भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट किया है कि सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता देशवासियों को सस्ती, स्थिर और सुरक्षित ऊर्जा उपलब्ध कराना है। मंत्रालय के अनुसार, भारत की ऊर्जा नीति पूर्णतः राष्ट्रीय हित और घरेलू उपभोक्ता-केंद्रित दृष्टिकोण पर आधारित है। सरकार का मानना है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव और आपूर्ति जोखिमों के बीच देश को ऐसी नीतियाँ अपनानी होंगी, जो सीधे तौर पर भारतीय जनता को राहत दें और अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखें।
MEA ने रूस से ऊर्जा आपूर्ति पर उठ रहे सवालों पर भी दो-टूक रुख रखते हुए कहा कि भारत अपनी जरूरतों के अनुसार हर वह विकल्प चुनने के लिए स्वतंत्र है, जो घरेलू ईंधन बाजार को किफायती बनाए रखने में मदद करे। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी बाहरी दबाव, प्रतिबंध या राजनीतिक मतभेद के आधार पर भारत अपनी ऊर्जा रणनीति नहीं बदलेगा। भारत का उद्देश्य हमेशा से रहा है कि वह विविध और भरोसेमंद स्रोतों से तेल एवं गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करे, ताकि global volatility के बीच भी भारतीय उपभोक्ताओं और उद्योगों पर कीमतों का बोझ न बढ़े।
विदेश मंत्रालय ने यह भी याद दिलाया कि रूस के साथ भारत के संबंध वर्षों पुराने और बहुआयामी हैं—जिनमें ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और तकनीकी सहयोग प्रमुख हैं। हाल के उच्च-स्तरीय संवाद और द्विपक्षीय बैठकों ने भी इस साझेदारी को और गहरा किया है। भारत का मानना है कि इन संबंधों का उपयोग केवल रणनीतिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है। इसलिए ऊर्जा आयात के संबंध में निर्णय बाजार-आधारित होंगे और भारतीय उपभोक्ताओं के लिए लाभकारी विकल्पों को प्राथमिकता दी जाएगी।
सरकार का यह रुख ऐसे समय में सामने आया है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में रूसी कच्चे तेल की कीमतें कई बार प्रतिस्पर्धी बनी हुई हैं, जिससे भारत जैसे बड़े आयातक देशों को लागत का संतुलन साधने में मदद मिलती है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि किफायती ऊर्जा भारत की विकास दर, मुद्रास्फीति नियंत्रण और बजट प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार न सिर्फ परंपरागत स्रोतों पर निर्भर है, बल्कि नवीकरणीय ऊर्जा और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की दिशा में भी मजबूत कदम बढ़ा रही है।




