संयुक्त राष्ट्र में भारत ने 18 सितंबर 2025 को अपने बयान में स्पष्ट कहा कि पाकिस्तान-आधारित प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) अफगानिस्तान की धरती का दुरुपयोग कर क्षेत्रीय अस्थिरता और सीमा-पार आतंकवाद को बढ़ावा दे सकते हैं। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि ऐसे संगठनों और उनके सहयोगियों के खिलाफ ठोस और समन्वित कार्रवाई की जाए, ताकि अफगानिस्तान किसी भी रूप में आतंक का अड्डा न बने।
भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र में यह भी कहा कि सिर्फ कूटनीतिक बयान या सामान्य चेतावनी पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि व्यावहारिक कदम उठाना ज़रूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इन संगठनों को रोकने में ढिलाई बरती गई तो इसका असर पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर पड़ेगा। भारत का मानना है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसके लिए वैश्विक स्तर पर मिलकर प्रयास करने होंगे।
अफगानिस्तान की मौजूदा परिस्थितियों का जिक्र करते हुए भारत ने कहा कि वहां सुरक्षा-खामियों और राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर आतंकवादी संगठन सक्रिय हो सकते हैं। इसीलिए ज़रूरी है कि प्रतिबंधित समूहों और उनके वित्तीय नेटवर्क पर नजर रखी जाए, खुफिया जानकारी साझा की जाए और संयुक्त रूप से कार्रवाई की जाए। भारत ने यह भी कहा कि ऐसे समूह अक्सर नए नाम या फ्रंट-ऑर्गनाइजेशन बनाकर सक्रिय रहते हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को उनकी गतिविधियों पर सतत निगरानी रखनी चाहिए।
भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि अफगानिस्तान से जुड़ी रणनीति केवल दंडात्मक उपायों पर आधारित नहीं होनी चाहिए। मानवीय सहायता, नागरिकों की भलाई और विकास के प्रयासों पर भी ध्यान देना होगा, ताकि आम अफगान जनता को स्थिरता और रोज़गार के अवसर मिलें। भारत ने अपने पिछले सहयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि वह अफगान नागरिकों को खाद्य, दवाइयाँ और आवश्यक सामग्री प्रदान करता रहा है और आगे भी मानवीय सहायता देता रहेगा।
इस दौरान भारत ने याद दिलाया कि हाल ही में उसने संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक प्रस्ताव पर ‘अनुपस्थित मतदान’ (abstain) किया था और इसके पीछे कारण था कि केवल सामान्य प्रस्ताव पारित करने से समस्या हल नहीं होगी। जब तक आतंक-समर्थन रोकने और प्रतिबंधित समूहों पर निगरानी रखने के लिए ठोस तंत्र नहीं बनेगा, तब तक स्थायी समाधान संभव नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह अपील दक्षिण एशिया की सुरक्षा परिदृश्य को लेकर गंभीर चिंताओं को दर्शाती है। क्षेत्रीय सहयोग, वित्तीय नेटवर्क पर रोक, साझा खुफिया साझेदारी और मानवीय सहायता — ये सभी कदम मिलकर ही असरदार साबित हो सकते हैं। हालांकि चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं, क्योंकि अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिति, पड़ोसी देशों का रुख और अंतरराष्ट्रीय सहमति पर ही किसी भी योजना की सफलता निर्भर करेगी।
भारत का यह संतुलित रुख इस बात का संकेत है कि वह अफगानिस्तान के मुद्दे को केवल सुरक्षा-चिंताओं तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि विकास और मानवीय दृष्टिकोण को भी साथ लेकर चलना चाहता है। परंतु इसके साथ ही उसने यह संदेश भी स्पष्ट कर दिया है कि लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों को किसी भी हाल में छूट नहीं दी जा सकती और उनके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई अनिवार्य है।




