भोपाल। राजधानी भोपाल में आज 8 अक्टूबर को व्यापारियों के एक वर्ग ने ‘नो UPI डे’ मनाने का फैसला किया है। यह विरोध UPI डिजिटल भुगतान व्यवस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि बड़े मर्चेंट लेनदेन पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR को लेकर है। हनुमानगंज-जुमेराती क्षेत्र के चावल-दाल व्यापारियों ने अन्य कारोबारियों से भी इस सांकेतिक विरोध में शामिल होने की अपील की है। व्यापारियों का कहना है कि वे लंबे समय से डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन यदि UPI के जरिए होने वाले पात्र बड़े कारोबारी लेनदेन पर शुल्क लगाया जाता है तो इसका सीधा असर व्यापारियों की लागत और मुनाफे पर पड़ सकता है।
व्यापारी संगठनों के अनुसार, UPI आज छोटे-बड़े कारोबार में भुगतान का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। ग्राहक QR कोड स्कैन करके कुछ ही सेकंड में भुगतान कर देते हैं और दुकानदारों को भी नकदी संभालने की परेशानी कम होती है। व्यापारियों का कहना है कि उन्होंने डिजिटल भुगतान को अपनाकर सरकार के कैशलेस और डिजिटल अर्थव्यवस्था के अभियान में सहयोग किया है। ऐसे में उनका तर्क है कि UPI भुगतान पर किसी भी तरह का अतिरिक्त शुल्क लगाने से पहले छोटे और मध्यम कारोबारियों की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। इसी मांग को सरकार तक पहुंचाने के लिए ‘नो UPI डे’ का आयोजन किया जा रहा है।
इस आंदोलन में खास तौर पर हनुमानगंज-जुमेराती क्षेत्र के चावल-दाल कारोबारियों की भूमिका बताई जा रही है। व्यापारियों की ओर से ग्राहकों को आज UPI के बजाय नकद भुगतान करने के लिए कहा जा सकता है। हालांकि, यह पूरे भोपाल में UPI सेवा बंद होने का आदेश नहीं है और न ही सभी दुकानदारों के लिए यह अनिवार्य है। यह संबंधित व्यापारी संगठनों की ओर से किया जा रहा सांकेतिक विरोध है। इसलिए अलग-अलग बाजारों और दुकानों पर इसका असर अलग हो सकता है।
विरोध का मुख्य मुद्दा 2,000 रुपये से अधिक के कुछ व्यक्ति से व्यापारी यानी P2M UPI लेनदेन पर प्रस्तावित MDR है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, पात्र मर्चेंट UPI लेनदेन पर सामान्य श्रेणी में 0.4 प्रतिशत MDR का प्रस्ताव रखा गया है। वहीं, 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन के लिए शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति लेनदेन बताई गई है। छोटे व्यापारियों और व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P भुगतान को प्रस्तावित MDR व्यवस्था से अलग रखने की बात कही गई है। इसी वजह से थोक कारोबारियों और अधिक मूल्य के डिजिटल लेनदेन करने वाले व्यापारियों के बीच शुल्क को लेकर ज्यादा चिंता दिखाई दे रही है।
अगर इसे आसान उदाहरण से समझें तो 10,000 रुपये के पात्र UPI मर्चेंट भुगतान पर 0.4 प्रतिशत की दर से MDR 40 रुपये बन सकता है। इसी तरह 50,000 रुपये के भुगतान पर यह राशि 200 रुपये होगी। व्यापारियों का कहना है कि थोक कारोबार में ऐसी बड़ी राशि के लेनदेन आम हैं और यदि प्रत्येक पात्र डिजिटल भुगतान पर शुल्क जुड़ता है तो महीने के अंत में यह कारोबारियों के लिए एक अतिरिक्त लागत बन सकती है। हालांकि MDR की वास्तविक वसूली, शुल्क वहन करने वाले पक्ष और इसके अंतिम प्रभाव को लेकर नियमों तथा लागू व्यवस्था को ध्यान में रखना जरूरी है।
UPI MDR को लेकर व्यापारियों का विरोध केवल भोपाल तक सीमित नहीं रहा है। मध्य प्रदेश के कई शहरों में भी व्यापारी पहले ‘नो UPI डे’ जैसे सांकेतिक विरोध के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, रतलाम, नीमच, मंदसौर और जावरा जैसे शहरों में व्यापारियों ने अलग-अलग तरीकों से प्रस्तावित शुल्क का विरोध किया था। कुछ बाजारों में दुकानों पर लगे QR कोड को काले कपड़े से ढककर विरोध जताया गया, जबकि कुछ जगह व्यापारियों ने ग्राहकों से नकद भुगतान करने की अपील की।
MDR का मुद्दा अब केवल व्यापारिक संगठनों की आपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे लेकर कानूनी और नीतिगत स्तर पर भी चर्चा हो रही है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को चुनौती दी गई है और अदालत ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक तथा NPCI से जवाब मांगा है। वहीं RBI की ओर से यह तर्क दिया गया है कि मामूली शुल्क से UPI लेनदेन पर बड़ा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। दूसरी तरफ व्यापारी संगठनों का कहना है कि कारोबारियों के लिए लगातार बढ़ती लागत के बीच नया शुल्क अतिरिक्त बोझ पैदा कर सकता है।
प्रस्तावित MDR व्यवस्था की समयसीमा को लेकर भी बदलाव की संभावना की खबरें सामने आई हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में कहा गया है कि पहले नई व्यवस्था को 15 अक्टूबर 2026 से लागू करने की बात थी, लेकिन इसे 1 जनवरी 2027 तक टाले जाने की संभावना जताई गई है। हालांकि अंतिम निर्णय की स्थिति को देखते हुए तारीख से संबंधित जानकारी प्रकाशित करते समय नवीनतम आधिकारिक स्थिति की पुष्टि करना जरूरी होगा। व्यापारियों का कहना है कि जब तक शुल्क व्यवस्था को लेकर उनकी चिंताओं पर स्पष्ट समाधान नहीं मिलता, तब तक वे अपने स्तर पर विरोध दर्ज कराते रहेंगे।
व्यापारी संगठनों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि उनका आंदोलन UPI या डिजिटल भुगतान व्यवस्था को खत्म करने के लिए नहीं है। उनका कहना है कि डिजिटल पेमेंट अब व्यापार का अभिन्न हिस्सा बन चुका है और ग्राहक भी इसकी सुविधा के आदी हो चुके हैं। उनका विरोध केवल उस शुल्क व्यवस्था से है, जिससे उन्हें लगता है कि बड़े डिजिटल कारोबारी भुगतान की लागत बढ़ सकती है। व्यापारी चाहते हैं कि सरकार, RBI और संबंधित संस्थाएं शुल्क लागू करने से पहले छोटे एवं मध्यम कारोबारियों की आर्थिक स्थिति और कम मार्जिन वाले कारोबार की वास्तविकताओं पर विचार करें।
भोपाल में 8 अक्टूबर का ‘नो UPI डे’ इसी मांग को प्रमुखता से सामने रखने का प्रयास है। व्यापारियों के लिए यह एक तरह का संदेश अभियान है, जिसके जरिए वे सरकार को बताना चाहते हैं कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने में बाजार की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अब व्यापारियों की मांग है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए ऐसी शुल्क नीति बनाई जाए, जिसका बोझ छोटे और मध्यम कारोबारियों पर अनावश्यक रूप से न पड़े। इस सांकेतिक विरोध के दौरान ग्राहकों को भी खरीदारी से पहले भुगतान के उपलब्ध विकल्पों की जानकारी रखनी होगी, क्योंकि कुछ बाजारों में UPI स्वीकार नहीं किया जा सकता है।




