SIR प्रक्रिया में हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और EC को दिया सख्त संदेश

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सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान राज्यों में सामने आ रही बाधाओं और बूथ-लेवल अधिकारियों (BLOs) को मिल रही धमकियों पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने निर्वाचन आयोग (EC) से स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि किसी भी राज्य में BLOs को धमकाया जा रहा है, सहयोग नहीं मिल रहा है या SIR की प्रक्रिया में अड़चनें आ रही हैं, तो आयोग इन घटनाओं को तुरंत अदालत के संज्ञान में लाए। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि इस तरह की बाधाएं लगातार जारी रहीं तो वह आवश्यक आदेश पारित करने में जरा भी देर नहीं करेगी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ ने इस मुद्दे को बेहद संवेदनशील बताते हुए आयोग से उन राज्यों की पूरी जानकारी मांगी, जहाँ BLOs को धमकाने, दबाव डालने या उनके कार्य में हस्तक्षेप की शिकायतें सामने आई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता-सूची संशोधन एक संवैधानिक प्रक्रिया है और यदि इसमें किसी प्रकार की राजनीतिक या प्रशासनिक बाधा आती है तो यह न केवल चुनावी प्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती है बल्कि “अराजकता” की स्थिति भी पैदा कर सकती है। अदालत ने EC से यह भी कहा कि वह प्रत्येक ऐसी घटना का दस्तावेजी विवरण तैयार करे और आवश्यकता पड़ने पर कोर्ट को सौंपे, ताकि न्यायालय स्थिति की गंभीरता के मुताबिक दिशानिर्देश जारी कर सके।

अदालत ने राज्यों को भी कड़े शब्दों में आगाह किया और कहा कि वे BLOs पर पड़ रहे अतिरिक्त कार्यभार को कम करने के लिए तत्काल कदम उठाएँ। पीठ ने सुझाव दिया कि स्थानीय प्रशासन जरूरत के अनुसार अतिरिक्त कर्मियों की तैनाती करे, BLOs के कार्य-घंटों को संतुलित करे और जिन अधिकारियों के पास अधिक जिम्मेदारियाँ हैं, उन्हें उचित राहत दे। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि SIR जैसी प्रक्रिया तभी निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से पूरी हो सकती है, जब राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन निर्वाचन आयोग को पूर्ण सहयोग दें। अदालत ने इस संभावना का भी संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर BLOs की सुरक्षा और सुचारु कार्य के लिए पुलिस-बल की प्रतिनियुक्ति या अन्य वैकल्पिक इंतज़ाम भी किए जा सकते हैं।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि BLOs के सामने आ रही समस्याएँ केवल प्रशासनिक बोझ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कई स्थानों से धमकियों, डराने-धमकाने और राजनीतिक दबाव की शिकायतें सामने आई हैं, जो अत्यंत गंभीर स्थिति को दर्शाती हैं। अदालत ने चिंता व्यक्त की कि यदि SIR जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कारकों को समय रहते नहीं रोका गया, तो इससे मतदाता-सूची की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अंत में स्पष्ट चेतावनी दी कि देश की चुनावी व्यवस्था को प्रभावित करने वाली किसी भी घटना को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर कठोर निर्देश भी जारी किए जाएंगे। अदालत ने कहा कि आगे की सुनवाई में राज्यों और निर्वाचन आयोग द्वारा दी जाने वाली रिपोर्ट के आधार पर अगले कदम तय किए जाएंगे।

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