शुगर इंडस्ट्री को राहत मिल सकती है, सरकार निर्यात नीति में ढील देने की तैयारी में

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केंद्र सरकार आगामी विपणन वर्ष 2025–26 के लिए चीनी निर्यात की अनुमति देने पर गंभीरता से विचार कर रही है। दरअसल, इस वर्ष इथेनॉल उत्पादन के लिए अपेक्षित मात्रा से कम चीनी डायवर्ट होने के कारण घरेलू स्तर पर चीनी का भंडार सामान्य से अधिक हो गया है। उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, 2024–25 सीजन में लगभग 3.4 मिलियन टन चीनी इथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल की गई, जबकि सरकार का लक्ष्य करीब 4.5 मिलियन टन का था। इस कमी के चलते घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ी है, जिससे कीमतों में गिरावट की आशंका जताई जा रही है।

भारतीय चीनी मिल संघ (ISMA) और अन्य औद्योगिक निकायों ने सरकार से मांग की है कि या तो चीनी आधारित इथेनॉल के उत्पादन को बढ़ाने के लिए अतिरिक्त कोटा दिया जाए या फिर निर्यात की अनुमति दी जाए। इन संगठनों का कहना है कि यदि अतिशेष चीनी का समाधान जल्द नहीं हुआ तो चीनी मिलों को नकदी संकट का सामना करना पड़ सकता है, जिससे गन्ना किसानों के भुगतान पर भी असर पड़ेगा। उद्योग का यह भी कहना है कि इस वर्ष सरकार ने अनाज आधारित इथेनॉल को प्राथमिकता दी, जिसके चलते गन्ना आधारित इथेनॉल उत्पादन सीमित रह गया।

जानकारी के अनुसार, सरकार अब सीमित मात्रा में चीनी निर्यात की अनुमति देने पर विचार कर रही है ताकि घरेलू बाजार में संतुलन बना रहे और मिलों की वित्तीय स्थिति में सुधार हो। अनुमान है कि इस वर्ष देश में करीब 34 मिलियन टन चीनी का उत्पादन होगा, जबकि घरेलू खपत लगभग 29 मिलियन टन के आसपास रहने की संभावना है। इस स्थिति में लगभग 5 मिलियन टन चीनी अधिशेष रह सकती है, जो निर्यात के लिए पर्याप्त है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार नियंत्रित तरीके से निर्यात की मंजूरी देती है, तो इससे न केवल किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित हो सकेगा, बल्कि बाजार में स्थिरता भी बनी रहेगी। वहीं, सरकार की “इथेनॉल ब्लेंडिंग मिशन” (E20) योजना पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि इथेनॉल उत्पादन में गिरावट से पेट्रोल में मिलाए जाने वाले मिश्रण की उपलब्धता सीमित हो सकती है।

कुल मिलाकर, चीनी उद्योग एक बार फिर नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता में है। सरकार का आगामी निर्णय यह तय करेगा कि घरेलू कीमतों, किसानों के हितों और ऊर्जा नीति के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।

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