ईरान और पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध का असर अब भारत की कृषि व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। खरीफ सीजन से पहले भारत को यूरिया आयात के लिए लगभग दोगुनी कीमत चुकानी पड़ रही है। वैश्विक आपूर्ति बाधित होने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेज उछाल के बीच केंद्र सरकार ने रिकॉर्ड 25 लाख टन यूरिया आयात करने का फैसला किया है। यह एक ही टेंडर के तहत भारत द्वारा किया गया अब तक का सबसे बड़ा यूरिया आयात माना जा रहा है। सरकार का यह कदम खरीफ सीजन में किसानों को पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध कराने और संभावित कमी से बचाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
सरकारी एजेंसी इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) ने पश्चिमी तट के लिए 15 लाख टन यूरिया 935 डॉलर प्रति टन और पूर्वी तट के लिए 10 लाख टन यूरिया 959 डॉलर प्रति टन की दर से खरीदने का निर्णय लिया है। तुलना करें तो महज दो महीने पहले भारत ने इसी यूरिया को लगभग 500 डॉलर प्रति टन के आसपास खरीदा था। यानी मौजूदा कीमतों में करीब 90 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह उछाल सीधे तौर पर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, समुद्री मार्गों पर जोखिम और आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं का परिणाम है।
विशेषज्ञों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव ने वैश्विक उर्वरक बाजार को हिला दिया है। दुनिया के कुल यूरिया निर्यात का एक बड़ा हिस्सा इसी रणनीतिक समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक है, अपनी कुल जरूरतों का बड़ा भाग आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में समय पर पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करना सरकार के लिए अनिवार्य हो गया था, खासकर तब जब मानसून आधारित खरीफ बुवाई नजदीक है।
हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि बढ़ी हुई आयात लागत का बोझ किसानों पर नहीं डाला जाएगा। यूरिया की खुदरा कीमत फिलहाल नियंत्रित रहेगी और अतिरिक्त खर्च उर्वरक सब्सिडी के माध्यम से सरकार वहन करेगी। लेकिन इससे केंद्र के उर्वरक सब्सिडी बिल में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होने की संभावना है। यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबा खिंचता है, तो आने वाले महीनों में कृषि लागत, खाद्य मुद्रास्फीति और सरकारी वित्त पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
फिलहाल सरकार की प्राथमिकता देशभर में यूरिया की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करना है। यह घटनाक्रम इस बात का ताजा उदाहरण है कि वैश्विक भू-राजनीतिक संकट किस तरह भारत की खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादन और आर्थिक स्थिरता को सीधे प्रभावित कर सकते हैं। आने वाले समय में पश्चिम एशिया की स्थिति पर भारत की नजरें टिकी रहेंगी।



