करोड़ रुपये रखा गया और राज्यों के लिए एक लाख करोड़ रुपये के ब्याज मुक्त ऋण की व्यवस्था की गई, ताकि वे भी बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ा सकें। उसी बजट में डिजिटल रुपये की घोषणा हुई।
यहां 2022 का भारत अपने पिछले वर्षों के भारत से थोड़ा अलग दिखाई देता है। विकास का अर्थ अब केवल अधिक योजनाएं चलाना नहीं था। सड़क, रेल, बंदरगाह, डिजिटल नेटवर्क, विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स जैसे वे ढांचे महत्वपूर्ण हो रहे थे जो अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक गति दे सकते हैं। महामारी ने आपूर्ति व्यवस्था की कमजोरियां सामने ला दी थीं और सरकार की आर्थिक सोच में यह बात अधिक स्पष्ट हो गई थी कि मजबूत अर्थव्यवस्था केवल मांग से नहीं बनती, उसके पीछे मजबूत उत्पादन और परिवहन व्यवस्था भी चाहिए, तभी दुनिया ने करवट बदली। 24 फरवरी को रूस ने यूक्रेन पर हमला किया। कोरोना के बाद आर्थिक पुनरुद्धार की जिस कहानी की शुरुआत हुई थी, उसमें युद्ध ने ऊर्जा, खाद्य और उर्वरक संकट का नया अध्याय जोड़ दिया। तेल की कीमतों ने भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश के सामने कठिन सवाल खड़े किए। महंगाई पर दबाव बढ़ा और रिजर्व बैंक को ब्याज दरों में वृद्धि का रास्ता अपनाना पड़ा। लेकिन युद्ध का असर केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं था। यह भारत की विदेश नीति की भी परीक्षा थी। पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत ने रूसी तेल खरीदना जारी रखा। साल के दौरान रूसी कच्चे तेल की भारत की खरीद में तेज वृद्धि हुई। भारत का तर्क अपनी ऊर्जा जरूरतों और उपभोक्ताओं के हितों से जुड़ा था। साथ ही अमेरिका और यूरोप के साथ भारत के रणनीतिक संबंध भी चलते रहे। क्वाड में भागीदारी जारी रही और हिंद प्रशांत में भारत की भूमिका बनी रही।
2022 में भारत की विदेश नीति को समझने का शायद यही सबसे महत्वपूर्ण बिंदु था। दुनिया तेजी से दो खेमों में बंटती हुई दिखाई दे रही थी, लेकिन भारत अपने लिए एक ऐसी जगह तलाश रहा था जहां वह किसी एक ध्रुव का हिस्सा बने बिना अपने आर्थिक और सामरिक हितों की रक्षा कर सके। यूक्रेन युद्ध ने इस नीति को किसी भाषण से ज्यादा वास्तविक परिस्थिति में परखा। इसका सबसे मानवीय चेहरा ऑपरेशन गंगा में दिखाई दिया। यूक्रेन में फंसे भारतीय विद्यार्थियों और नागरिकों को निकालना केवल विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं थी। दूतावासों, पड़ोसी देशों, विमानन व्यवस्था और प्रशासन के कई हिस्सों को एक साथ काम करना पड़ा। युद्ध ने दिखाया कि विदेश नीति और घरेलू प्रशासन अब एक दूसरे से अलग क्षेत्र नहीं रह गए हैं। इसी दौरान भारत के भीतर एक और बदलाव आकार ले रहा था। महामारी के दौरान दुनिया ने चिप की कमी से लेकर दवाओं और उपकरणों की आपूर्ति तक में व्यवधान देखा था। अचानक यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया कि किसी देश की आर्थिक सुरक्षा केवल उसके बाजार के आकार से तय होगी या इस बात से भी कि वह जरूरी चीजें खुद कितनी बना सकता है। यहीं से आत्मनिर्भरता का अर्थ बदलता दिखाई देता है। मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर सेमीकंडक्टर तक घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की कोशिश तेज हुई। 76 हजार करोड़ रुपये के सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम ने भारत की औद्योगिक महत्वाकांक्षा को उस क्षेत्र तक पहुंचाया जिसे आधुनिक अर्थव्यवस्था की बुनियादी तकनीक माना जाता है। यह ऐसा क्षेत्र था जिसमें तत्काल परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। असली लक्ष्य आने वाले वर्षों में उत्पादन, डिजाइन और आपूर्ति श्रृंखला की क्षमता खड़ी करना था।
इस बदलाव को समझने के लिए सितंबर का एक और निर्णय महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति शुरू की गई। भारत में सामान बनाना एक समस्या थी तो उसे देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से और फिर बंदरगाह तक पहुंचाना दूसरी। अलग-अलग परिवहन प्रणालियों और सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। नीति का उद्देश्य लॉजिस्टिक्स की लागत और समय कम करना तथा विभिन्न प्रणालियों को एक साझा ढांचे में लाना था। यह कोई चमकदार घोषणा नहीं थी। आम नागरिक के लिए इसकी खबर भी उतनी आकर्षक नहीं थी जितनी किसी नई योजना की होती है। लेकिन किसी देश की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में ऐसे ही फैसले दूर तक असर डालते हैं। कारखाना लगाना एक बात है, उसके उत्पाद को समय पर बाजार तक पहुंचाना दूसरी। भारत अगर विनिर्माण का बड़ा केंद्र बनना चाहता था तो सड़क और रेल के साथ उसकी लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को भी उसी गति से बदलना जरूरी था। 2022 में विकास की बहस इसलिए धीरे-धीरे एक नए स्तर पर पहुंच रही थी। सवाल यह नहीं रह गया था कि सरकार क्या बांट रही है। सवाल यह बनने लगा था कि सरकार ऐसी कौन सी व्यवस्था बना रही है जिससे उत्पादन बढ़े, निवेश आए, रोजगार बने और भारतीय वस्तुएं दुनिया के बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें। सितंबर में भारत के ब्रिटेन को पीछे छोड़कर नाममात्र जीडीपी के आधार पर दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की खबर इसी बदलते आर्थिक आकार का प्रतीक बनी। लेकिन इस उपलब्धि के साथ एक जरूरी सावधानी भी थी। सकल घरेलू उत्पाद का आकार नागरिक की व्यक्तिगत समृद्धि का पूरा माप नहीं होता। भारत की प्रति व्यक्ति आय अभी विकसित देशों से काफी पीछे थी। इसलिए पांचवीं अर्थव्यवस्था का दर्जा मंजिल नहीं था। वह इस बात का संकेत था कि अब भारत से अपेक्षाएं भी बड़ी होंगी। इसी समय तकनीक ने विकास की दूसरी तस्वीर खींचनी शुरू कर दी।
एक अक्टूबर को भारत में 5जी सेवाओं की शुरुआत हुई। डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में यूपीआई पहले ही रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधि बदल चुका था। अब तेज दूरसंचार के साथ स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, उद्योग और शहरी सेवाओं में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल की नई संभावनाएं खुल रही थीं। अक्टूबर में भारतीय रिजर्व बैंक ने डिजिटल रुपये पर अपना कॉन्सेप्ट नोट जारी किया और नवंबर में थोक क्षेत्र के लिए डिजिटल रुपये का पायलट शुरू हुआ। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं था। पिछले दशक में भारत ने जिस डिजिटल सार्वजनिक ढांचे को खड़ा किया था, 2022 में उसके ऊपर अगली मंजिलें बनती दिखाई देने लगीं। पहचान से बैंक खाते तक, बैंक खाते से डिजिटल भुगतान तक और डिजिटल भुगतान से डिजिटल मुद्रा तक की यात्रा ने राज्य और नागरिक के बीच लेनदेन के तरीके को बदलने की एक लंबी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। लेकिन किसी भी शासन की कहानी केवल सड़क, तकनीक और पूंजी से नहीं बनती। समाज की प्रतिक्रिया भी उसकी दिशा तय करती है। जून 2022 में अग्निपथ योजना सामने आई। सेना में चार वर्ष की अवधि के लिए अग्निवीरों की भर्ती की नई व्यवस्था ने सैन्य मानव संसाधन को बदलने का प्रयास किया। योजना के पीछे सरकार की अपनी प्रशासनिक और वित्तीय दलीलें थीं, लेकिन देश के कई हिस्सों में युवाओं का विरोध भी हुआ। सरकार ने बाद में आयु सीमा में एक बार की छूट और अन्य क्षेत्रों में अवसरों से संबंधित घोषणाएं कीं। अग्निपथ उस वर्ष की एक महत्वपूर्ण याद दिलाता है। नीति की गुणवत्ता का प्रश्न अपनी जगह है, लेकिन कोई भी बड़ा बदलाव समाज से बाहर रहकर लागू नहीं होता। सरकार के लिए सुधार का अर्थ केवल फैसला करना नहीं, बल्कि उस फैसले को लोगों के बीच स्वीकार्य बनाने की प्रक्रिया भी है। 2022 में यह बात उतनी ही स्पष्ट हुई जितनी आर्थिक और तकनीकी बदलावों की दिशा। इसी वर्ष देश ने एक अलग तरह की ऐतिहासिक तस्वीर भी देखी। 25 जुलाई को द्रौपदी मुर्मु ने भारत की राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में एक आदिवासी महिला का देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचना भारतीय लोकतंत्र के सामाजिक विस्तार की एक महत्वपूर्ण घटना थी। अगस्त में आजादी के 75 वर्ष पूरे हुए। हर घर तिरंगा अभियान ने स्वतंत्रता दिवस को सरकारी समारोहों से बाहर निकालकर सामान्य नागरिक के घर तक पहुंचाने की कोशिश की। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण था उस समय उभरता हुआ नया समय बोध। 1947 से 2022 तक की यात्रा का मूल्यांकन करते हुए शासन की भाषा अब 2047 की ओर मुड़ रही थी।
यही वह बिंदु था जहां 2022 की आर्थिक, तकनीकी और प्रशासनिक पहलों को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। भारत के सामने अब केवल अगले पांच वर्ष की वृद्धि का प्रश्न नहीं था। सवाल यह था कि स्वतंत्रता की शताब्दी तक वह किस तरह की अर्थव्यवस्था, किस तरह की तकनीकी क्षमता और किस तरह का समाज बनाना चाहता है। वर्ष का अंतिम महीना इस बदलते आत्मबोध को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले आया। एक दिसंबर 2022 को भारत ने जी20 की अध्यक्षता संभाली। यह उस समय हुआ जब दुनिया रूस यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा संकट, महंगाई, खाद्य सुरक्षा और कमजोर होती वैश्विक आर्थिक वृद्धि जैसी कई परस्पर जुड़ी समस्याओं से जूझ रही थी। जी20 दुनिया की लगभग 85 प्रतिशत जीडीपी और 75 प्रतिशत से अधिक वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है। भारत की अध्यक्षता ऐसे समय शुरू हुई जब वैश्विक अर्थव्यवस्था को केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि सहयोग की नई भाषा की भी जरूरत थी। यहां 2022 की कहानी एक दिलचस्प बिंदु पर आकर ठहरती है। साल की शुरुआत में भारत अपने नागरिकों को महामारी से बचाने की क्षमता साबित कर रहा था। साल के अंत में वही भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के सबसे महत्वपूर्ण मंच की अध्यक्षता कर रहा था। दोनों घटनाओं के बीच कोई सीधी रेखा नहीं थी। इनके बीच आर्थिक पुनरुद्धार था, युद्ध था, महंगाई थी, ऊर्जा की चिंता थी, औद्योगिक नीति थी, तकनीकी बदलाव था और बदलती विदेश नीति थी। लेकिन इन्हें जोड़ने वाली एक बात जरूर थी। भारत अपने लिए केवल विकास की गति नहीं, विकास की क्षमता तैयार करने की कोशिश कर रहा था। यही 2022 को पिछले वर्षों से अलग करता है। पहले वर्षों में प्रशासन की बड़ी चिंता बुनियादी सुविधाओं को गांव तक पहुंचाने, बिजली और पानी की व्यवस्था सुधारने, गरीबों को योजनाओं से जोड़ने और अर्थव्यवस्था में निवेश लाने की थी। महामारी के बाद का भारत एक अलग सवाल पूछ रहा था। क्या वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का हिस्सा बन सकता है? क्या उसकी डिजिटल क्षमता दुनिया के लिए मॉडल बन सकती है? क्या वह ऊर्जा संकट के बीच अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बचा सकता है? क्या वह बढ़ती अर्थव्यवस्था को रोजगार और प्रति व्यक्ति आय में बदल सकता है? और क्या वह बदलती विश्व व्यवस्था में केवल बाजार नहीं, एक प्रभावशाली भागीदार बन सकता है? 2022 ने इन प्रश्नों के अंतिम उत्तर नहीं दिए। शायद किसी एक वर्ष से इसकी अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। लेकिन इस वर्ष ने भारत की दिशा जरूर बदल दी। महामारी से पहले भारत का विकास मुख्यतः घरेलू आकांक्षाओं की कहानी था। महामारी के बाद उसमें वैश्विक निर्भरता की समझ जुड़ गई। युद्ध ने ऊर्जा और कूटनीति को एक ही समीकरण में ला दिया। चिप की कमी ने औद्योगिक आत्मनिर्भरता का अर्थ बदल दिया। 5जी और डिजिटल रुपये ने तकनीकी महत्वाकांक्षा को नई ऊंचाई दी। पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने ने भारत के आर्थिक आकार को दुनिया के सामने रखा। और जी20 की अध्यक्षता ने उसी आर्थिक आकार को वैश्विक जिम्मेदारी के संदर्भ में खड़ा कर दिया।
इसलिए 2022 को केवल इस आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए कि उस वर्ष कौन सी योजना शुरू हुई और कौन सा आंकड़ा हासिल हुआ। उसकी असली कहानी उस बदलाव में है जिसमें भारत संकट से उबरने वाले देश से बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी जगह तय करने वाले देश की ओर बढ़ता दिखाई दिया। यह यात्रा पूरी नहीं हुई थी। बल्कि असली कठिनाई यहीं से शुरू होती थी। बड़ा आर्थिक आकार व्यापक समृद्धि में कैसे बदलेगा, तकनीकी महत्वाकांक्षा रोजगार में कैसे बदलेगी, आत्मनिर्भरता प्रतिस्पर्धी क्षमता कैसे बनेगी और वैश्विक भूमिका घरेलू विकास की जरूरतों से कैसे जुड़ेगी, आने वाले वर्षों की कसौटी यही होने वाली थी। 2022 ने कम से कम इतना स्पष्ट कर दिया था कि भारत अब केवल बीते संकट से बाहर निकलने की कोशिश नहीं कर रहा था। वह आगे की दुनिया के लिए अपने को तैयार करने की कोशिश में था और एक दिसंबर को जी20 की अध्यक्षता संभालते समय भारत के सामने यही नई स्थिति थी। महामारी ने उसे अपनी क्षमता का परीक्षण दिया था, युद्ध ने उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता की परीक्षा ली थी और अब दुनिया उसे वैश्विक आर्थिक संवाद के एक बड़े मंच पर देख रही थी। 2022 का वर्ष इसलिए किसी एक उपलब्धि का वर्ष नहीं, भारत की बदलती भूमिका का वर्ष था।




