आवारा कुत्तों से बढ़ती समस्याओं और इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों का पालन न किए जाने को लेकर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई के दौरान नाराज़गी जताते हुए कहा कि देश के अधिकांश राज्य और केंद्रशासित प्रदेश अब तक इस मामले में हलफनामे दाखिल नहीं कर पाए हैं, जबकि उन्हें पहले ही अदालत के आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट देनी थी। अदालत ने इस लापरवाही को गंभीर माना और ऐसे सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को 3 नवंबर 2025 को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश जारी किया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि नागरिक सुरक्षा और जनस्वास्थ्य से जुड़ा है। आवारा कुत्तों द्वारा काटे जाने, रेबीज संक्रमण और सार्वजनिक स्थानों पर असुरक्षा जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। अदालत ने कहा कि Animal Birth Control (ABC) Rules के तहत सभी राज्यों को कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण और पुनर्वास की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। लेकिन अब तक अधिकतर राज्य इस दिशा में पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर पाए हैं और न ही उन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में उठाए गए कदमों की जानकारी अदालत को दी है।
रिपोर्टों के अनुसार, अब तक केवल कुछ ही राज्यों जैसे तेलंगाना और पश्चिम बंगाल ने अपने हलफनामे दाखिल किए हैं, जबकि बाकी अधिकांश ने कोई जवाब नहीं दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर असंतोष जताया और कहा कि प्रशासनिक उदासीनता स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि देशभर में आवारा कुत्तों की समस्या बढ़ती जा रही है, और इसके समाधान के लिए राज्य सरकारों को केंद्र के साथ मिलकर समन्वय बनाना होगा।
इससे पहले अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि देशभर में आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए Animal Welfare Board और स्थानीय निकाय मिलकर एक व्यापक योजना तैयार करें। इसके तहत नसबंदी अभियान, रेबीज टीकाकरण और शेल्टर होम की व्यवस्था को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया गया था। लेकिन कई राज्यों द्वारा इन निर्देशों का पालन न किए जाने की वजह से अब अदालत ने व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने का फैसला लिया है।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि आगामी सुनवाई में राज्यों की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया, तो सुप्रीम कोर्ट और कड़े कदम उठाने पर विचार कर सकती है। इसमें प्रशासनिक निगरानी समिति का गठन या राज्यों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई भी शामिल हो सकती है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यह मामला केवल पशु कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव सुरक्षा, स्वास्थ्य और देश की छवि से भी जुड़ा है।
3 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में सभी मुख्य सचिवों को उपस्थित होकर अपने-अपने राज्य में अब तक की प्रगति और भविष्य की योजना के बारे में जानकारी देनी होगी। इस सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट आगे की कार्यवाही और संभावित आदेश तय करेगा। अदालत के इस सख्त रुख से अब उम्मीद की जा रही है कि राज्य सरकारें आवारा कुत्तों के प्रबंधन को लेकर अधिक जिम्मेदारी से काम करेंगी, ताकि नागरिकों और जानवरों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।




