‘दो मुख्यमंत्री, तीन टिकट’: बिहार में कायस्थ बिरादरी की सियासी ताकत हुई कमज़ोर

SHARE:

बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार कायस्थ समाज के भीतर गहरी नाराज़गी देखने को मिल रही है। यह वही बिरादरी है जिसने राज्य को दो मुख्यमंत्री दिए—लेकिन इस चुनाव में प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस समुदाय को केवल तीन टिकट देकर उसके प्रभाव को गौण कर दिया है। खासकर भाजपा, जिसे परंपरागत रूप से कायस्थों का समर्थन मिलता रहा है, उसने अपने तीन मौजूदा कायस्थ विधायकों में से केवल एक को ही फिर से टिकट दिया है। इस फैसले से समुदाय के भीतर असंतोष की लहर फैल गई है, जो राजधानी पटना समेत कई सीटों पर चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

पटना के कुम्हरार, दीघा और बांकीपुर जैसे क्षेत्रों में कायस्थ मतदाताओं की संख्या निर्णायक मानी जाती है। इन इलाकों में भाजपा की गहरी पैठ रही है, लेकिन इस बार टिकट वितरण से असंतुष्ट कायस्थ समाज ने खुलकर नाराज़गी जताई है। कुम्हरार में तो स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन भी हुए, जहाँ पार्टी पदाधिकारियों को समुदाय के लोगों ने घेरकर विरोध दर्ज कराया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह का रोष अगर व्यापक हुआ, तो इसका सीधा असर भाजपा के वोट शेयर पर पड़ सकता है, खासकर उन सीटों पर जहाँ जीत-हार का अंतर कम रहा है।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए तो कायस्थ बिहार की उन प्रभावशाली बिरादरियों में से एक है, जिसने प्रशासन, शिक्षा और राजनीति में लम्बे समय तक अहम भूमिका निभाई। मगर पिछले कुछ दशकों में सामाजिक और जातीय समीकरणों में हुए बदलावों ने इस समुदाय की सियासी पकड़ को कमजोर कर दिया है। राजनीतिक दल अब संख्याबल और गठजोड़ की रणनीति के तहत अपने प्रत्याशी तय कर रहे हैं, जिससे परंपरागत रूप से प्रभावशाली लेकिन जनसंख्या के लिहाज़ से अपेक्षाकृत छोटे वर्गों का प्रतिनिधित्व घट गया है।

भाजपा की रणनीति इस बार ऊपरी जातियों और पिछड़े वर्गों के बीच संतुलन बनाने की रही है। पार्टी ने विभिन्न समुदायों को प्रतिनिधित्व देकर एक व्यापक सामाजिक आधार बनाने की कोशिश की है। हालांकि यह संतुलन साधने की कोशिश उसके कुछ पारंपरिक वोटबैंकों, खासकर कायस्थ समाज में, असंतोष का कारण बन गया है। भाजपा का मानना है कि व्यापक जातीय समीकरणों और गठबंधनों के चलते यह असंतोष नतीजों को बहुत प्रभावित नहीं करेगा, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसका असर महसूस किया जा सकता है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि कायस्थों की नाराज़गी फिलहाल सीमित रूप में दिख रही है, लेकिन अगर इसे समुदाय के नेताओं ने संगठित रूप से आगे बढ़ाया, तो यह कुछ सीटों के नतीजे बदल सकती है। ऐसे में भाजपा और अन्य दलों के लिए चुनौती यही होगी कि वे इस परंपरागत शिक्षित और प्रभावशाली वर्ग को फिर से अपने पक्ष में करें, ताकि चुनाव में अप्रत्याशित नुकसान से बचा जा सके।

Leave a Comment