पश्चिम एशिया में जंग की आहट तेज, रियाद अटैक के बाद दुनिया की नजरें अमेरिका पर

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पश्चिम एशिया में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी टकराव ने अब गंभीर युद्ध का रूप ले लिया है। हालात तब और बिगड़ गए जब सऊदी अरब की राजधानी रियाद स्थित अमेरिकी दूतावास पर ड्रोन हमला किया गया। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार दूतावास परिसर को निशाना बनाकर दो ड्रोन भेजे गए, जिनमें से एक को सुरक्षा प्रणाली ने मार गिराया, जबकि दूसरे से परिसर के बाहरी हिस्से को नुकसान पहुंचा। इस हमले के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। अमेरिका ने इस हमले के पीछे ईरान समर्थित गुटों का हाथ होने की आशंका जताई है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका इस हमले का “जल्द और निर्णायक जवाब” देगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिकी ठिकानों या राजनयिक परिसरों पर हमले को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। व्हाइट हाउस के अनुसार, क्षेत्र में अतिरिक्त सैन्य संसाधन तैनात किए जा रहे हैं और खाड़ी में मौजूद अमेरिकी नौसैनिक बेड़े को अलर्ट पर रखा गया है।

इस बीच, इज़राइल और अमेरिका द्वारा ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर संयुक्त हमले किए जाने की खबरें भी सामने आई हैं। इन हमलों में ईरान की मिसाइल सुविधाओं और सैन्य ढांचे को निशाना बनाया गया। जवाबी कार्रवाई में ईरान समर्थित समूहों ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस संघर्ष में अब तक सैकड़ों लोगों के हताहत होने की आशंका है, हालांकि आधिकारिक आंकड़ों की पुष्टि लगातार बदलती स्थिति के कारण स्पष्ट नहीं है।

तनाव के बीच ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में आवाजाही बाधित करने की चेतावनी ने वैश्विक तेल बाजार में चिंता बढ़ा दी है। यह समुद्री मार्ग विश्व तेल आपूर्ति के बड़े हिस्से के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि यहां व्यवधान जारी रहता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर व्यापक असर पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने स्थिति पर आपात बैठक बुलाई है और कई देशों ने संयम बरतने की अपील की है।

कुल मिलाकर, रियाद में अमेरिकी दूतावास पर हुआ ड्रोन हमला इस व्यापक संघर्ष का नया और संवेदनशील अध्याय बन गया है। क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों और सख्त बयानों के बीच आशंका जताई जा रही है कि यदि कूटनीतिक प्रयास तेज नहीं किए गए तो यह टकराव और अधिक देशों को अपनी चपेट में ले सकता है।

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