POCSO के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से रोमियो-जूलियट क्लॉज लाने की सिफारिश

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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पॉक्सो (POCSO) कानून के दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार को इसमें “रोमियो-जूलियट क्लॉज” जोड़ने का सुझाव दिया है। अदालत का मानना है कि पॉक्सो एक्ट बच्चों को यौन शोषण से बचाने के उद्देश्य से बनाया गया था, लेकिन कई मामलों में इसका इस्तेमाल सहमति से बने किशोर प्रेम संबंधों के खिलाफ किया जा रहा है, जिससे कानून का उद्देश्य प्रभावित हो रहा है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां दो नाबालिग या कम उम्र के किशोर आपसी सहमति से रिश्ते में हों और उम्र का अंतर बहुत अधिक न हो, वहां कानून की कठोर धाराएं लागू करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पॉक्सो कानून का मकसद बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है, न कि वास्तविक और सहमति आधारित किशोर संबंधों को अपराध की श्रेणी में डालना। अदालत ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह कानून में ऐसे प्रावधान पर विचार करे, जिससे सहमति से बने कम उम्र के प्रेम संबंधों को अपराध मानने से रोका जा सके। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति केंद्र सरकार को भेजने का निर्देश भी दिया है।

दरअसल, “रोमियो-जूलियट कानून” एक ऐसा कानूनी प्रावधान होता है, जिसमें कम उम्र के किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने रिश्तों को अपराध नहीं माना जाता। इसका नाम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक ‘रोमियो और जूलियट’ से लिया गया है, जिसमें दो युवा प्रेमी सामाजिक बंदिशों के बावजूद एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। कई देशों में इस तरह के कानून लागू हैं, ताकि कानून का दुरुपयोग न हो और किशोरों के सामान्य सामाजिक व्यवहार को अपराध न बनाया जाए।

भारत में मौजूदा पॉक्सो कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति के साथ यौन संबंध अपराध माना जाता है, चाहे वह दोनों की सहमति से ही क्यों न हो। यही कारण है कि कई बार 16-17 साल के किशोरों के बीच प्रेम संबंध भी गंभीर आपराधिक मामलों में बदल जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ऐसे मामलों में परिवार या समाज के दबाव में पॉक्सो का इस्तेमाल निजी विवाद निपटाने के हथियार की तरह किया जाता है, जिससे युवाओं को मानसिक और सामाजिक रूप से भारी नुकसान झेलना पड़ता है।

अदालत ने यह भी कहा कि पॉक्सो मामलों में जमानत पर फैसला करते समय मेडिकल उम्र जांच को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि यह प्रक्रिया जांच के बजाय एक तरह का मिनी ट्रायल बन जाती है। सुप्रीम कोर्ट का उद्देश्य साफ है कि बच्चों की सुरक्षा के साथ-साथ कानून का संतुलित और न्यायपूर्ण इस्तेमाल हो, ताकि वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिले और सहमति से बने किशोर रिश्तों को अनावश्यक रूप से अपराध की श्रेणी में न डाला जाए।

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