चीन ने तिब्बत में मिसाइल बेस का बड़ा विस्तार किया, सैटेलाइट इमेज से खुलासा

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धर्मशाला: हाल ही में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषकों की रिपोर्टों से यह खुलासा हुआ है कि चीन ने तिब्बत क्षेत्र में अपने मिसाइल बेस का बड़े पैमाने पर विस्तार किया है। विशेष रूप से छिंगहाई प्रांत के गोलमुख इलाके में स्थित एक विशाल सैन्य परिसर में नए लॉन्च पैड, बड़े वाहन शेड और कई नई इमारतें देखी गई हैं, जिनका इस्तेमाल मोबाइल मिसाइल सिस्टम के लिए किया जा सकता है। सैटेलाइट तस्वीरों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि परिसर के भीतर कई बड़े-हॉल (हाई-बे गैराज), ठोस कंक्रीट प्लेटफॉर्म, लंबी सड़कें और गोला-बारूद भंडारण जैसी सुविधाएं बनाई गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा ढांचा चीन की रोड-मोबाइल मिसाइल ब्रिगेड की तैनाती के लिए तैयार किया जा रहा है, जिससे उसकी मिसाइल क्षमता और गतिशीलता दोनों में बढ़ोतरी होगी।

रक्षा विशेषज्ञों का अनुमान है कि गोलमुख क्षेत्र का यह नया मिसाइल बेस 24 से 36 मिसाइल लॉन्चरों को समायोजित कर सकता है, हालांकि इस संख्या की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है। चीन ने हाल के महीनों में तिब्बती पठार के अन्य हिस्सों में भी तेज़ी से सैन्य निर्माण कार्य किए हैं। पांगोंग झील के पास भी नए एयर-डिफेंस सिस्टम और रडार स्थलों के निर्माण की जानकारी सामने आई है, जिनमें कई संरचनाएं मिसाइल तैनाती के लिए तैयार दिखती हैं। इन निर्माण गतिविधियों से यह संकेत मिलता है कि चीन अपने उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में दीर्घ-श्रेणी की मिसाइलों और रक्षा प्रणालियों को मजबूत कर रहा है ताकि दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम दिशा में अपनी सैन्य प्रतिक्रिया क्षमता को बढ़ा सके।

विशेषज्ञों के अनुसार, चीन की यह रणनीति न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर सकती है, बल्कि इससे भारत सहित कई पड़ोसी देशों की सुरक्षा चिंताएं भी बढ़ गई हैं। तिब्बत में तैनात मिसाइल सिस्टम की संभावित रेंज भारत के कई रणनीतिक ठिकानों तक पहुँच सकती है, जो भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। रिपोर्टों के अनुसार, भारत की ओर से भी इस क्षेत्र में चीनी गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और रक्षा नीति स्तर पर रणनीतिक समीक्षाएं जारी हैं।

इन निर्माणों का असर केवल सुरक्षा दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी पड़ सकता है। तिब्बती पठार की भौगोलिक स्थिति अत्यंत संवेदनशील है, जहाँ बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य और सड़क नेटवर्क का विस्तार प्राकृतिक संतुलन के लिए खतरा बन सकता है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ऐसे प्रोजेक्ट्स से हिमनदों (glaciers), जलस्रोतों और पारिस्थितिक प्रणाली पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है, जिससे पूरे दक्षिण एशिया की जलवायु पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है।

हालांकि चीन ने इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है और न ही उसने इन सैटेलाइट इमेजों की पुष्टि की है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया और स्वतंत्र विश्लेषकों का मानना है कि ये निर्माण कार्य चीन की दीर्घकालिक सैन्य रणनीति का हिस्सा हैं। उनका उद्देश्य न केवल अपनी रक्षा क्षमता को मजबूत करना है बल्कि क्षेत्र में शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में करना भी है। वर्तमान स्थिति में यह स्पष्ट है कि तिब्बत क्षेत्र में हो रहे यह सैन्य विस्तार एशिया के रणनीतिक समीकरणों को और अधिक जटिल बना सकता है तथा भारत-चीन सीमा क्षेत्र में तनाव को नई दिशा दे सकता है।

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