अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत द्वारा ईरान के युद्धपोत IRIS लावन को अपने बंदरगाह पर शरण देने का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। इस मामले पर भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar ने स्पष्ट किया कि यह फैसला पूरी तरह मानवीय आधार और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत लिया गया था। उन्होंने बताया कि संकट की स्थिति में समुद्र में मौजूद किसी भी जहाज को सुरक्षित बंदरगाह उपलब्ध कराना एक जिम्मेदार समुद्री राष्ट्र की जिम्मेदारी होती है और भारत ने इसी सिद्धांत के तहत यह कदम उठाया।
जानकारी के मुताबिक ईरान का नौसैनिक युद्धपोत IRIS लावन हिंद महासागर क्षेत्र में मौजूद था और क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण उसने सुरक्षित ठिकाने की मांग की थी। इसके बाद भारत ने जहाज को Cochin Port पर डॉक करने की अनुमति दी। इस दौरान जहाज पर सवार करीब 180 से अधिक ईरानी नौसैनिकों को आवश्यक सहायता और सुरक्षा उपलब्ध कराई गई। भारतीय अधिकारियों के अनुसार यह कदम पूरी तरह अस्थायी और मानवीय सहायता के उद्देश्य से उठाया गया था।
यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव तेज हो गया था और हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई थी। इसी दौरान खबरें सामने आईं कि ईरान का एक अन्य युद्धपोत IRIS Dena श्रीलंका के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हमले का शिकार हो गया था, जिसके बाद क्षेत्र में मौजूद अन्य ईरानी नौसैनिक जहाजों के लिए खतरा बढ़ गया। ऐसे माहौल में ईरानी युद्धपोत ने भारत से सहायता मांगी और भारत ने अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत उसे अस्थायी शरण दे दी।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत की विदेश नीति संतुलित और जिम्मेदार रही है तथा भारत किसी भी सैन्य संघर्ष में पक्ष लेने के बजाय मानवीय मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय कानून को प्राथमिकता देता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत ने जो कदम उठाया वह किसी देश के खिलाफ नहीं बल्कि समुद्र में संकट की स्थिति में फंसे जहाज और उसके चालक दल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए था। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से यह संदेश गया है कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता, मानवीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों का सम्मान करने वाला एक जिम्मेदार देश है।




