तमिलनाडु के करूर जिले के वीलुसवमपुरम में 27 सितंबर को हुई भीषण भगदड़ ने पूरे राज्य को हिला दिया है। इस हादसे में अब तक 41 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि कई अन्य घायल हैं। घटना उस समय घटी जब एक राजनीतिक रैली में भीड़ बेकाबू हो गई। रैली में मुख्य अतिथि का काफिला देर से पहुँचा, जिसके चलते लोग आगे की ओर धकेलते हुए बढ़ने लगे। अचानक से दबाव इतना बढ़ गया कि कई लोग गिर पड़े और उनके ऊपर दर्जनों लोग चढ़ गए। देखते ही देखते वहां अफरा-तफरी मच गई और भारी संख्या में लोग दबने लगे।
हादसे के बाद मौके पर हड़कंप मच गया और लोग चीख-पुकार करते हुए एक-दूसरे को बचाने में जुट गए। स्थानीय प्रशासन और बचाव दल तुरंत हरकत में आए। घायलों को नजदीकी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में भर्ती कराया गया। लेकिन रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान यह भी सामने आया कि कई एंबुलेंस भीड़ और बंद रास्तों की वजह से समय पर मौके तक नहीं पहुँच पाईं। इसी वजह से पुलिस ने मौके पर मौजूद सरकारी और निजी एंबुलेंस चालकों से पूछताछ की है, ताकि यह समझा जा सके कि हादसे के समय किस तरह की बाधाएं आईं और रेस्क्यू में देरी क्यों हुई।
इस पूरे मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाया है और एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि इतनी बड़ी घटना में जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। वहीं, पुलिस और प्रशासन भी फॉरेंसिक रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर जांच को आगे बढ़ा रहे हैं। राज्य सरकार ने मृतकों के परिवारों को मुआवजा देने और घायलों के इलाज का पूरा खर्च उठाने की घोषणा की है।
इस दर्दनाक घटना ने राजनीतिक माहौल को भी गरमा दिया है। विपक्षी दलों ने आयोजकों और प्रशासन की लापरवाही पर सवाल उठाए हैं और न्यायिक जांच की मांग की है। वहीं, सामाजिक संगठनों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने प्रभावित परिवारों और बच्चों को दीर्घकालिक परामर्श और मदद की आवश्यकता पर जोर दिया है।
वीलुसवमपुरम की यह त्रासदी सिर्फ एक हादसा नहीं बल्कि सुरक्षा इंतजामों और भीड़ प्रबंधन की गंभीर विफलता का उदाहरण बन गई है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जांच में क्या निष्कर्ष निकलते हैं और दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है।




