बिहार विधानसभा चुनाव: कांग्रेस और सहयोगी दलों के बीच सीटों पर सहमति की तलाश, दिल्ली में होगी अंतिम चर्चा

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर महागठबंधन (इंडिया गठबंधन) के भीतर सीट बंटवारे की गहमागहमी लगातार जारी है। इस बीच कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली में एक अहम बैठक आयोजित की, जिसमें यह फैसला लिया गया कि प्रत्याशियों के चयन की अंतिम जिम्मेदारी पार्टी के आलाकमान के हाथों में होगी। प्रदेश कांग्रेस की चुनाव समिति ने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास किया कि विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों के नाम उच्च नेतृत्व तय करेगा। इसके तहत सभी संभावित उम्मीदवारों की सूची और उनकी फाइलें दिल्ली भेज दी गई हैं। प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया स्क्रीनिंग कमेटी के माध्यम से पूरी होगी, जिसमें प्रत्येक सीट पर कम से कम तीन नामों पर विचार किया जाएगा और फिर अंतिम मुहर आलाकमान लगाएगा।

महागठबंधन के भीतर सीट बंटवारे की बातचीत अभी पूरी तरह से अंतिम रूप नहीं ले पाई है। आरजेडी और अन्य सहयोगी दल कांग्रेस से उम्मीद कर रहे हैं कि उसकी दावेदारी पिछले चुनावी प्रदर्शन, जनाधार और गठबंधन में योगदान के हिसाब से होनी चाहिए। दूसरी ओर कांग्रेस का मानना है कि समय बर्बाद करने से चुनावी तैयारी प्रभावित हो सकती है, इसलिए उम्मीदवारों का चयन प्रक्रिया में तेजी लाई जा रही है। पार्टी ने यह स्पष्ट किया है कि सीटों को लेकर सहमति बनने के बाद ही इन नामों की घोषणा की जाएगी, लेकिन रणनीतिक स्तर पर देरी से बचने के लिए तैयारी दिल्ली से ही शुरू कर दी गई है।

सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर विस्तृत चर्चा होगी और राहुल गांधी समेत पार्टी का शीर्ष नेतृत्व प्रत्याशियों पर अंतिम फैसला लेगा। इसके बाद 24 सितंबर को पटना में प्रस्तावित कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक में सीट बंटवारे और चुनावी रणनीति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। पार्टी इस कोशिश में है कि गठबंधन की राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखे और सीटों की संख्या को लेकर अपनी दावेदारी भी स्पष्ट कर सके।

कुल मिलाकर, बिहार चुनाव की तैयारियों में कांग्रेस ने अब आलाकमान की भूमिका को प्राथमिकता दी है। यह कदम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि गठबंधन में सीटों को लेकर खींचतान बनी हुई है। कांग्रेस का लक्ष्य है कि समय रहते अपने प्रत्याशियों का चयन पूरा करे, ताकि महागठबंधन की राजनीति में संतुलन भी कायम रहे और संगठनात्मक मजबूती के साथ चुनावी जमीनी तैयारी भी तेज हो सके।

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